शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत, यौन उत्पीड़न मामले में अब नहीं होगी गिरफ़्तारी

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद गिरी को बड़ी राहत प्रदान की है। कथित यौन उत्पीड़न और पॉक्सो एक्ट से जुड़े इस मामले में अदालत ने दोनों की अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है, जिससे शंकराचार्य के अनुयायियों को बड़ी राहत मिली है।

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मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने की। दोनों पक्षों की लंबी दलीलों को सुनने के बाद जज ने अपना फैसला सुनाया। इस निर्णय के साथ ही फिलहाल दोनों संतों की गिरफ्तारी पर रोक लग गई है, जिसे कानूनी गलियारों और आध्यात्मिक जगत में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।

सार्वजनिक बयानबाजी पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न केवल अग्रिम जमानत मंजूर की, बल्कि मामले की संवेदनशीलता और गरिमा को देखते हुए एक कड़ा निर्देश भी जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस मामले से जुड़े किसी भी पक्ष, चाहे वह शिकायतकर्ता हो या आवेदक को मीडिया में इंटरव्यू देने या मामले पर सार्वजनिक बयानबाजी करने की अनुमति नहीं होगी। कोर्ट का मानना है कि इस तरह के गंभीर आरोपों में मीडिया ट्रायल न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

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उल्लेखनीय है कि, इस मामले में सुनवाई काफी समय से चल रही थी और अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 27 फरवरी 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। लगभग एक महीने के चिंतन और कानूनी बारीकियों के विश्लेषण के बाद जस्टिस सिन्हा की बेंच ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की है।

क्या है पूरा विवाद

यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब प्रयागराज की एक विशेष पॉक्सो अदालत ने पुलिस को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद गिरी के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया। यह आदेश आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक शिकायत के आधार पर दिया गया था।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि, आश्रम से जुड़े कुछ नाबालिग बच्चों के साथ यौन शोषण जैसी अमानवीय घटनाएं हुई हैं। निचली अदालत में कथित पीड़ित नाबालिगों के बयान भी दर्ज कराए गए थे और कुछ साक्ष्य भी पेश किए गए थे। इन प्राथमिक साक्ष्यों के आधार पर ही विशेष अदालत ने मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। जैसे ही एफआईआर की प्रक्रिया शुरू हुई, दोनों संतों ने गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

शंकराचार्य ने आरोपों को निराधार बताया

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने इन आरोपों को निराधार और षड्यंत्र से प्रेरित बताया। उनकी दलील थी कि, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक सम्मानित आध्यात्मिक पद पर आसीन हैं और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप केवल उनकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य से गढ़े गए हैं। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि, इस मामले में शिकायतकर्ता के इरादे संदिग्ध हैं और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है।

वहीं, दूसरी ओर शिकायतकर्ता के वकीलों ने पॉक्सो एक्ट की धाराओं की गंभीरता का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत का विरोध किया था। उनका कहना था कि, नाबालिगों के बयान दर्ज होना अपने आप में एक गंभीर साक्ष्य है और मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आरोपियों की कस्टडी जरूरी हो सकती है। हालांकि, हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद संतुलन बनाते हुए गिरफ्तारी से राहत देना उचित समझा, बशर्ते वे जांच में पूर्ण सहयोग करें।

अनुयायियों ने ली राहत की सांस

शंकराचार्य जैसे उच्च पदस्थ संत पर लगे इन आरोपों ने देशभर के सनातन धर्मावलंबियों के बीच चिंता पैदा कर दी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब इस मामले को लेकर सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर काफी चर्चा हो रही थी। अग्रिम जमानत मिलने से आश्रम और उनके अनुयायियों ने राहत की सांस ली है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक अंतरिम राहत है।

अदालत ने साफ किया है कि, कानूनी प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहेगी। संबंधित जांच एजेंसियां मामले की तह तक जाने के लिए अपनी जांच जारी रखेंगी। अग्रिम जमानत मिलने का अर्थ यह कतई नहीं है कि आरोपों से क्लीन चिट मिल गई है। इसका तात्पर्य केवल इतना है कि जांच के दौरान आरोपियों को जेल नहीं भेजा जाएगा, जब तक कि वे जमानत की शर्तों का उल्लंघन न करें।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर यह साबित किया है कि, कानून की नजर में हर व्यक्ति समान है, चाहे वह कितनी भी प्रभावशाली स्थिति में क्यों न हो। अब गेंद जांच एजेंसियों के पाले में है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि, वे बिना किसी दबाव के इस संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच करें ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

 

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