
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में वैसे तो अभी एक साल का समय बाकी है, लेकिन सभी छोटी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने जीत के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। बीजेपी भी प्रदेश में तीसरी बार सत्ता में आने की जोर आजमाइश में जुट गई है। इसके लिए संगठन की मजबूती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और फेरबदल की प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के नेतृत्व में जिला, क्षेत्र और प्रदेश स्तर पर नई टीम तैयार की जा रही है। खबर ये भी आ रही है कि, क्षेत्रीय अध्यक्षों को भी बदलने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी।
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मिल रहीं उपेक्षा की शिकायतें
इसे लेकर सूत्रों का कहना है कि, शीर्ष नेतृत्व तक चहेतों को बढ़ावा देने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की शिकायतें पहुंची हैं, जिससे ये बदलाव किया जा रहा है। आपको बता दें कि, भाजपा ने उत्तर प्रदेश को संगठनात्मक रूप से 6 क्षेत्रों पश्चिम, ब्रज, अवध, काशी, गोरखपुर और कानपुर में बांटा है। इन क्षेत्रों में क्षेत्रीय अध्यक्ष जिलाध्यक्षों के कामकाज पर नजर रखते हैं, टिकट के दावेदारों की अनुशंसा करते हैं और प्रदेश नेतृत्व तक फीडबैक पहुंचाते हैं।

पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय अध्यक्षों को विधान परिषद भेजने की परंपरा शुरू की है, जिससे यह पद और भी महत्वपूर्ण हो गया है। अब चुनावी तैयारियों के मद्देनजर इन सभी 6 क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदलने की योजना बनाई जा रही है। प्रदेश में संगठन का ढांचा 1918 मंडलों, 98 संगठनात्मक जिलों और 6 क्षेत्रों में विभाजित है। मंडल अध्यक्षों के नामों का ऐलान लगभग पूरा हो चुका है, सिर्फ 70-75 मंडल अध्यक्ष बाकी हैं। जिलाध्यक्षों की बात करें, तो 98 में से अब तक 95 जिलों में नए नाम घोषित किए जा चुके हैं।
मार्च के आखिर तक पूरी हो जाएंगी नियुक्तियां
हाल ही में यानी बीते फरवरी महीने के अंत में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने 11 नए जिलाध्यक्षों की सूची जारी की थी, जिसमें शामली, अमरोहा, सहारनपुर, अयोध्या, सिद्धार्थनगर, मिर्जापुर जैसे जिलों के नाम शामिल हैं। इन जिलों में जिलाध्यक्षों की तैनाती के दौरान जातीय संतुलन का विशेष ध्यान रखा गया। यहां 24 ब्राह्मण, 35 ओबीसी और अन्य वर्गों को जगह दी गई है। बाकी बचे 3-4 जिलों जैसे वाराणसी, चंदौली, देवरिया और अंबेडकरनगर के जिलाध्यक्षों के नामों पर अभी मंथन चल रहा है।
पर्यवेक्षकों ने सभी जिलों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से राय ली है और रिपोर्ट प्रदेश नेतृत्व को सौंपने की प्रक्रिया चल रही है। होली के बाद या मार्च के अंत तक बाकी नियुक्तियां पूरी होने की संभावना है। इसके बाद जिला इकाइयों का गठन होगा, जिसमें जिला उपाध्यक्ष, महामंत्री, सचिव आदि पद भरे जाएंगे।
क्षेत्रीय अध्यक्षों के बदलाव की वजह बताई जा रही है कि, कई क्षेत्रीय अध्यक्षों पर चहेतों को प्राथमिकता देने, निष्पक्षता की कमी और कार्यकर्ताओं की शिकायतों की रिपोर्ट शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची है। पार्टी नई और जोश से भरी टीम के साथ चुनाव में उतरना चाहती है, ताकि किसी भी स्तर पर कार्यकर्ता असन्तुष्ट न हों। लखनऊ से दिल्ली तक संपर्क साधे जा रहे हैं, संघ पदाधिकारियों से भी चर्चा हो रही है। कुर्सी बचाने की होड़ में कई दावेदार सक्रिय हो उठे हैं। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने स्पष्ट किया है कि, संगठन में बड़े परिवर्तन लागू किए जाएंगे और हजारों खाली पद योग्य कार्यकर्ताओं से भरे जाएंगे।
वीआईपी कल्चर खत्म करने पर जोर
पार्टी में ‘कार्यकर्ता सर्वप्रथम’ मंत्र अपनाते हुए वीआईपी कल्चर खत्म करने पर जोर दिया जा रहा है। संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह के साथ मिलकर दिल्ली में सूचियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। यह बदलाव मिशन 2027 का हिस्सा है। पार्टी का लक्ष्य है कि, जिला से क्षेत्र के माध्यम से टिकट दावेदारों की सही सूची प्रदेश तक पहुंचे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय बैठकों का दौर चला रहे हैं, जिसमें सरकार, संगठन और संघ के बीच तालमेल सुनिश्चित किया जा रहा है।

इन बैठकों में विकास कार्यों को जन-जन तक पहुंचाने, पंचायत चुनावों की तैयारी और 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति पर फोकस है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, ये संगठनात्मक फेरबदल भाजपा की चुनावी रणनीति को मजबूत बनाएंगे। दरअसल, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव इस बार पीडीए के फार्मूले से चुनाव मैदान में उतरेंगे। ये फार्मूला बीजेपी को पहुंचा सकता है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के पीडीए फार्मूले ने बीजेपी के काफी वोट काट दिए थे। यही वजह है कि, भाजपा इस बार कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती है।
जातीय समीकरण साध रही बीजेपी
पार्टी इस बार के चुनाव में जातीय समीकरण जैसे ब्राह्मण, ओबीसी और दलित को मिलाकर क्षेत्रीय संतुलन और युवा-महिला कार्यकर्ताओं को जगह देकर विपक्ष के पीडीए को टक्कर देने की तैयारी कर रही है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि, अगर, क्षेत्रीय अध्यक्षों में बड़े बदलाव हुए, तो कई वरिष्ठ नेताओं को विधान परिषद भेजा जा सकता है या अन्य कोई बड़ा पद दिया जा सकता है।
प्रदेश में भाजपा की यह कवायद 2027 में लगातार तीसरी जीत के लिए महत्वपूर्ण है। संगठन मजबूत होने से बूथ स्तर तक पहुंच बढ़ेगी और कार्यकर्ताओं में उत्साह आएगा। उम्मीद जताई जा रही है कि, अगले कुछ दिनों में क्षेत्रीय अध्यक्षों की नई सूची का ऐलान हो जाएगा, जिससे चुनावी माहौल और रफ्तार पकड़ लेगा।
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