मिशन 2027: 15 दिन में दूसरी बार मथुरा पहुंचे मोहन भागवत, संतों से साथ बनी ख़ास रणनीति

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर जब भी कोई बड़ी हलचल होती है, तो उसके तार कहीं न कहीं धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों से जुड़े होते हैं। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य में एक बार फिर सांस्कृतिक पुनर्जागरण की लहर तेज होती दिख रही है।

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ब्रज से तय होगा यूपी का रास्ता

अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और काशी विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप के बाद, अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  का पूरा ध्यान कान्हा की नगरी मथुरा पर केंद्रित हो गया है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की मथुरा में बढ़ती सक्रियता और महज 15 दिनों के भीतर उनके दो दौरों ने राजनीतिक गलियारों में यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि ब्रज क्षेत्र अब संघ की वैचारिक और सांगठनिक रणनीति का नया केंद्र बनने जा रहा है।

Mohan Bhagwat in Vrindavan A

उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता तय करने में ब्रज क्षेत्र की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। मोहन भागवत का मंगलवार को मथुरा का दौरा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम में शिरकत भर नहीं था, बल्कि यह एक व्यापक रणनीतिक संदेश था। 15 दिनों के भीतर यह उनका दूसरा और इस साल का तीसरा मथुरा प्रवास है। संघ प्रमुख का किसी एक क्षेत्र में इतनी बार आना इस बात का संकेत है कि, संघ यहां वैचारिक एकीकरण की जमीन तैयार कर रहा है।

जगद्गुरु द्वाराचार्य स्वामी राजेंद्र दास के नेतृत्व वाले सनातन संस्थान मलूक पीठ में आयोजित कार्यक्रम में भागवत की उपस्थिति ने ब्रज के प्रभावशाली संत समाज के साथ संघ के रिश्तों को नई मजबूती दी है। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि मिशन मथुरा के लिए सरकार और संगठन एक ही पृष्ठ पर हैं।

हिन्दू समुदाय को एकजुट करना मकसद

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, संघ और भाजपा एक हिंदू सभ्यतागत त्रिकोण को पूर्ण करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस त्रिकोण के पहले दो शीर्ष अयोध्या और काशी पर काम काफी हद तक पूरा हो चुका है। अयोध्या राजनीतिक और कानूनी रूप से सुलझ चुका है और काशी का पुनर्विकास आधुनिक भारत के लिए एक मॉडल बन गया है।

अब मथुरा को सांस्कृतिक अस्मिता की अगली सीमा के रूप में पेश किया जा रहा है। संघ मथुरा को केवल एक चुनावी मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि हिंदू समाज को जोड़ने वाली एक दीर्घकालिक वैचारिक प्रयोगशाला के रूप में देख रहा है। संघ की मंशा है कि मथुरा के माध्यम से हिंदू समुदाय के भीतर एक ऐसा भाव जागृत किया जाए जो जातिगत दीवारों को तोड़कर सांस्कृतिक गौरव के नाम पर एकजुट हो सके।

मोहन भागवत के दौरों के पीछे एक सूक्ष्म राजनीतिक गणित भी छिपा है। मार्च के दौरे के समय उनके साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की मौजूदगी ने बड़े संकेत दिए थे। ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा के जरिए इन वर्गों को हिंदुत्व के बड़े दायरे में समेटने की कोशिश की जा रही है। संघ चाहता है कि, कान्हा की भक्ति और सांस्कृतिक विरासत के मुद्दे पर पिछड़ी जातियों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ा रहे। यह रणनीति विशेष रूप से विपक्षी दलों के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की काट के रूप में देखी जा रही है।

घुसपैठ पर चिंता

संघ प्रमुख ने अपने पिछले दौरों में केवल धार्मिक चर्चा ही नहीं की, बल्कि राष्ट्रवाद के मुद्दे को भी प्रखरता से उठाया। केशव धाम में हुई अखिल भारतीय कार्यकारी समिति की बैठक में भागवत ने अवैध प्रवासन और घुसपैठ को लेकर जो चिंता जताई थी। वह चुनावी नैरेटिव सेट करने की एक बड़ी कोशिश थी। उन्होंने आम लोगों से घुसपैठियों की पहचान करने और अधिकारियों को सूचित करने की अपील की थी। यह संदेश केवल यूपी के लिए नहीं, बल्कि उन सभी राज्यों के लिए था जहां जनसांख्यिकीय बदलाव एक मुद्दा है।

Mohan Bhagwat in Vrindavan

मथुरा जैसे संवेदनशील धार्मिक केंद्र से सुरक्षा और राष्ट्रवाद की बात करना, मतदाताओं के बीच एक विशेष प्रकार की ध्रुवीकरण और जागरूकता पैदा करने का जरिया माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश भाजपा इस समय सांगठनिक फेरबदल और कार्यकर्ताओं के भीतर नए उत्साह के संचार की प्रक्रिया से गुजर रही है। मोहन भागवत के दौरों से आरएसएस के जमीनी कार्यकर्ताओं को एक स्पष्ट दिशा मिल रही है।

सूत्रों का कहना है कि, संघ अब सीधे तौर पर बूथ स्तर के नेटवर्क को सक्रिय करने में मदद कर रहा है। सरकार और संगठन के बीच जो भी वैचारिक या समन्वय की कमियां थीं, उन्हें इन दौरों के माध्यम से दूर किया जा रहा है। भागवत का संतों के साथ बैठना और मुख्यमंत्री का उसी मंच पर होना यह सुनिश्चित करता है कि, चुनावी घोषणापत्र से लेकर जमीनी प्रचार तक, मथुरा और ब्रज की विरासत को प्रमुखता दी जाएगी।

मथुरा का होगा कायाकल्प

जैसे-जैसे संघ की सक्रियता मथुरा में बढ़ रही है, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के लिए नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। यदि संघ मथुरा को एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन में बदलने में सफल रहता है, तो विपक्ष के लिए महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर ध्रुवीकरण को रोकना मुश्किल होगा। मथुरा का कायाकल्प और वहां की धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल एक ऐसा ईकोसिस्टम तैयार कर रहा है, जो सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने की ताकत रखता है।

मोहन भागवत के इन दौरों के मायने केवल 2027 के विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं हैं। यह भारत के सांस्कृतिक पुनरुद्धार के उस बड़े एजेंडे का हिस्सा है, जिसे संघ अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष (2025-26) के उपलक्ष्य में और अधिक विस्तार देना चाहता है। अयोध्या और काशी के बाद मथुरा पर बढ़ता ध्यान यह बताता है कि, आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति केवल विकास के दावों पर नहीं, बल्कि विरासत और अस्मिता के उन प्रतीकों पर लड़ी जाएगी, जिन्हें संघ ने अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा है। मथुरा अब केवल एक धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि वह राजनीतिक केंद्र बन चुका है जहाँ से आने वाले वर्षों की राजनीति की पटकथा लिखी जा रही है।

 

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