
लखनऊ। कांग्रेस नेता और रायबरेली सांसद राहुल गांधी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पहले दोहरी नागरिकता मामले में एफआईआर दर्ज करने के आदेश, तो अब आय से अधिक संपत्ति को लेकर दायर याचिका पर अदालत का कड़ा रुख। दरअसल आय से अधिक संपत्ति मामले में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जो कदम उठाए, वे सामान्य अदालती कार्यवाही से कहीं अधिक गंभीर नजर आ रहे हैं।
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12 मई को होगी अगली सुनवाई
मामले की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति जफीर अहमद की पीठ ने इस मामले की सुनवाई न केवल बंद कमरे (इन-चैंबर) में की, बल्कि पूरी केस फाइल को सीलबंद कर सुरक्षित अभिरक्षा में रखने का आदेश भी दिया। इस केस की अगली सुनवाई 12 मई को होनी है। ऐसा लग रहा है कि, यह मामला अब महज एक याचिका नहीं, बल्कि एक बड़ी कानूनी गुत्थी बन चुका है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में गुरुवार का दिन गहमागहमी भरा रहा, जब राहुल गांधी से जुड़ी कथित आय से अधिक संपत्ति की याचिका टेबल पर आई। अदालत कक्ष के बाहर सुरक्षा और कौतूहल का माहौल था, लेकिन भीतर की कार्यवाही को पूरी तरह गोपनीय रखने के लिए इसे इन-चैंबर सुना गया। जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस जफीर अहमद की खंडपीठ ने मामले के दस्तावेजों और इसमें लगाए गए आरोपों की प्रकृति को भांपते हुए यह निर्णय लिया कि फाइलों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
साक्ष्यों को किया गया सीलबंद
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया कि याचिका और उससे संबंधित सभी साक्ष्यों को एक सीलबंद लिफाफे में रखा जाए और इसे वरिष्ठ रजिस्ट्रार की सुरक्षित अभिरक्षा में सौंप दिया जाए। अदालत का यह कड़ा रुख इस बात की ओर इशारा करता है कि, याचिका में पेश किए गए तथ्य या तो बहुत संवेदनशील हैं या फिर उनके सार्वजनिक होने से जांच की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अब यह सील सीधे 12 मई को अगली सुनवाई के दौरान ही न्यायपीठ के सामने खोली जाएगी।
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें कर्नाटक के एक भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर की गई याचिका में छिपी हैं। शिशिर ने अपनी याचिका में बेहद गंभीर दावे किए हैं, जिनमें आरोप लगाया गया है कि, राहुल गांधी ने अपने सार्वजनिक जीवन के दौरान ऐसे स्रोतों से संपत्ति अर्जित की है जिनका खुलासा नहीं किया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि, घोषित आय और वास्तविक संपत्तियों के बीच एक बड़ा अंतर है, जिसकी गहराई से पड़ताल की जानी चाहिए। केवल इतना ही नहीं, याचिका में इस जांच को किसी एक विभाग तक सीमित न रखकर केंद्र सरकार की तमाम बड़ी जांच एजेंसियों को पक्षकार बनाया गया है। इसमें सीबीआई, ईडी, सीबीडीटी और सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस जैसे भारी-भरकम नामों को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ता की मांग है कि, इन सभी एजेंसियों की एक संयुक्त या समन्वित जांच के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी किया जाए।
सतर्क दिखे सरकारी पक्ष के वकील
सुनवाई के दौरान जब यह मामला बेंच के सामने आया, तो सरकारी पक्ष की ओर से भी अतिरिक्त सतर्कता देखने को मिली। केंद्र और राज्य सरकार की एजेंसियों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि, उन्हें संबंधित विभागों और मंत्रालयों से इस विषय पर विशिष्ट लिखित निर्देश प्राप्त करने की आवश्यकता है। चूंकि मामला एक सिटिंग सांसद और प्रमुख विपक्षी नेता से जुड़ा है, इसलिए एजेंसियों ने किसी भी प्रकार की जल्दबाजी के बजाय समय मांगना उचित समझा।
अधिवक्ताओं ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि, वे अगली तारीख तक सभी आवश्यक दिशा-निर्देश और संभावित जवाब तैयार कर लेंगे। अदालत ने उनकी दलीलों को स्वीकार करते हुए सुनवाई को टालने का फैसला किया, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि इस बीच केस की गोपनीयता बरकरार रहे। यही कारण है कि, दस्तावेजों को सीलबंद रखने का फैसला लिया गया, ताकि किसी भी स्तर पर जानकारी लीक न हो सके।
यह पहली बार नहीं है जब एस. विग्नेश शिशिर ने राहुल गांधी को कानूनी मोर्चे पर घेरा हो। इससे पहले भी वह राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर दोहरी नागरिकता का सवाल उठाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटा चुके हैं। उस पुराने मामले के संदर्भ ने इस नई याचिका को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
कांग्रेस नेता ने नहीं दी प्रतिक्रिया
कानूनी जानकारों का मानना है कि याचिकाकर्ता ने इस बार आय को ढाल बनाया है, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आयकर कानूनों के दायरे में आता है। राहुल गांधी की ओर से फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन कांग्रेस के कानूनी सेल के सूत्र इसे राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। हालांकि, अदालत के भीतर जो प्रक्रिया चल रही है, वह विशुद्ध रूप से तथ्यों और कानूनी प्रक्रियाओं पर आधारित है।
अब सबकी निगाहें 12 मई की तारीख पर टिकी हैं, जब सुनवाई के दौरान सीलबंद फाइल वरिष्ठ रजिस्ट्रार के दफ्तर से निकलकर दोबारा जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस जफीर अहमद की मेज पर आएगी और ये स्पष्ट होगा कि, अदालत इन आरोपों को किस हद तक प्रथम दृष्टया सही मानती है।
गरमाया सियासी माहौल
क्या कोर्ट सीबीआई या ईडी को प्रारंभिक जांच के आदेश देगा या फिर याचिकाकर्ता के दावों को अपर्याप्त मानकर खारिज कर देगा, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन वर्तमान में, लखनऊ खंडपीठ की इन-चैंबर सुनवाई और फाइलों का सीलबंद होना इस बात की पुष्टि करता है कि मामला बेहद पेचीदा है। 12 मई को होने वाली सुनवाई न केवल राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। इस अदालती कार्रवाई ने प्रदेश और देश की सियासत में गर्मी ला दी है।
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