
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों और वैश्विक स्तर पर तेल-गैस की सप्लाई चेन में आए व्यवधान ने भारत सरकार को पूरी तरह से सतर्क कर दिया है। देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य के किसी भी संभावित संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक और कड़ा कदम उठाया है।
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सरकार के साथ साझा करना होगा डेटा
सरकार ने तत्काल प्रभाव से आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा-3 को लागू कर दिया है ताकि पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता और कीमतों पर सीधा नियंत्रण रखा जा सके। इस कानून के सक्रिय होने के बाद अब देश में काम कर रही सभी छोटी-बड़ी तेल और गैस कंपनियों के लिए अपने उत्पादन, स्टॉक और वितरण का पूरा डेटा सरकार के साथ साझा करना अनिवार्य हो गया है। सरकार का यह फैसला जमाखोरी रोकने और आपात स्थिति में ईंधन की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने की दिशा में एक सुरक्षा कवच माना जा रहा है।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी अस्थिरता पैदा कर दी है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए वैश्विक बाजार की कोई भी हलचल भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की रसोई पर सीधा असर डालती है। इसी खतरे को भांपते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने स्पष्ट किया है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा-3 के तहत एक राजपत्र अधिसूचना जारी की गई है।
स्टॉक लिमिट तय कर सकती है सरकार
इस अधिसूचना के माध्यम से पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) को नोडल एजेंसी के रूप में नामित किया गया है जो अब देश में मौजूद तेल और गैस के हर बैरल का हिसाब रखने वाली मुख्य इकाई होगी। पीपीएसी अब सभी पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन, प्रसंस्करण, शोधन, भंडारण और आयात-निर्यात से जुड़ी सूचनाओं को इकट्ठा करने और उनके विश्लेषण का कार्य करेगी ताकि सरकार आपातकालीन स्थितियों के लिए पहले से ही ठोस योजना तैयार कर सके।
आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा-3 सरकार को वह असाधारण शक्ति प्रदान करती है जिससे वह नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए बाजार में सीधा हस्तक्षेप कर सकती है। इस कानून के तहत केंद्र सरकार पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को पूरी तरह से नियंत्रित कर सकती है। सरकार के पास अब यह अधिकार है कि वह तेल कंपनियों पर स्टॉक की सीमा निर्धारित कर दे और व्यापार को विनियमित करे ताकि कोई भी कृत्रिम रूप से बाजार में ईंधन की कमी पैदा न कर सके।
आदेश का उल्लंघन गंभीर अपराध
इसके साथ ही सरकार कीमतें तय करने और जमाखोरी पर पूरी तरह रोक लगाने में भी सक्षम हो गई है। यह कानून विशेष रूप से उन बिचौलियों और कंपनियों पर नकेल कसेगा जो युद्ध जैसी स्थितियों का फायदा उठाकर अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि, इस अधिनियम के तहत जारी किए गए किसी भी आदेश का उल्लंघन एक गंभीर अपराध माना जाएगा जिसके लिए भारी जुर्माने के साथ-साथ जेल की सजा का भी प्रावधान है।
प्रशासनिक स्तर पर इस कानून को अधिक प्रभावी बनाने के लिए केंद्र सरकार ने धारा-5 का भी सहारा लिया है। इसके माध्यम से केंद्र अपनी शक्तियों को राज्य सरकारों को सौंप सकती है ताकि जमीनी स्तर पर जिला प्रशासन और स्थानीय अधिकारी तेल और गैस की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि देश के दूर-दराज के इलाकों में भी एलपीजी और पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति में कोई बाधा न आए।
अंतर्राष्ट्रीय मार्ग प्रभावित होने से उठाया कदम
वर्तमान में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए केवल पश्चिम एशिया पर निर्भर नहीं है बल्कि उसने रूस, अमेरिका, वेनेजुएला और ऑस्ट्रेलिया सहित लगभग चालीस देशों से अपने आयात संबंधों को विस्तार दिया है। इसके बावजूद वैश्विक मार्ग बाधित होने की स्थिति में घरेलू स्तर पर पारदर्शी डेटा होना अनिवार्य है ताकि जरूरत पड़ने पर तेल और गैस की राशनिंग या सही वितरण किया जा सके।

सरकार के इस कठोर रुख का मुख्य उद्देश्य आम आदमी को महंगाई और किल्लत के डर से बचाना है। जब कंपनियों के पास मौजूद हर बूंद का हिसाब सरकार के पास होगा, तो बाजार में डर का माहौल पैदा नहीं होगा और सप्लाई चेन सुचारू रूप से चलती रहेगी। यह रणनीति न केवल देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगी बल्कि परिवहन लागत को भी स्थिर रखने में मदद करेगी जिससे महंगाई पर लगाम लगी रहेगी।
कुल मिलाकर भारत सरकार ने प्रो-एक्टिव दृष्टिकोण अपनाते हुए वैश्विक संकट के भारतीय बाजार पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम करने की पूरी तैयारी कर ली है। आवश्यक वस्तु अधिनियम का यह प्रयोग देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित होगा।
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