
वॉशिंगटन। मिडिल ईस्ट की धरती एक बार फिर बारूद की गंध और मिसाइलों की गड़गड़ाहट से दहल रही है, लेकिन इस बीच दुनिया की महाशक्ति अमेरिका ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने युद्ध की दिशा और दशा को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पहली बार आधिकारिक तौर पर संकेत दिया है कि ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान को लंबा खींचने का वाशिंगटन का कोई इरादा नहीं है। रुबियो के मुताबिक, यह सैन्य कार्रवाई महीनों नहीं, बल्कि हफ्तों में अपने अंजाम तक पहुंच सकती है।
इसे भी पढ़ें- मिडिल ईस्ट में महायुद्ध: ईरान की घेराबंदी के लिए अमेरिका ने भेजे 50,000 सैनिक, पैराट्रूपर्स भी रवाना
वैश्विक समुदाय को आश्वस्त करने की कोशिश
फ्रांस में आयोजित G7 देशों के विदेश मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मार्को रुबियो ने साफ किया कि, अमेरिका अपने रणनीतिक लक्ष्यों को तय समय सीमा के भीतर या उससे भी पहले हासिल करने की क्षमता रखता है। इस बयान ने जहां एक ओर तनाव कम होने की उम्मीद जताई है, वहीं दूसरी ओर पेंटागन की हलचल कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त डेडलाइन और ईरान का झुकने से इनकार, इस क्षेत्र को एक भीषण विनाश की ओर धकेल रहा है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अंतरराष्ट्रीय मंच से वैश्विक समुदाय को आश्वस्त करने की कोशिश की है कि अमेरिका ईरान में किसी लंबी जंग में नहीं फंसना चाहता। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान के खिलाफ मौजूदा ऑपरेशन बेहद सटीक और प्रभावी है। रुबियो ने कहा, हमारा लक्ष्य स्पष्ट है और हम इसे हफ्तों के भीतर हासिल कर लेंगे। इसके लिए हमें बड़े पैमाने पर जमीनी सेना उतारने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
रुबियो का यह बयान उस समय आया है जब दुनिया भर में यह डर फैला हुआ है कि, कहीं यह संघर्ष दूसरे वियतनाम या इराक युद्ध में न बदल जाए। हालांकि, राजनयिक स्तर पर नरमी दिखाने के बावजूद रुबियो ने यह स्वीकार किया कि कुछ अमेरिकी सैनिकों की तैनाती इलाके में की जा रही है। उन्होंने तर्क दिया कि, यह तैनाती केवल इसलिए है ताकि भविष्य में किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए अमेरिका के पास सभी विकल्प खुले रहें।
ईरान में बड़ी सैन्य लामबंदी
भले ही विदेश मंत्री मार्को रुबियो जमीनी युद्ध की संभावना को नकार रहे हों, लेकिन युद्ध के मैदान से आ रही तस्वीरें और रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) की गतिविधियां कुछ और ही संकेत दे रही हैं। जानकारी के मुताबिक, अमेरिका ने हजारों की संख्या में मरीन और विशिष्ट एयरबोर्न सैनिकों को मिडिल ईस्ट की ओर भेजना शुरू कर दिया है। यह एक बड़ी सैन्य लामबंदी मानी जा रही है जो किसी भी बड़े हमले का आधार बन सकती है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि, सैनिकों का पहला बड़ा दल इसी मार्च के अंत तक एक विशाल एम्फीबियस जहाज के जरिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकाने पर पहुंच जाएगा। एम्फीबियस जहाजों का इस्तेमाल आमतौर पर समुद्र से जमीन पर हमला करने या सैनिकों को उतारने के लिए किया जाता है। सैनिकों की इस भारी तैनाती ने उन आशंकाओं को बल दिया है कि, अगर हवाई हमलों से बात नहीं बनी, तो यह जंग अनिवार्य रूप से जमीनी स्तर तक फैल जाएगी।
ट्रंप ने ईरान की दी चेतावनी
व्हाइट हाउस की कमान संभाल रहे डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरे संकट पर अपना रुख बेहद सख्त कर लिया है। ट्रंप ने अपनी सिग्नेचर स्टाइल में ईरान को सीधी और आखिरी चेतावनी जारी की है। ट्रंप ने ईरान को ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को फिर से खोलने के लिए महज 10 दिन की समय सीमा दी है। बता दें कि, यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवन रेखा माना जाता है और ईरान अक्सर इसे बंद करने की धमकी देता रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि, 10 दिन के भीतर ईरान ने व्यापारिक मार्ग को सुचारू नहीं किया और अपनी आक्रामक गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई, तो अमेरिका उसके ऊर्जा ढांचे पर भीषण हमला करेगा। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि, ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ उसके तेल और गैस ठिकाने हैं और उन पर हमला ईरान को घुटनों पर लाने के लिए पर्याप्त होगा। ट्रंप के इस अल्टीमेटम ने पूरे मिडिल ईस्ट के बाजार में हलचल पैदा कर दी है।
युद्ध के नगाड़ों के बीच अमेरिका ने कूटनीति का दरवाजा भी पूरी तरह बंद नहीं किया है। ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के माध्यम से तेहरान को एक 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव को ईरान के लिए एग्जिट रूट के तौर पर देखा जा रहा है। इस गोपनीय दस्तावेज में अमेरिका ने ईरान के सामने कुछ कड़ी शर्तें रखी हैं, जिन्हें मानना ईरान के लिए आत्मसम्मान और अस्तित्व की लड़ाई बन गया है।
ईरान की तीखी प्रतिक्रिया
प्रस्ताव की मुख्य शर्तों में यूरेनियम संवर्धन को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह रोकना और ईरान के विवादास्पद मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करना शामिल है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को पूरी तरह फ्रीज कर दे ताकि इजराइल और क्षेत्र के अन्य सहयोगियों के लिए खतरा खत्म हो सके। पाकिस्तान इस मध्यस्थता में एक पुल की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन राह आसान नहीं दिख रही।
ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों और ट्रंप की डेडलाइन पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने वाशिंगटन के शांति प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया है। अराघची ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बात करते हुए कहा, जब हमारी संप्रभुता पर हमले हो रहे हों और हमारे लोग मारे जा रहे हों, तब बातचीत करना हमारे लिए अस्वीकार्य है। हम किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे।

ईरानी नेतृत्व का कहना है कि अमेरिका एक तरफ प्रस्ताव भेज रहा है और दूसरी तरफ मरीन कमांडो की तैनाती कर रहा है, जो उसकी दोहरी नीति को दर्शाता है। ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने उसके ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया, तो वह इसका भारी और ऐतिहासिक जवाब देगा। तेहरान के इस कड़े रुख ने कूटनीतिक कोशिशों को लगभग बेअसर कर दिया है और अब सबकी नजरें युद्ध के अगले चरण पर टिकी हैं। इस खूनी संघर्ष के आंकड़े रूह कंपा देने वाले हैं।
गहरा रहा मानवीय संकट
रिपोर्टस के अनुसार, ईरान में अब तक 1900 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। इसमें सुरक्षा बलों के साथ-साथ बड़ी संख्या में नागरिक भी शामिल हैं। इसके अलावा 20 हजार से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिससे ईरान के अस्पतालों और बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव पड़ रहा है। शहरों के शहर खंडहर में तब्दील हो रहे हैं और मानवीय संकट गहराता जा रहा है।
नुकसान केवल ईरान तक सीमित नहीं है। इस सैन्य अभियान में अमेरिकी सेना को भी अपनी कीमत चुकानी पड़ी है। अब तक की जानकारी के मुताबिक, अमेरिका के 300 से ज्यादा सैनिक इस संघर्ष में घायल हुए हैं, जबकि 13 जांबाज सैनिकों की मौत हो चुकी है। अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर विरोध के स्वर उठने लगे हैं, जिसके कारण ट्रंप प्रशासन जल्द से जल्द निर्णायक जीत हासिल कर अभियान खत्म करना चाहता है।
आसमान छुएंगी तेल की कीमतें
आने वाले 10 दिन वैश्विक राजनीति और मिडिल ईस्ट के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं। यदि ट्रंप की डेडलाइन समाप्त होने तक ईरान अपना रुख नहीं बदलता है, तो विश्व को एक ऐसी भीषण सैन्य कार्रवाई देखने को मिल सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हो सकती है।
मार्को रुबियो का हफ्तों वाला दावा हकीकत बनेगा या यह एक लंबा खूनी संघर्ष साबित होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि ईरान की सेना अमेरिकी टेक्नोलॉजी के सामने कितनी देर टिक पाती है। फिलहाल, मिडिल ईस्ट एक ऐसे ज्वालामुखी पर बैठा है जो कभी भी फट सकता है।
इसे भी पढ़ें- उत्तराखंड में भी दिखा मिडिल ईस्ट संकट का असर, गहराया बिजली संकट, अघोषित कटौती शुरू



