
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा एक बड़ा फैसला सोमवार को सूबे की राजधानी लखनऊ में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद कस्बे का नाम बदलकर परशुराम पुरी करने के प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी दे दी गई।
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आठ साल पुरानी है नाम बदलने की मांग
इस फैसले के साथ ही वर्षों से चली आ रही एक बड़ी मांग पूरी हो गई। सरकार का कहना है कि, यह कदम क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को उचित सम्मान देने की दिशा में उठाया गया है, क्योंकि यह स्थान भगवान परशुराम की जन्मस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त है और यहां उनका एक प्राचीन मंदिर भी स्थित है।

जलालाबाद का नाम बदलने की यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत मार्च 2018 में हुई थी। उस समय शाहजहांपुर नगर पालिका परिषद ने अपनी बोर्ड बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया था कि, कस्बे का नाम बदलकर परशुराम पुरी किया जाए। हालांकि, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और स्वीकृतियों की लंबी शृंखला के चलते यह मामला वर्षों तक लंबित रहा। इसके बाद सितंबर 2023 में नगर पालिका परिषद ने एक बार फिर इसी प्रस्ताव को बोर्ड बैठक में दोहराया और पुनः पारित किया, ताकि इसे आगे की प्रक्रिया के लिए मजबूती से भेजा जा सके।
2025 में केंद्र ने दी थी मंजूरी
इस पूरी प्रक्रिया में शाहजहांपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी की भूमिका भी अहम रही। उन्होंने अपनी संस्तुति के साथ यह प्रस्ताव प्रदेश सरकार को भेजा था, जिसके बाद राज्य सरकार ने इसकी समीक्षा कर इसे आगे केंद्र सरकार के पास भेज दिया। प्रस्ताव को केंद्र सरकार के स्तर पर भी विचार-विमर्श से गुजरना पड़ा।
आखिरकार 20 अगस्त, 2025 को केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के इस प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की। इसके बाद सोमवार को हुई कैबिनेट बैठक में इस फैसले को औपचारिक रूप से हरी झंडी दिखाई गई, जिससे अब जलालाबाद का नाम आधिकारिक तौर पर परशुराम पुरी हो जाएगा।
भगवान परशुराम की जन्मभूमि की मान्यता
शाहजहांपुर जिले का यह छोटा सा कस्बा धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। कई पौराणिक ग्रंथों और धार्मिक कथाओं में इस स्थान का उल्लेख भगवान परशुराम की जन्मभूमि के रूप में किया गया है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में पूजा जाता है। उन्हें विशेष रूप से क्षत्रिय संहारक तथा शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत योद्धा-ऋषि के रूप में जाना जाता है।
इस मान्यता को और मजबूती तब मिली जब वर्ष 2022 में सरकार ने इस स्थान को आधिकारिक रूप से परशुराम जन्मभूमि घोषित किया था। स्थानीय लोगों और धार्मिक विद्वानों का मानना है कि, इस स्थान और यहां स्थित प्राचीन मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। यहां मौजूद मंदिर में श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शन के लिए आते हैं और यह क्षेत्र धीरे-धीरे धार्मिक पर्यटन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी विकसित हो रहा है। स्थानीय समुदाय लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि, जब यह स्थान भगवान परशुराम की जन्मस्थली माना जाता है, तो इसका नाम भी इसी पहचान को दर्शाने वाला होना चाहिए न कि किसी और ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा हुआ।
जलालाबाद नाम का इतिहास
वहीं दूसरी ओर, जलालाबाद नाम के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है और इसे लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग मत प्रचलित हैं। ज्यादातर लोगों का मानना है कि शाहजहांपुर की इस तहसील का नाम मुगल बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के सम्मान में रखा गया था। मुगलकाल के दौरान कई कस्बों और शहरों के नाम तत्कालीन शासकों, सूबेदारों या प्रशासनिक अधिकारियों के नाम पर रखे जाते थे। जलालाबाद भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
यही वजह है कि लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि, इस कस्बे को उसकी वास्तविक सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के अनुरूप नाम दिया जाए, जो कि यहां की पौराणिक विरासत से मेल खाता हो। स्थानीय संगठनों और धार्मिक समूहों ने वर्षों से इस मुद्दे को प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर उठाया, जिसका नतीजा अब कैबिनेट की मंजूरी के रूप में सामने आया है।
योगी आदित्यनाथ सरकार अपने कार्यकाल के दौरान राज्य में कई ऐतिहासिक स्थानों, कस्बों और शहरों के नाम बदलने के फैसले पहले भी ले चुकी है। सरकार का तर्क रहा है कि, ये फैसले क्षेत्रों की सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों को पुनः स्थापित करने और स्थानीय पहचान को सम्मान देने के उद्देश्य से लिए जाते हैं। जलालाबाद को परशुराम पुरी नाम दिए जाने का यह फैसला भी उसी सिलसिले की एक कड़ी माना जा रहा है।
आगे की प्रक्रिया शुरू
कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें राजस्व रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेजों, सड़क संकेतकों, रेलवे स्टेशन (यदि लागू हो) और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर नए नाम को अद्यतन किया जाएगा। स्थानीय प्रशासन को इस बदलाव को सुचारू रूप से लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, ताकि आम जनता को किसी तरह की असुविधा न हो।
स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं में इस फैसले को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। कई लोगों का कहना है कि यह फैसला न केवल क्षेत्र की धार्मिक पहचान को मजबूत करेगा, बल्कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा होने की उम्मीद है। वहीं कुछ इतिहासकार और सामाजिक टिप्पणीकार इस तरह के नाम परिवर्तनों को लेकर अलग-अलग राय भी रखते हैं, जिसमें ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और नामकरण की राजनीति जैसे पहलू शामिल हैं।
फिलहाल, कैबिनेट की मंजूरी के साथ ही जलालाबाद का परशुराम पुरी के रूप में औपचारिक अस्तित्व जल्द ही सामने आने वाला है, और यह उत्तर प्रदेश के धार्मिक-सांस्कृतिक मानचित्र में एक नए अध्याय के रूप में दर्ज होगा।
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