
लखनऊ। उत्तर प्रदेश ने विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सभी दल अपनी-अपनी बिसात बिछाने में जुट गये हैं। इस बार राजनीतिक बिसात के केंद्र बिंदु में हैं बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम, जिन्हें भारत रत्न देने की मांग को लेकर विपक्ष एकजुट गया है। दशकों तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती और कांग्रेस के दिग्गज नेता राहुल गांधी अब एक सुर में कांशीराम को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, इस मांग के पीछे केवल सम्मान की भावना नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी माने जाने वाले दलित वोटबैंक को अपने पाले में लाने की एक सोची-समझी रणनीति भी है।
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अखिलेश ने जताई सहमति
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर बेहद सधे हुए अंदाज में अपनी सहमति जताते हुए कहा कि, कांशीराम के अनुयायी लंबे समय से उन्हें भारत रत्न देने की मांग कर रहे हैं और समाजवादी पार्टी पूरी तरह से इस मांग में उनका समर्थन करती है। उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उस दौर की याद दिलाई जब नेताजी मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने हाथ मिलाया था।

अखिलेश यादव का कहना है कि, उस सपा-बसपा गठबंधन ने न केवल देश को एक नई राजनीतिक दिशा दी थी, बल्कि भाजपा के रथ को भी रोकने में सफलता पाई थी। सपा मुखिया ने तर्क दिया कि, उस ऐतिहासिक गठबंधन की ताकत ही थी जिसने भाजपा को बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर अपनाने पर मजबूर कर दिया था। अखिलेश ने कहा, कांशीराम के संघर्ष के साथी और उनके आदर्शों पर चलने वाले करोड़ों लोग चाहते हैं कि, उन्हें वह सम्मान मिलना ही चाहिए, जिसके वे हकदार हैं।
राहुल गांधी ने केंद्र को लिखा पत्र
बता दें कि, प्रदेश में इस राजनीतिक हलचल की शुरुआत उस वक्त हुई, जब कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हाल ही में कांशीराम जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए लखनऊ आये और वहां उन्होंने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की। इसके साथ ही राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को औपचारिक पत्र लिखकर कांशीराम को भारत रत्न देने की पुरजोर सिफारिश की है।
अगर कांशीराम जी पं. नेहरू के दौर में होते, वो कांग्रेस पार्टी से मुख्यमंत्री होते।
वक़्त आ गया है हिंदुस्तान में राजनीति को बदलने का।
सबकी हिस्सेदारी की राजनीति
बहुजनों के अधिकार की राजनीति
भारत के संविधान की दिखाई राजनीति pic.twitter.com/5Mcf8PFPLN— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) March 13, 2026
उन्होंने अपने पत्र को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा करते हुए कांशीराम को सामाजिक न्याय का महान योद्धा और बहुजन चेतना का मार्गदर्शक बताया। राहुल गांधी का मानना है कि, दलितों, पिछड़ों और वंचित समाज को राजनीति की मुख्यधारा में लाने का जो कार्य कांशीराम ने किया, वह अतुलनीय है। कांग्रेस का यह रुख यूपी में उनकी ‘दलित-मुस्लिम-पिछड़ा’ (PDA) वाली राजनीति को और मजबूत करने की कोशिश माना जा रहा है। कांग्रेस चाहती है कि, वह खुद को दलित हितों के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में स्थापित करे।
भारत सरकार से सामाजिक न्याय के महान योद्धा और बहुजन चेतना के मार्गदर्शक मान्यवर कांशीराम जी को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग करता हूं।
यह सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान कांशीराम जी के साथ उस पूरे आंदोलन को श्रद्धांजलि होगी जिसने करोड़ों बहुजनों को हक़, हिस्सेदारी और आत्मसम्मान… pic.twitter.com/XF9MGjcj4J
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) March 15, 2026
मायावती ने कांग्रेस पर साधा निशाना
वहीं, बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ-साथ कांग्रेस के इतिहास पर भी निशाना साधा। उन्होंने कांशीराम जयंती के अवसर पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि जिस प्रकार कांग्रेस ने अपने शासनकाल में बाबा साहेब अंबेडकर को भारत रत्न देने में दशकों की देरी की, वैसी ही ऐतिहासिक भूल वर्तमान की भाजपा नीत एनडीए सरकार को नहीं दोहरानी चाहिए।

मायावती ने स्पष्ट किया कि समतामूलक समाज की स्थापना और दलितों के उत्थान में कांशीराम का योगदान किसी भी सम्मान से ऊपर है, लेकिन उन्हें भारत रत्न देना संविधान की भावनाओं के अनुरूप होगा। मायावती का यह बयान अपनी विरासत को बचाने और अपने कैडर को यह संदेश देने की कोशिश है कि कांशीराम का असली सम्मान केवल बसपा ही सुनिश्चित कर सकती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि, अखिलेश यादव और राहुल गांधी का अचानक कांशीराम प्रेम यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में लगभग 21 प्रतिशत दलित आबादी है, जो किसी भी दल की हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती है। पिछले कुछ चुनावों में बसपा के कमजोर होने के बाद इस वोटबैंक में सेंध लगाने की होड़ मची है। जहां सपा और कांग्रेस मिलकर इस वोटबैंक को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। वहीं मायावती अपनी जमीन बचाने की जुगत में हैं और इसके लिये वह बूथ लेबल पर भी बैठकें आयोजित कर रही है और जनता से सीधे जुड़ने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि विपक्ष ने अब सामाजिक न्याय के प्रतीक पुरुष को ही अपनी राजनीति का केंद्र बना लिया है।
और गरमा सकता है सियासी पारा
कांशीराम को भारत रत्न देने की यह मांग उत्तर प्रदेश की भावी राजनीति का ट्रेलर है। ऐसे में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि, केंद्र सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है। यदि सरकार इस दिशा में कदम बढ़ाती है, तो इसका श्रेय लेने की होड़ मचेगी और यदि नहीं, तो विपक्ष इसे दलितों के अपमान का मुद्दा बनाकर चुनावी मैदान में उतरेगा। फिलहाल, लखनऊ से लेकर दिल्ली तक कांशीराम के नाम पर मची यह सियासी रार मची हुई है और आने वाले दिनों में पारा और हाई होने के आसार बन रहे हैं।
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