
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बिजली मीटरों को लेकर चल रहा घमासान अब एक निर्णायक मोड़ पर आ गया है। प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर पिछले कई महीनों से उठ रहे विरोध के सुरों ने आखिरकार योगी सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया है। सरकार के इस फैसले को विपक्षी दल अपनी बड़ी नैतिक और राजनीतिक जीत के रूप में देख रहे हैं।
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बिल वापस करने की मांग उठी
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के दिग्गज नेता संजय सिंह ने सरकार के इस यू-टर्न पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्ष का कहना है कि, यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि उस जन-आक्रोश का नतीजा है जिसने सरकार को झुका दिया। अब मांग केवल व्यवस्था बदलने तक सीमित नहीं रही, बल्कि विपक्ष ने उन उपभोक्ताओं को मुआवजा देने और वसूले गए अतिरिक्त बिल को वापस करने की मांग उठा दी है, जिन्हें इस व्यवस्था के कारण भारी आर्थिक मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी थी।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक पिछले कुछ समय से स्मार्ट प्रीपेड मीटरों के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हो गया था। उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि, इन मीटरों के लगने के बाद न केवल बिजली के बिलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई, बल्कि तकनीकी खामियों के कारण बैलेंस खत्म होते ही आधी रात को भी बिजली कट जाना आम बात हो गई थी।
इस मुद्दे को लेकर विपक्ष ने सरकार की घेराबंदी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी का परिणाम रहा कि, सोमवार को सरकार ने राज्य में प्रीपेड स्मार्ट मीटर की अनिवार्यता को समाप्त करने का बड़ा निर्णय लिया। शासन के नए आदेशों के अनुसार, अब नए बिजली कनेक्शन के लिए प्रीपेड मीटर अनिवार्य नहीं होंगे। इतना ही नहीं, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि, जिन घरों में पहले से प्रीपेड मीटर लगाए जा चुके हैं, उन्हें उपभोक्ताओं की इच्छा के अनुसार पोस्टपेड में बदला जाएगा। इस फैसले के बाद से ही उत्तर प्रदेश की सियासत में क्रेडिट वॉर शुरू हो गया है।
अखिलेश ने लगाया बड़ा आरोप
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस निर्णय पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने मंगलवार को जारी अपने बयान में साफ कहा कि, यह सरकार की इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि जनता और समाजवादी पार्टी के निरंतर विरोध का दबाव है जिसने सरकार को झुकने पर विवश किया है। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि प्रीपेड मीटर के नाम पर प्रदेश की गरीब जनता की जेब पर डाका डाला गया है।
उन्होंने मांग की, कि सरकार केवल मीटर बदलने के नाटक से काम न चलाए, बल्कि उन उपभोक्ताओं की लिस्ट तैयार करे जिनसे प्रीपेड मीटर के जरिए गलत तरीके से बिल वसूला गया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार को वह पैसा ब्याज समेत उपभोक्ताओं को वापस लौटाना चाहिए। सपा प्रमुख ने इसे भ्रष्टाचार का एक बड़ा जरिया बताते हुए कहा कि, बिना किसी तैयारी के इतनी बड़ी आबादी पर यह प्रयोग थोपा गया, जिससे केवल निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा।
वहीं, दूसरी ओर आम आदमी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर अपने तेवर कड़े रखे हैं। ‘आप’ के प्रदेश प्रभारी और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने सरकार के फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन इसे अधूरा बताया। संजय सिंह ने कहा कि, आम आदमी पार्टी ने सड़कों पर उतरकर इस शोषकारी व्यवस्था का विरोध किया था। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जब तक उपभोक्ताओं का पूर्ण शोषण खत्म नहीं हो जाता और बिजली व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी नहीं हो जाती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग
संजय सिंह का कहना है कि, प्रीपेड मीटर की योजना भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी थी और सरकार ने अपनी विफलता को छिपाने के लिए अब पीछे हटने का रास्ता चुना है। उन्होंने बिजली विभाग के उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग की है जिन्होंने जनता की शिकायतों को अनसुना कर इस व्यवस्था को जबरन थोपा था।
उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह खबर किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। प्रीपेड मीटरों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उपभोक्ता को अपने उपयोग का सही हिसाब नहीं मिल पा रहा था। रिचार्ज

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां इंटरनेट की कनेक्टिविटी कमजोर है, वहां मीटर रिचार्ज करने में आने वाली परेशानियों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। सरकार ने अब विभाग को निर्देश दिए हैं कि, वह पुरानी पोस्टपेड व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करे ताकि लोगों को पहले की तरह महीने के अंत में बिल भुगतान की सुविधा मिल सके। इससे न केवल उपभोक्ताओं का भरोसा बहाल होगा, बल्कि विभाग को भी बिलिंग से जुड़ी तकनीकी शिकायतों से राहत मिलेगी। विपक्षी दलों का तर्क है कि सरकार ने यह फैसला आने वाले चुनावों और अपनी गिरती साख को बचाने के लिए लिया है।
जनता को जागरूक करने के निर्देश
विपक्ष अब इस मुद्दे को लेकर गांव-गांव जाने की तैयारी में है। अखिलेश यादव ने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए हैं कि वे लोगों को जागरूक करें कि यह उनकी एकता की जीत है। समाजवादी पार्टी का मानना है कि यदि विपक्ष एकजुट होकर जनता की आवाज उठाता है, तो सरकार को जनविरोधी फैसलों को वापस लेना ही पड़ता है।
दूसरी तरफ, बिजली विभाग के सूत्रों का कहना है कि तकनीकी रूप से मीटरों को बदलना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा क्योंकि इसके लिए पूरे बिलिंग सॉफ्टवेयर को फिर से कॉन्फ़िगर करना पड़ेगा। सरकार के इस कदम से उन निजी वेंडरों को भी बड़ा झटका लगा है जिन्हें करोड़ों के मीटर सप्लाई करने और उनके रखरखाव का ठेका दिया गया था। अब देखना यह होगा कि सरकार विपक्ष की उस मांग पर क्या रुख अपनाती है जिसमें वसूले गए बिल की वापसी की बात कही गई है।
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