
तेहरान। बीते दिनों ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापारिक जहाजों से आवाजाही सामान्य हो गई थी, लेकिन अमेरिकी हमलों के बाद खाड़ी क्षेत्र में एक बार फिर से माहौल ख़राब हो गया है। इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर हमलों की वजह से यातायात काफी घट गया है, जिसने विश्व समुदाय के माथे पर चिंता की लकीर खींच दी है। खाड़ी के तेल-गैस समृद्ध देश खासतौर पर परेशान हैं, क्योंकि उनका बड़ा निर्यात इसी रास्ते से होता है। यही वजह है कि, ये देश अब नई पाइपलाइनों और वैकल्पिक बंदरगाहों के जरिए भविष्य में किसी भी रुकावट से बचने की तैयारी में जुट गए हैं।
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होर्मुज पर स्थिति स्थायी नहीं है
जानकारों का कहना है कि, ईरान फिलहाल कुछ महीनों तक होर्मुज पर नियंत्रण बनाए रख सकता है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं रहने वाली। उनका कहना है कि, इस युद्ध ने दुनिया को एहसास दिला दिया है कि, ऊर्जा आपूर्ति के लिए सिर्फ एक संकरे रास्ते पर निर्भर रहना कितना खतरनाक है। ऐसे में अब हालात के अनुसार खुद को ढालना जरूरी हो गया है। हालांकि, यह बहस अभी भी जारी है कि लंबे समय में ये विकल्प कितने प्रभावी साबित होंगे।

आंकड़ों की बात करें, तो 28 फरवरी को संघर्ष भड़कने से पहले वैश्विक तेल-गैस व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था, जिससे रोजाना करीब दो करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति होती थी। अब खास बात ये ह कि, युद्ध दोबारा शुरू होने के बावजूद वैश्विक तेल बाजार में उतनी घबराहट नहीं दिख रही, जितनी आशंका थी। इसकी बड़ी वजह पहले से बनाई गई आपातकालीन रणनीतियां हैं।
सऊदी अरब बना रहा नई पाइपलाइन
ऊर्जा सलाहकार कंपनी क्रिस्टोल एनर्जी की सीईओ डॉ. कैरोल नखले बताती हैं कि, सऊदी अरब ने अपने निर्यात का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज से हटाकर ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की तरफ मोड़ना शुरू कर दिया है। यह पाइपलाइन पूरे देश को पार करते हुए लाल सागर तक पहुंचती है। कैरोल का कहना है कि, सऊदी अरब की इस तेज कार्रवाई की वजह से मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल प्रवाह बड़े स्तर पर बाधित नहीं हुआ, क्योंकि पाइपलाइन ने तुरंत विकल्प का काम किया।
बताया जा रहा है कि, यह पाइपलाइन 1980 के दशक की शुरुआत में बनाई गई थी। लगभग 1,200 किलोमीटर के इस नेटवर्क के जरिए कच्चा तेल पूर्व में स्थित अबकैक प्रोसेसिंग सुविधा से पश्चिम में यानबू बंदरगाह तक पहुंचता है। वहां से तेल टैंकरों में भरकर लाल सागर के रास्ते स्वेज नहर होते हुए यूरोप या फिर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गल्फ ऑफ एडेन तक भेजा जाता है।
70 लाख बैरल तेल प्रोसेस करने की क्षमता
इस पाइपलाइन की मौजूदा क्षमता रोजाना करीब 70 लाख बैरल तेल प्रोसेस करने की है, लेकिन सऊदी अरब अब इसे और बढ़ाने पर विचार कर रहा है, ताकि होर्मुज को पूरी तरह दरकिनार कर ज्यादा मात्रा में तेल भेजा जा सके। डॉ. नखले की मानें तो यूएई ने भी अपनी रणनीति में ऐसा ही बदलाव किया है और अपने निर्यात का हिस्सा एक अलग पाइपलाइन के जरिए होर्मुज क्षेत्र से बाहर भेजना शुरू कर दिया है।

यूएई इस समय अपनी क्रूड ऑयल पाइपलाइन यानी हबशान-फुजैराह पाइपलाइन पर तेजी से काम कर रहा है। यह पाइपलाइन अबू धाबी के दक्षिण-पश्चिमी तेल क्षेत्रों से हर दिन करीब 18 लाख बैरल तेल फुजैराह स्थित टर्मिनल तक पहुंचा सकती है। खास बात यह है कि यह टर्मिनल जलडमरूमध्य के पूर्वी छोर पर स्थित है, जिससे यह उस संकरे और संवेदनशील चोक पॉइंट से बचकर निकल जाता है।
2027 तक तैयार होगा प्रोजेक्ट
इतना ही नहीं, यूएई होर्मुज पर अपनी निर्भरता और घटाने के लिए एक नए बंदरगाह के निर्माण की योजना पर भी काम कर रहा है। इसके लिए दुबई की एक सप्लाई चेन कंपनी फुजैराह के तटीय क्षेत्र में नया बंदरगाह और कंटेनर टर्मिनल बनाने पर बातचीत कर रही है, जहां मौजूदा पाइपलाइन का अंतिम छोर स्थित है।
इन कोशिशों के साथ-साथ दो और बड़ी परियोजनाओं पर पहले से काम चल रहा है, जो इन देशों को होर्मुज पर निर्भरता से मुक्त करने में मदद कर सकती हैं। यूएई ने एक और पश्चिम-पूर्व पाइपलाइन का निर्माण शुरू किया है, जिसे मौजूदा युद्ध के बाद तेजी से पूरा करने की कोशिश हो रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि, ये प्रोजेक्ट 2027 तक तैयार हो जायेगा।
2024 में मिली थी मंजूरी
वहीं, इराक में बसरा-हदीथा पाइपलाइन को 2024 में मंजूरी मिल चुकी है। यह एक बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसके तहत इराक के दक्षिणी शहर बसरा के आसपास के तेल क्षेत्रों को जॉर्डन के लाल सागर तट पर स्थित अकाबा बंदरगाह से जोड़ा जाएगा। इसे सीरिया और तुर्की से गुजरने वाली अन्य परियोजनाओं से भी इसे जोड़ा जाएगा।
हालांकि, कुछ विश्लेषक मानते हैं कि, इन वैकल्पिक रास्तों की वजह से होर्मुज पर वैश्विक निर्भरता कम हो सकती है, लेकिन कई विशेषज्ञ इस राय से सहमत नहीं हैं। वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट के ऊर्जा नीति विश्लेषक साइमन हेंडरसन का कहना है कि, लोग इस मामले में बहुत जल्दबाजी कर रहे हैं। साइमन कहते हैं, कई पाइपलाइन प्रस्ताव भूमध्य सागर तक तेल पहुंचाने के लिए ही बनाए गए हैं, जबकि असली मांग कहीं और है।
बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है ईरान
एक और चिंता की बात ये है कि, ईरान बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य को भी बंद कर सकता है। ये जलडमरूमध्य यमन और अफ्रीका के बीच स्थित एक संकरा लेकिन वैश्विक समुदाय के लिए बेहद अहम रास्ता है। ये लाल सागर व एशिया के बीच संपर्क स्थापित करने का काम करता है। दुनिया का करीब 5 प्रतिशत तेल उत्पादन इसी रास्ते से गुजरता है।

कुछ साल पहले तक इस रास्ते की क्षमता आज के मुकाबले दोगुनी थी, लेकिन 2023 में इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद यमन के हूती लड़ाकों ने कमर्शियल जहाजों पर लगातार हमले किए, जिससे इस मार्ग से जहाजों का आवागमन कुछ कम हुआ। इस वजह से सऊदी की पाइपलाइन को आंशिक समाधान तो माना जा सकता है, लेकिन पूरी तरह भरोसेमंद विकल्प नहीं।
हेंडरसन यह भी बताते हैं कि, यूएई की नई योजनाएं भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, क्योंकि फुजैराह बंदरगाह पहले भी ईरानी हमले का निशाना बन चुका है। ऐसे में सिर्फ एक और पाइपलाइन बना लेना जरूरी नहीं कि, पूरी समस्या का हल साबित हो।
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