
वाशिंगटन। अमेरिका के साथ बढ़ती दोस्ती का असर अब भारत की ऊर्जा नीति पर साफ दिखाई देने लगा है। सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे परंपरागत खाड़ी सप्लायरों को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका भारत के लिए एलपीजी यानी रसोई गैस का सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा है। भारतीय तेल कंपनियां अब अमेरिका से आयात होने वाली एलपीजी की मात्रा को दोगुना करने की तैयारी में जुट गई हैं। इसके पीछे बड़ी वजह मध्य-पूर्व में हाल में पैदा हुआ संकट है, जिसने खाड़ी देशों से आने वाली आपूर्ति को अस्थिर कर दिया।
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22 लाख टन एलपीजी योजना
एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय तेल-गैस कंपनियां अब हर साल अमेरिका से करीब 22 लाख टन एलपीजी मंगाने की योजना बना रही हैं, जो मौजूदा आयात से लगभग दोगुना है। यह कदम एक तरफ अमेरिका-भारत के बीच मजबूत होते रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों का संकेत माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति में आए बड़े बदलाव को भी दर्शाता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समय-समय पर भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने निजी और कूटनीतिक संबंधों की गर्मजोशी का जिक्र करते रहे हैं। अब इसका असर ऊर्जा व्यापार के आंकड़ों में भी नजर आ रहा है।

केवल अमेरिका ही नहीं, भारत ने अपने एलपीजी आयात को कई और देशों में भी फैलाने की कोशिश शुरू कर दी है। अल्जीरिया, अर्जेंटीना, नॉर्वे, नाइजीरिया और मलेशिया जैसे देश अब भारत के नए संभावित आपूर्तिकर्ताओं की सूची में शामिल हो गए हैं। इसके पीछे का मकसद कतर, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई जैसे परंपरागत खाड़ी देशों पर निर्भरता को घटाना है, ताकि भविष्य में क्षेत्रीय तनाव या संघर्ष की स्थिति में भारत की ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा न आये।
ईरान-अमेरिका युद्ध से तनाव
दरअसल, बीते फरवरी महीने में शुरू हुए ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में गैस की किल्लत होने लगी थी। दोनों देशों के बीच हुए तनाव की वजह से खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस की ढुलाई को गंभीर रूप से प्रभावित किया। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजी यातायात में रुकावट आने के बाद भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति पर तेजी से पुनर्विचार करना पड़ा। इसी क्रम में 4 जुलाई 2026 को राजस्थान के बालोतरा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि, किस तरह सरकार ने संकट के दौरान घरेलू एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के लिए तेज कदम उठाए।
उन्होंने बताया कि, संकट शुरू होते ही सरकार ने देश की रिफाइनरियों की क्षमता का आकलन किया और जो गैस पहले औद्योगिक इस्तेमाल के लिए बनाई जा रही थी, उसे रसोई गैस के उत्पादन की तरफ मोड़ दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि, महज एक हफ्ते के भीतर एलपीजी उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। रोजाना करीब 35,000 मीट्रिक टन से बढ़कर यह आंकड़ा लगभग 54,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गया।
सप्लाई लाइन बाधित
आंकड़ों पर नजर डालें, तो मध्य-पूर्व संकट के दौरान अमेरिका ने भारत के लिए सबसे भरोसेमंद और सबसे बड़े एलपीजी सप्लायर की भूमिका निभाई। नवंबर 2025 में भारत और अमेरिका के बीच एक साल के लिए एक समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य 2026 में भारत की सालाना एलपीजी जरूरत का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका से आयात करना था, लेकिन जैसे ही खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा और वहां से आने वाले कार्गो जहाज फंसने लगे, अमेरिका से आयात की मात्रा अनुमान से कहीं ज्यादा बढ़ गई। इस स्थिति ने भारत को एक बड़ी राहत दी, क्योंकि संकट के समय जब खाड़ी से सप्लाई लाइन बाधित हुई थी, तब अमेरिका ने तेजी से आपूर्ति बढ़ाकर कमी को पूरा किया।
भारत सरकार अब इस अनुभव से सबक लेते हुए भविष्य के लिए एक मजबूत रणनीतिक भंडार तैयार करने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। यदि अमेरिका से आयात दोगुना होता है, तो इससे न केवल खाड़ी देशों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि आने वाले समय में किसी भी तरह के भू-राजनीतिक संकट से निपटने के लिए भारत के पास एक बेहतर सुरक्षा कवच भी होगा।
अप्रत्याशित संकट से मिलेगी राहत
इसी सोच के तहत पेट्रोलियम मंत्रालय ने मई महीने में ही सभी सरकारी तेल विपणन कंपनियों को निर्देश दिया था कि, वे 30 दिनों के लिए एलपीजी का रणनीतिक भंडार तैयार रखें। यह प्रस्तावित 30-दिवसीय रिजर्व, घरेलू और वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडरों की मांग पूरी करने के लिए तेल रिटेलर कंपनियों द्वारा पहले से बनाए रखे जाने वाले 45-दिवसीय रोलिंग स्टॉक के अतिरिक्त होगा। यानी कुल मिलाकर भारत के पास अब दो स्तर की सुरक्षा व्यवस्था होगी, जो किसी भी अप्रत्याशित आपूर्ति संकट की स्थिति में देश को राहत दे सकेगी। आंकड़े इस बदलाव की रफ्तार को साफ दर्शाते हैं।

ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाली संस्था कप्लर के डेटा के अनुसार, साल 2025 में भारत ने अपने कुल आयातित एलपीजी का 8 प्रतिशत से भी कम हिस्सा अमेरिका से मंगाया था। जनवरी 2026 में जैसे ही दोनों देशों के बीच का ढांचागत समझौता लागू हुआ, यह हिस्सेदारी बढ़कर करीब 12 प्रतिशत हो गई।
भारत का भरोसेमंद स्तंभ बना अमेरिका
फरवरी में यह आंकड़ा और बढ़कर 13 प्रतिशत तक पहुंचा। मार्च में जब मध्य-पूर्व में संघर्ष शुरू हुआ और होर्मुज जलडमरूमध्य से पश्चिम एशियाई कार्गो की आवाजाही लगभग ठप हो गई, तब अमेरिका से आयात की हिस्सेदारी अचानक उछलकर 37 प्रतिशत पर पहुंच गई। इसके बाद यह वृद्धि लगातार जारी रही है। अप्रैल में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत, मई में 55 प्रतिशत और जून 2026 में बढ़कर करीब 65 प्रतिशत तक जा पहुंचा।
कुल मिलाकर देखा जाए, तो जो अमेरिका कुछ महीने पहले तक भारत के एलपीजी आयात में एक सीमित हिस्सेदार था, वह आज भारत की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद स्तंभ बनकर उभरा है। मध्य-पूर्व में जारी अनिश्चितता के बीच भारत अब अपनी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को अधिक विविध और सुरक्षित बनाने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रहा है। अमेरिका के साथ बढ़ता यह ऊर्जा सहयोग आने वाले समय में दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को और गहरा कर सकता है।
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