बड़े सरकारी ठेकों में बहुजन उद्यमियों की अनदेखी पर राहुल गांधी का सवाल

इस पर सरकार के जवाब को लेकर राहुल गांधी ने चिंता जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि सरकार ने बताया कि इस संबंध में कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं है।

नई दिल्ली।लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार से सवाल उठाया है कि आखिर बहुजन उद्यमियों को देश के बड़े सार्वजनिक ठेकों से बाहर क्यों रखा जा रहा है। उन्होंने संसद में पूछे गए अपने प्रश्न और सरकार के जवाब का हवाला देते हुए इस मुद्दे को गंभीर बताया।

राहुल गांधी ने दो अप्रैल को लोकसभा में आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय से जुड़े एक लिखित प्रश्न के माध्यम से जानकारी मांगी थी। उन्होंने पूछा था कि पिछले वर्ष 16,500 करोड़ रुपये के सार्वजनिक कार्यों के ठेकों में से कितने ठेके दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के उद्यमियों को दिए गए।

इस पर सरकार के जवाब को लेकर राहुल गांधी ने चिंता जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि सरकार ने बताया कि इस संबंध में कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं है। उनके अनुसार, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।

उन्होंने यह भी कहा कि नीति के अनुसार सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में 25 प्रतिशत खरीद सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से की जानी चाहिए, जिसमें से चार प्रतिशत खरीद दलित और आदिवासी उद्यमियों से होना तय है। हालांकि, जब बड़े और लाभकारी सार्वजनिक ठेकों की बात आती है, तो सरकार इसे अनिवार्य नहीं मानती।रायबरेली से सांसद राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं है, बल्कि नीतिगत स्तर पर ऐसा ढांचा तैयार किया गया है, जो सामाजिक और आर्थिक न्याय को कमजोर करता है।

इस मामले में आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू ने संसद में जवाब देते हुए पिछले पांच वर्षों के लोक निर्माण और अवसंरचना ठेकों का ब्यौरा तो दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के उद्यमियों को दिए गए ठेकों का अलग से कोई डेटा उपलब्ध नहीं है।मंत्री ने यह भी कहा कि निर्माण कार्यों से जुड़े ठेकों में इस तरह की जानकारी रखना अनिवार्य नहीं है, इसलिए संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

राहुल गांधी ने यह भी सवाल उठाया कि क्या सरकार एससी और एसटी उद्यमियों से चार प्रतिशत खरीद के लक्ष्य को पूरा कर पाई है। इस पर भी सरकार ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया और कहा कि निर्माण ठेकों के लिए यह अनिवार्य प्रावधान लागू नहीं होता। इस मुद्दे को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है, क्योंकि यह सामाजिक न्याय और आर्थिक भागीदारी से जुड़ा अहम विषय माना जा रहा है।

Related Articles

Back to top button