ट्रंप ने किया दो हफ्ते के सीजफायर का ऐलान, दुनिया ने ली राहत की सांस

वॉशिंगटन। जब दुनिया एक विनाशकारी महायुद्ध की दहलीज पर खड़ी थी, तभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसी घोषणा कर दी जिसने वैश्विक राजनीति के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। दरअसल, ट्रंप ने ईरान के साथ दो सप्ताह के लिए सीजफायर का ऐलान कर दिया है।

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यह घोषणा उस वक्त हुई जब अमेरिकी सेना ईरान पर भीषण हमले के लिए पूरी तरह तैयार थी और आज ही रवाना होने वाली थी। ट्रंप ने इस बड़ी कूटनीतिक जीत का श्रेय सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान को दिया है, लेकिन पर्दे के पीछे बीजिंग की भूमिका ने दुनिया भर के विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। क्या यह शांति समझौता वास्तव में पाकिस्तान की मध्यस्थता का नतीजा है या फिर चीन ने अपनी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल कर तेहरान को झुकने पर मजबूर किया है?

आज कूच करने वाली थी विनाशकारी सेना

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस से जारी अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि, अमेरिका अब ईरान पर बमबारी और सैन्य हमले दो सप्ताह के लिए रोक रहा है। उन्होंने कहा, हम ईरान में अपनी उस विनाशकारी सेना को नहीं भेजेंगे, जो आज ही कूच करने वाली थी। हमने शांति को एक मौका देने का फैसला किया है। ट्रंप ने न केवल हमलों को रोकने की घोषणा की, बल्कि ईरान द्वारा पेश किए गए 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को व्यावहारिक और सकारात्मक करार दिया।

donald trump

दूसरी ओर, ईरान ने भी इस तनावपूर्ण माहौल में लचीलापन दिखाया है। तेहरान ने अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव पर आधारित बातचीत के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। सबसे महत्वपूर्ण राहत की खबर यह है कि, ईरान ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को फिर से खोलने के लिए तैयार हो गया है।

बता दें कि, यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए लाइफलाइन माना जाता है और इसके बंद होने से दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहराने का खतरा पैदा हो गया था।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू ट्रंप द्वारा पाकिस्तान की प्रशंसा करना है। ट्रंप ने दुनिया को बताया कि, पाकिस्तान की मध्यस्थता के कारण ही यह बातचीत संभव हो पाई है, लेकिन, जब पत्रकारों ने ट्रंप से सीधा सवाल किया कि, क्या इस समझौते में चीन की कोई महत्वपूर्ण भूमिका है, तो ट्रंप ने रहस्यमयी अंदाज में कहा, मैंने ऐसा सुना है कि, चीन ने ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए राजी किया।

चीन को नहीं दिया क्रेडिट

ट्रंप का यह बयान बीजिंग की पर्दे के पीछे की सक्रियता की पुष्टि करता है। हालांकि, ट्रंप ने खुलकर चीन को क्रेडिट नहीं दिया, लेकिन उन्होंने इस संभावना को खारिज भी नहीं किया कि, तेहरान के सबसे करीबी रणनीतिक सहयोगी चीन ने अंतिम समय में हस्तक्षेप किया था ताकि एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को टाला जा सके।

इस शांति समझौते की पटकथा मार्च के आखिरी सप्ताह से ही लिखी जा रही थी। जब पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच संवाद की खिड़की खोली, तो चीन ने भी क्षेत्रीय स्थिरता के नाम पर अपनी कूटनीति तेज कर दी थी। 31 मार्च को इस्लामाबाद में एक हाई-प्रोफाइल मीटिंग हुई, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किए, मिस्र और पाकिस्तान के विदेश मंत्री शामिल हुए थे। इसके ठीक एक दिन बाद पाकिस्तान और चीन ने संयुक्त रूप से एक पांच सूत्रीय शांति पहल का ऐलान किया।

एक रिपोर्ट के अनुसार, तीन ईरानी अधिकारियों ने पुष्टि की है कि, जब पाकिस्तान युद्धविराम के लिए राजनीतिक दबाव बना रहा था, तब चीन ने अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए ईरान पर लचीलापन रुख अख्तियार करने का दबाव डाला। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि, बीजिंग ने पाकिस्तान, तुर्किए और मिस्र जैसे मध्यस्थों के माध्यम से ईरान को यह संदेश भिजवाया कि, युद्ध किसी के हित में नहीं है। बातचीत के दौरान चीनी राजनयिक लगातार तेहरान के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में बने हुए थे।

क्षेत्र में शांति चाहता है केंद्र

हैरानी की बात यह है कि, सीजफायर के इतने बड़े ऐलान के बाद भी चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक जश्न या विस्तृत बयान नहीं आया है। हालांकि, वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि, बीजिंग शांति के लिए प्रयास कर रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा था, सभी पक्षों को ईमानदारी दिखानी चाहिए और इस युद्ध को जल्द से जल्द समाप्त करना चाहिए, जो कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था, लेकिन कूटनीति के खेल में चीन ने अपनी पकड़ भी ढीली नहीं छोड़ी है।

सीजफायर से ठीक एक दिन पहले चीन और रूस ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया था, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षा के लिए अमेरिकी नेतृत्व में समन्वित प्रयासों की बात की गई थी। यह वीटो इस बात का प्रमाण है कि, चीन क्षेत्र में शांति तो चाहता है, लेकिन वह अमेरिका के एकतरफा प्रभुत्व को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।

ईरान के साथ सीजफायर होने के बाद अब पूरी दुनिया की नजरें राष्ट्रपति ट्रंप की आगामी बीजिंग यात्रा पर टिकी हैं। यह यात्रा 14-15 मई को निर्धारित है। पहले यह यात्रा मार्च में होनी थी, लेकिन ईरान संकट के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। ट्रंप ने इस आगामी बैठक को एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अवसर बताया है।

10 अप्रैल पर टिकी निगाह

ट्रंप ने यह भी घोषणा की है कि, वे इस साल के अंत में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी की मेजबानी वाशिंगटन डीसी में करेंगे। यह घटनाक्रम अमेरिका और चीन के बीच के ट्रेड वॉर और कोल्ड वॉर जैसे माहौल में एक बड़ी नरमी का संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान संकट ने अमेरिका और चीन को कम से कम एक मुद्दे पर साथ आने के लिए मजबूर कर दिया है।

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सीजफायर के बाद अब असली परीक्षा 10 अप्रैल को होगी। इस्लामाबाद में ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा होने वाली है। ईरान ने फिलहाल इस घटनाक्रम को अपनी रणनीतिक जीत करार दिया है। तेहरान की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि, उन्होंने दुश्मन को बातचीत के लिए मजबूर किया है। हालांकि, उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि, यदि अमेरिका ने धोखे से भी हमला किया, तो

फ़िलहाल, यह सीजफायर पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी राहत है। ट्रंप ने विनाशकारी सेना को रोककर यह साबित करने की कोशिश की है कि वे डील्स के मास्टर हैं। वहीं, चीन ने यह दिखा दिया है कि मध्य-पूर्व की राजनीति में अब उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। पाकिस्तान ने एक सफल मध्यस्थ के रूप में अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने का प्रयास किया है।

इस्लामाबाद में होगी वार्ता

अगले दो सप्ताह पूरी दुनिया के लिए वेट एंड वॉच की स्थिति वाले होंगे। अगर 10 अप्रैल की इस्लामाबाद वार्ता सफल रहती है, तो यह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा शांति समझौता बन सकता है, लेकिन अगर शर्तों के उल्लंघन की खबरें आईं, तो बारूद के ढेर पर बैठी यह दुनिया एक बार फिर महाविनाश की ओर बढ़ सकती है।

 

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