बंगाल में ढहा ममता का किला, बीजेपी के हाथ में आई सत्ता की चाबी, कौन बनेगा सीएम?

 कोलकाता। भारत के राजनीतिक इतिहास में साल 2026 के विधानसभा चुनाव बदलाव की एक ऐसी आंधी लेकर आए हैं, जिसने कई पुराने किलों को ढहा दिया है और नए सियासी समीकरणों को जन्म दिया है। पश्चिम बंगाल से लेकर केरल और असम से लेकर तमिलनाडु तक, जनता का फैसला चौंकाने वाला रहा है। बंगाल में ममता बनर्जी के अभेद्य किले को ध्वस्त करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता की चाबी हासिल कर ली है, तो वहीं असम में बीजेपी ने अपनी पकड़ को और भी मजबूत करते हुए दोबारा सरकार बना ली है।

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तेज हुई सीएम चुनने की प्रक्रिया

दक्षिण भारत की बात करें, तो केरल में हर पांच साल में सरकार बदलने का रिवाज बरकरार रहा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है। वहीं, तमिलनाडु में सिनेमा के पर्दे से सियासत के मैदान में उतरे थलापति विजय ने अपनी नई पार्टी के साथ वो कर दिखाया है, जिसने स्थापित द्रविड़ राजनीति की चूलें हिला दी हैं। इन नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि साल 2026 भारतीय राजनीति में बड़े उलटफेर का साल साबित होने वाला है।

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पश्चिम बंगाल के नतीजों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक दशक से अधिक समय तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को भाजपा के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। इस जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में मुख्यमंत्री के चुनाव की प्रक्रिया भी तेज कर दी है।

भाजपा संसदीय बोर्ड ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री चुनाव के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। उनके साथ ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी को सह-पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा ने इस जीत को ऐतिहासिक बनाने के लिए शपथ ग्रहण समारोह की तारीख भी बेहद प्रतीकात्मक चुनी है।

पश्चिम बंगाल में नई भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण समारोह 9 मई को होगा, जो महान कवि और दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती का दिन है। भाजपा इस कदम के जरिए बंगाली अस्मिता और संस्कृति के साथ अपना गहरा जुड़ाव प्रदर्शित करना चाहती है।

ढही ममता बनर्जी की ताकत

बंगाल के इन चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया है। मुर्शिदाबाद से वरिष्ठ कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने नतीजों को लेकर एक बड़ा और बेबाक बयान दिया है। उन्होंने न केवल पार्टी बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर हुई हार को भी स्वीकार किया। अधीर रंजन चौधरी ने सीधे शब्दों में आकलन पेश करते हुए कहा कि, ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत अब ढह चुकी है। उन्होंने स्वीकार किया कि, इस चुनावी जंग में हुमायूं कबीर जैसे नेताओं ने जीत हासिल की है, लेकिन वे खुद यानी अधीर रंजन चौधरी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। उनका यह बयान कांग्रेस की बंगाल में कमजोर होती स्थिति और तृणमूल के पतन की ओर इशारा करता है।

वहीं केरल की बात करें, तो वहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) ने एक ऐसी जीत दर्ज की है जिसने वामपंथी मोर्चे (एलडीएफ) के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। विधानसभा चुनावों में निर्णायक जीत के एक दिन बाद, केपीसीसी प्रमुख सनी जोसेफ ने निवर्तमान मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन पर तीखा हमला बोला है।

35 सीटों पर सिमटी एलडीएफ

सनी जोसेफ ने मंगलवार को विजयन सरकार पर आरोप लगाया कि, उन्होंने केरल में हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा दिया, जिसे राज्य की जागरूक जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है। जोसेफ ने खुद पेरावूर सीट से वरिष्ठ सीपीआई (एम) नेता के.के. शैलजा जैसी दिग्गज को हराकर अपनी जीत का परचम लहराया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल सीटों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस राजनीति के प्रति जनता का आक्रोश है जो दमन और हिंसा पर आधारित थी।

सनी जोसेफ ने वामपंथी दलों को आत्ममंथन की सलाह देते हुए कहा कि सीपीआई (एम) को अपनी हार का गंभीरता से आकलन करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से कन्नूर जैसे वामपंथी गढ़ों में एलडीएफ की हार का जिक्र करते हुए कहा कि इन इलाकों में वामपंथ का कमजोर होना व्यापक जन असंतोष का संकेत है। जोसेफ ने एक बड़ा दावा करते हुए यह भी कहा कि यूडीएफ को मिली 102 सीटों में केवल कांग्रेस समर्थकों का ही नहीं, बल्कि उन वास्तविक मार्क्सवादी कार्यकर्ताओं का भी योगदान है, जो पिनारयी विजयन की कार्यशैली से नाराज थे। इस चुनाव में एलडीएफ महज 35 सीटों पर सिमट कर रह गया है, जो केरल के वामपंथी आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका है।

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दक्षिण भारत के ही एक और महत्वपूर्ण राज्य तमिलनाडु में भी इतिहास रचा गया है। अभिनेता से राजनेता बने थलापति विजय की पार्टी तमिझगा वेत्री कज़गम (TVK) ने अपने पहले ही चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए सबको हैरान कर दिया है। नतीजों के तुरंत बाद विजय को उनकी पार्टी के विधायक दल का नेता चुन लिया गया है। विजय की इस सफलता ने तमिलनाडु की उस पारंपरिक राजनीति में एक नया विकल्प खड़ा कर दिया है, जो दशकों से दो बड़े द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। युवाओं के बीच विजय की लोकप्रियता और उनके द्वारा उठाए गए बुनियादी मुद्दों ने उन्हें सत्ता के गलियारे तक पहुंचा दिया है।

शपथ ग्रहण नौ मई को

असम में भी भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत रखी है और वहां दोबारा सरकार बनाने के आंकड़े हासिल कर लिए हैं। असम में विकास और सुरक्षा के मुद्दों पर जनता ने एक बार फिर कमल पर भरोसा जताया है। इन चार राज्यों के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि, उत्तर से लेकर दक्षिण तक भारतीय मतदाता अब प्रदर्शन और बदलाव को प्राथमिकता दे रहा है। भाजपा के लिए बंगाल में जीतना और असम को बरकरार रखना एक बड़ी उपलब्धि है, तो वहीं कांग्रेस के लिए केरल की सत्ता में वापसी एक संजीवनी की तरह है।

अब सबकी नजरें 9 मई को बंगाल में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह पर टिकी हैं। अमित शाह और मोहन चरण मांझी की देखरेख में भाजपा किस चेहरे को बंगाल की कमान सौंपती है, यह देखना दिलचस्प होगा। साथ ही, केरल में कांग्रेस अब एक नई शुरुआत की ओर देख रही है, जहां वह भ्रष्टाचार और हिंसा के आरोपों से मुक्त एक स्वच्छ प्रशासन देने का दावा कर रही है।

तमिलनाडु में विजय का अगला कदम क्या होगा और वह किस तरह से द्रविड़ राजनीति के नए नायक बनकर उभरेंगे, इस पर भी विश्लेषकों की गहरी नजर है। भारत की यह नई राजनीतिक तस्वीर 2026 के इन चुनावों से पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है, जहां अब पुराने दिग्गजों की विदाई और नए चेहरों का उदय हो रहा है।

 

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