24 घंटे में ही ठंडे बस्ते में गया ट्रंप का ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’, व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान को दिया क्रेडिट

वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया की राजनीति में पिछले 48 घंटों के भीतर जो नाटकीय घटनाक्रम बदला है, उसने वैश्विक कूटनीति और तेल बाजार में हलचल मचा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए शुरू किया गया प्रोजेक्ट फ्रीडम महज 24 घंटे के भीतर ही ठंडे बस्ते में चला गया है। हालांकि, व्हाइट हाउस और ट्रंप प्रशासन ने इस मिशन को रोकने का श्रेय पाकिस्तान की मध्यस्थता को दिया था, लेकिन अब जो आंतरिक खबरें निकलकर सामने आ रही हैं, वे कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। यह मामला केवल कूटनीति का नहीं, बल्कि खाड़ी देशों के साथ अमेरिका के बदलते रिश्तों और सामरिक मजबूरियों का भी है।

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सऊदी अरब के कड़े रुख से पीछे हटा अमेरिका

अमेरिकी मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट फ्रीडम के अचानक बंद होने के पीछे की असली वजह सऊदी अरब का कड़ा रुख है। बताया जा रहा है कि, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अमेरिकी राष्ट्रपति के उस फैसले से बेहद नाराज थे, जिसमें ट्रंप ने बिना किसी पूर्व सूचना या क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ समन्वय किए सोशल मीडिया पर सीधे सैन्य ऑपरेशन का ऐलान कर दिया था। सऊदी अरब ने इस मिशन में शामिल अमेरिकी विमानों को अपने एयरस्पेस और एयरबेस के इस्तेमाल की अनुमति देने से दोटूक इनकार कर दिया।

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अमेरिकी सैन्य रणनीति के जानकारों का मानना है कि, होर्मुज जैसे संवेदनशील इलाके में किसी भी ऑपरेशन की सफलता के लिए सऊदी अरब, जॉर्डन, कुवैत और ओमान जैसे देशों का रसद और हवाई समर्थन अनिवार्य है। बिना रिफ्यूलिंग टैंकरों और लड़ाकू विमानों की सुरक्षित उड़ान के, जहाजों को सुरक्षा देना नामुमकिन था। यही वजह रही कि, दो दिनों में अमेरिकी नौसेना केवल 3 जहाजों को ही पार करा पाई, जिसके बाद ट्रंप को कदम पीछे खींचने पड़े। कतर और ओमान जैसे देशों ने भी इस जल्दबाजी में लिए गए फैसले पर आश्चर्य जताया है।

इस बीच ईरान की राजधानी तेहरान में माहौल बेहद गर्म है। वहां की सड़कों पर अमेरिका विरोधी बिलबोर्ड लगाए गए हैं, जिनमें राष्ट्रपति ट्रम्प का मजाक उड़ाते हुए उनकी मूंछों को होर्मुज स्ट्रेट के रूप में दिखाया गया है। ईरान की ओर से यह स्पष्ट संकेत है कि, वह इस जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के पूर्व कमांडर मोहसिन रेजाई ने दोटूक कहा है कि, होर्मुज का नियंत्रण ईरान के हाथ में ही रहेगा और बाहरी ताकतों को इस इलाके से बाहर जाना होगा।

ईरान को मिला चीन का साथ

दूसरी तरफ, चीन भी इस पूरे मामले में ईरान के साथ खड़ा नजर आ रहा है। बीजिंग में हुई हाई-लेवल बैठक के दौरान चीन ने ईरान को समर्थन का भरोसा दिया है। ईरान को डर है कि, ट्रंप अपनी आगामी चीन यात्रा के दौरान बीजिंग पर दबाव डाल सकते हैं, इसलिए तेहरान पहले ही अपनी घेराबंदी मजबूत कर रहा है। तनाव के इन बादलों के बीच शांति की एक धुंधली किरण भी नजर आ रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने के लिए एक 14 सूत्रीय समझौता तैयार किया गया है। इस ड्रॉफ्ट को तैयार करने में ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ की अहम भूमिका बताई जा रही है। इस समझौते की मुख्य शर्तों में तुरंत सीजफायर, होर्मुज में जहाजों की बहाली, ईरान के जमे हुए अरबों डॉलर जारी करना और यूरेनियम संवर्धन पर सख्त निगरानी जैसे बिंदु शामिल हैं।

हालांकि, ईरान के भीतर इस समझौते को लेकर एक राय नहीं है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर कालीबाफ ने अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स पर तंज कसते हुए इसे ऑपरेशन ट्रस्ट मी ब्रो का नाम दिया और इसे अमेरिकी विशलिस्ट करार दिया। ईरान का कहना है कि, वे तभी किसी समझौते पर दस्तखत करेंगे जब उन्हें भविष्य में किसी भी हमले के खिलाफ पुख्ता गारंटी मिलेगी। वहीं, परमाणु विशेषज्ञ डेविड ऑलब्राइट का मानना है कि, अगर ईरान के पास 10 टन एनरिच्ड यूरेनियम का भंडार बना रहता है, तो यह एक बेहद खराब समझौता होगा।

तेज हुई कूटनीतिक रस्साकशी

जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच कूटनीतिक रस्साकशी चल रही है, उसी समय इजराइल लेबनान की धरती पर हिजबुल्लाह के खिलाफ अपना अभियान और तेज कर रहा है। इजराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों को खाली करने का अल्टीमेटम दिया है और हिजबुल्लाह की रदवान यूनिट के कमांडर अहमद बलूत समेत कई शीर्ष अधिकारियों को मार गिराने का दावा किया है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि, वे ट्रंप के साथ लगातार संपर्क में हैं और उनका साझा लक्ष्य ईरान को परमाणु मुक्त रखना है।

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एक्सपर्ट्स का मानना है कि, अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले किसी भी संभावित समझौते में लेबनान का मुद्दा भी एक बड़ी बाधा बन सकता है। ईरान अपने सबसे करीबी सहयोगी हिजबुल्लाह को इजराइल के रहमोकरम पर नहीं छोड़ सकता। वहीं, इजराइल का विस्तारवादी एजेंडा और लेबनान की लितानी नदी तक नियंत्रण की इच्छा इस शांति प्रक्रिया को कभी भी पटरी से उतार सकती है।

ईरानी सैन्य ढांचे को भारी नुकसान

राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि, अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से ईरान के सैन्य ढांचे को भारी नुकसान हुआ है और स्थिति पूरी तरह उनके नियंत्रण में है। उन्होंने इसे एक स्टील की दीवार बताया है जिससे ईरानी जहाज नहीं गुजर पा रहे, लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य विशेषज्ञों का विश्लेषण कहता है कि ट्रंप ईरान के मनोविज्ञान को समझने में भूल कर रहे हैं। ईरान दशकों से प्रतिबंधों के साये में जीने का आदी है और वह दबाव में आकर आत्मसमर्पण करने के बजाय संघर्ष को लंबा खींचने की क्षमता रखता है।

होर्मुज स्ट्रेट से तेल की सप्लाई बाधित होने का असर वैश्विक बाजार पर पड़ रहा है, जो ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। फिलहाल दुनिया की निगाहें पाकिस्तान के जरिए आने वाले ईरान के जवाब पर टिकी हैं।

 

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