
लखनऊ। योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश के करोड़ों किसानों को राहत पहुंचाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री ने गेहूं खरीद की प्रक्रिया में आ रही तकनीकी बाधाओं को भांपते हुए फॉर्मर रजिस्ट्री की अनिवार्यता को पूरी तरह से समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री के इस फैसले से प्रदेश के उन लाखों किसानों को बड़ी संजीवनी मिली है, जो पिछले कई हफ्तों से सरकारी क्रय केंद्रों पर अपनी फसल बेचने के लिए केवल इसलिए संघर्ष कर रहे थे क्योंकि उनके पास अनिवार्य डिजिटल रजिस्ट्री उपलब्ध नहीं थी।
इसे भी पढ़ें- आधी आबादी’ के हक के लिए सड़क पर उतरे सीएम योगी, 15 हजार महिलाओं संग लखनऊ में चले पैदल
हक के आड़े नहीं आएगी तकनीकी समस्या
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट किया है कि, अन्नदाता की सुविधा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी तकनीकी प्रक्रिया को किसानों के हक के आड़े नहीं आने दिया जाएगा। इस फैसले के साथ ही अब प्रदेश के किसान पूर्व के वर्षों की भांति अपनी गेहूं की उपज को सरकारी क्रय केंद्रों पर बिना किसी मानसिक या तकनीकी दबाव के बेच सकेंगे।

उत्तर प्रदेश के कृषि प्रधान समाज में गेहूं की फसल की कटाई और उसकी सरकारी खरीद का समय किसी उत्सव से कम नहीं होता, लेकिन इस वर्ष नई तकनीकी व्यवस्था फॉर्मर रजिस्ट्री के कारण खरीद की रफ्तार काफी सुस्त पड़ गई थी। जमीनी स्तर से आ रही शिकायतों और किसानों की परेशानियों का संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न केवल इस अनिवार्यता को खत्म किया, बल्कि राज्य के सभी जिलाधिकारियों को सख्त लहजे में निर्देश जारी किए हैं कि इस आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को चेताया है कि, यदि किसी भी क्रय केंद्र पर फॉर्मर रजिस्ट्री न होने का बहाना बनाकर किसान को लौटाया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। सरकार का यह कदम साफ तौर पर संकेत देता है कि प्रशासन के लिए नियम-कानूनों से बढ़कर किसानों का आर्थिक हित और उनकी फसल का उचित मूल्य सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
लंबी कतारों से मिलेगी मुक्ति
सरकार के इस फैसले के पीछे की सबसे बड़ी वजह गेहूं खरीद की धीमी गति और किसानों के बीच बढ़ता असंतोष था। दरअसल, फॉर्मर रजिस्ट्री की जटिल प्रक्रिया और पोर्टल पर डेटा अपलोड करने में आ रही तकनीकी खामियों की वजह से कई किसान सरकारी केंद्रों की बजाय औने-पौने दामों पर बिचौलियों को फसल बेचने को मजबूर हो रहे थे।
मुख्यमंत्री ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए पुरानी व्यवस्था को बहाल करने का निर्देश दिया है, ताकि हर पात्र किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का सीधा लाभ मिल सके। इस फैसले के बाद अब किसानों को केवल अपना पुराना पहचान पत्र या सामान्य पंजीकरण दिखाकर फसल बेचने की सुविधा मिलेगी। इससे न केवल मंडियों में लगने वाली लंबी कतारों से मुक्ति मिलेगी, बल्कि गेहूं खरीद के सरकारी लक्ष्य को भी समय पर पूरा करने में मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि, सरकार का मूल उद्देश्य किसानों को उनकी मेहनत का फल बिना किसी परेशानी के दिलाना है। सीएम योगी ने अधिकारियों से कहा है कि, क्रय केंद्रों पर किसानों के लिए पेयजल, बैठने की व्यवस्था और फसल की तुलाई के पारदर्शी इंतजाम होने चाहिए।
ग्रामीण में ख़ुशी
उन्होंने जोर देकर कहा है कि, किसान हमारा अन्नदाता है और उसे दफ्तरों या तकनीकी पोर्टलों के चक्कर काटने के लिए मजबूर करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस बड़े बदलाव के बाद अब ग्रामीण क्षेत्रों के उन बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे किसानों को सबसे अधिक राहत मिलेगी, जिन्हें ऑनलाइन रजिस्ट्री करवाने में साइबर कैफे और सरकारी दफ्तरों की खाक छाननी पड़ती थी। अब वे अपनी उपज लेकर सीधे केंद्र पर जा सकते हैं और अपनी फसल की बिक्री कर सकते हैं।

राज्य सरकार के इस संवेदनशील निर्णय से पूरे प्रदेश के किसान संगठनों और ग्रामीण अंचलों में खुशी की लहर दौड़ गई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड तक के किसानों ने मुख्यमंत्री के प्रति आभार व्यक्त किया है। कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि वर्तमान समय में जब फसल तैयार होकर मंडी पहुंचने के लिए तैयार है, ऐसे में तकनीकी बाधाओं को हटाना सरकार का एक साहसिक और व्यावहारिक कदम है। इससे न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि बाजार में गेहूं की उपलब्धता भी बढ़ेगी। मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि वे खुद क्रय केंद्रों का औचक निरीक्षण करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी स्तर पर किसानों का शोषण न हो।
इसके अतिरिक्त, मुख्यमंत्री ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि, फसल की खरीद के बाद किसानों के भुगतान में किसी भी प्रकार की देरी न हो। उन्होंने स्पष्ट किया है कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से किसानों के बैंक खातों में पैसा समय से पहुंचना चाहिए।
फॉर्मर रजिस्ट्री की अनिवार्यता खत्म होने से अब खरीद का डेटा फीड करने में होने वाली देरी भी कम होगी, जिससे भुगतान प्रक्रिया में और अधिक गति आएगी। सरकार की इस पहल से उन छोटे और सीमांत किसानों को सबसे ज्यादा फायदा होगा, जिनके पास कम जोत है और जिनके पास तकनीकी संसाधनों का अभाव है। अब वे भी बड़े किसानों की तरह समान रूप से अपनी फसल सरकारी भाव पर बेच सकेंगे।
क्रय केन्द्रों पर बढ़ी गहमा गहमी
योगी सरकार का यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह किसानों के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से उत्तर प्रदेश ने खाद्यान्न उत्पादन और खरीद में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं, उसे बरकरार रखने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य हो गया था।
मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में अब पुरानी व्यवस्था के तहत ही गेहूं की खरीद सुचारू रूप से चलेगी और किसी भी किसान को यह महसूस नहीं होने दिया जाएगा कि तकनीकी जटिलताएं उसकी प्रगति का रास्ता रोक रही हैं। इस आदेश के बाद प्रदेश के सभी क्रय केंद्रों पर अब गहमागहमी बढ़ गई है और किसान उत्साह के साथ अपनी उपज लेकर केंद्रों की ओर रुख कर रहे हैं। आने वाले दिनों में गेहूं खरीद के आंकड़ों में एक बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक सकारात्मक संकेत होगा।
इसे भी पढ़ें- नासा के मैप में जगमगाया यूपी, अंतरिक्ष से दिखी योगी सरकार की बिजली क्रांति



