महिलाओं को ही नहीं, पुरुषों को भी होता है दर्द, उनकी तकलीफ को भी गंभीरता से लेना चाहिए: अक्षय

हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में जब भी भावात्मक फिल्म बनती है, तो वह पूरी तरह से महिला पात्र के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती हैं, लेकिन अभिनेता अक्षय ओबेरॉय अपनी अपकमिंग फिल्म ‘लव लॉटरी’ में इस धारणा को खत्म करने की कोशिश करते नजर या रहे हैं।

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‘लव लॉटरी’ को लेकर सुर्खियों में

फिल्म के विषय पर चर्चा करते हुए अक्षय ने पुरुषों के भावनात्मक संघर्ष और समाज में उनके अनसुने दर्द को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। फिल्म ‘लव लॉटरी’ महज एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जेंडर से जुड़ी उन पुरानी बेड़ियों को तोड़ने की कोशिश है, जो पुरुषों को हमेशा मजबूत बने रहने के लिए मजबूर करती हैं। अक्षय ओबेरॉय का मानना है कि, यह फिल्म दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करेगी कि कमजोरी, आंसू और भावनात्मक उलझनें किसी एक जेंडर की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि ये मानवीय स्वभाव के अभिन्न अंग हैं।

Akshay Oberoi

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेताओं में शुमार अक्षय ओबेरॉय इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘लव लॉटरी’ को लेकर सुर्खियों में बने हुए हैं। अरविंद पांडे के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म एक रोमांटिक-कोर्टरूम ड्रामा है, जो अपनी लीक से हटकर कहानी की वजह से इंडस्ट्री में  सुर्खियां बटोर रही है।

फिल्म को लेकर अक्षय ओबेरॉय का एक्साइटमेंट साफ देखा जा सकता है, क्योंकि यह उनके करियर के उन महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में से एक है जो सीधे तौर पर सामाजिक मानदंडों को चुनौती देते हैं। अक्षय ने हाल ही में फिल्म के मूल संदेश और इसके पीछे की मंशा पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ‘लव लॉटरी’ का सबसे बड़ा उद्देश्य लोगों की उस संकीर्ण सोच को खोलना है जो जेंडर के आधार पर भावनाओं का बंटवारा करती है।

पुरुष भी करते हैं संघर्ष

उनके अनुसार, हमारा समाज अक्सर यह मान लेता है कि, दर्द और पीड़ित होने की स्थिति केवल महिलाओं के साथ जुड़ी होती है, जबकि पुरुष भी समान रूप से भावनात्मक आघात और उत्पीड़न का शिकार हो सकते हैं।

अक्षय ओबेरॉय ने फिल्म की गहराई को समझाते हुए कहा कि आज के दौर में जेंडर मुद्दों पर जितनी भी बातचीत होती है, वह अक्सर एकतरफा रह जाती है। लोग महिलाओं के अधिकारों और उनके दर्द पर तो खुलकर चर्चा करते हैं, जो कि बेहद जरूरी है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पुरुषों की आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है।

समाज में एक पुरुष से अपेक्षा की जाती है कि वह कभी कमजोर न पड़े, कभी रोए नहीं और हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला करे। यही मर्दानगी की गलत परिभाषा पुरुषों के अनुभवों को नजरअंदाज करने का कारण बनती है। अक्षय का कहना है कि फिल्म ‘लव लॉटरी’ इसी विचार को प्रमुखता से सामने लाती है कि पुरुष भी भावनात्मक रूप से संघर्ष कर सकते हैं, वे भी रिश्तों में पीड़ित हो सकते हैं और उनके दर्द को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाना चाहिए जितना किसी और के दर्द को।

दर्शकों की सोच को चुनौती

फिल्म की प्रकृति के बारे में बात करते हुए अक्षय ने स्पष्ट किया कि ‘लव लॉटरी’ किसी एक पक्ष का समर्थन करने या किसी को दोष देने के लिए नहीं बनाई गई है। यह फिल्म किसी पर कोई परिणाम थोपने का प्रयास नहीं करती, बल्कि यह दर्शकों के सामने एक आईना रखती है। इसका मकसद किसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि लोगों को यह सोचने का अवसर देना है कि जब हम समानता की बात करते हैं, तो उसमें पुरुषों के भावनात्मक स्वास्थ्य को भी शामिल किया जाना चाहिए।

अक्षय का मानना है कि, जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि, पुरुष भी भावनात्मक रूप से संघर्ष कर सकते हैं, तो इससे समाज में संवाद और अधिक गहरा और संवेदनशील होता है। यह किसी के दर्द को कम नहीं करता, बल्कि इंसानियत के नाते हर व्यक्ति के संघर्ष को मान्यता देता है।

एक अभिनेता के रूप में अक्षय ओबेरॉय हमेशा से ही ऐसी कहानियों की तलाश में रहते हैं जो केवल पर्दे तक सीमित न रहें, बल्कि समाज में एक सार्थक चर्चा को जन्म दें। उनका कहना है कि उन्हें ऐसी फिल्मों का हिस्सा बनना पसंद है, जो दर्शकों की सोच को चुनौती दें और उन्हें पुराने ढर्रों से बाहर निकालें।

समाज में चेतना जगाना है मकसद

‘लव लॉटरी’ उनके लिए एक ऐसा ही माध्यम है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अगर यह फिल्म रिलीज होने के बाद लोगों के बीच जेंडर की बारीकियों और पुरुषों के नजरअंदाज किए गए भावनात्मक संघर्षों पर सच्ची बातचीत शुरू कर पाती है, तो वह मानेंगे कि उन्होंने एक कलाकार के रूप में कुछ सार्थक हासिल कर लिया है। उनके लिए सफलता का पैमाना केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़े नहीं, बल्कि फिल्म द्वारा समाज में पैदा की गई चेतना है।

Akshay Oberoi

अक्षय ओबेरॉय ने यह भी साझा किया कि, एक पुरुष के रूप में स्वयं उनके लिए भी इन बारीकियों को समझना एक सीखने वाला अनुभव था। कोर्टरूम की सेटिंग में रिश्तों की इस जटिलता को देखना दर्शकों के लिए भी काफी नया और दिलचस्प होगा। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे कानूनी और सामाजिक नजरिया जेंडर के आधार पर बदल जाता है और कैसे एक व्यक्ति अपनी भावनाओं के लिए संघर्ष करता है।

अक्षय का मानना है कि ‘लव लॉटरी’ जेंडर की उन महीन रेखाओं को छूती है जिन्हें अक्सर बॉलीवुड की मसाला फिल्मों में छोड़ दिया जाता है। यह फिल्म न्याय, प्यार और भावनाओं के बीच के उस धुंधले क्षेत्र को टटोलती है जहाँ सच और झूठ के बीच केवल मानवीय संवेदनाएं ही रह जाती हैं। फिल्म ‘लव लॉटरी’ के अलावा, अक्षय ओबेरॉय के पास कई अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स भी हैं। वह जल्द ही सुपरस्टार यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक’ में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई देंगे।

‘टॉक्सिक’ में दिखेंगे अक्षय

‘टॉक्सिक’ 4 जून को सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए तैयार है और अक्षय के फैंस उन्हें इस बड़े बजट की फिल्म में देखने के लिए काफी उत्साहित हैं। एक तरफ जहां ‘टॉक्सिक’ एक बड़े कैनवास की एक्शन फिल्म हो सकती है। वहीं ‘लव लॉटरी’ अक्षय के अभिनय कौशल के उस पहलू को दिखाएगी जो बेहद संवेदनशील और विचारोत्तेजक है।

अक्षय ओबेरॉय का यह संतुलन उन्हें समकालीन अभिनेताओं में अलग खड़ा करता है, क्योंकि वे व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ सार्थक सिनेमा की ओर भी निरंतर कदम बढ़ा रहे हैं। कुल मिलाकर, अक्षय ओबेरॉय की ‘लव लॉटरी’ पुरुष और महिला के बीच के भावनात्मक द्वंद्व को एक नए नजरिए से पेश करने की एक ईमानदार कोशिश है।

 

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