होर्मुज पर ईरान ने तैनात की मिसाइलें, उड़ीं ट्रंप के दावों की धज्जियां

वाशिंगटन। मिडिल ईस्ट की राजनीति और सैन्य समीकरणों में एक ऐसा मोड़ आ गया है, जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को सकते में डाल दिया है। पिछले कई महीनों से व्हाइट हाउस और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह हुंकार भर रहे थे कि, ईरान की सैन्य कमर टूट चुकी है और तेहरान अब दोबारा सिर उठाने लायक नहीं बचा है।

इसे भी पढ़ें- अमेरिका को ईरान की खुली धमकी, होर्मुज में दोबारा घुसे तो तबाह कर देंगे, ट्रंप ने दिखाए कड़े तेवर

ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर उठे सवाल

मार्च में राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि ईरानी थल सेना, नौसेना और वायुसेना को लगभग नेस्तनाबूद कर दिया गया है, लेकिन हाल ही में लीक हुई अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की सीक्रेट असेसमेंट रिपोर्ट ने इन ऊंचे दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं।

hormuz

रिपोर्ट यह संकेत दे रही है कि ईरान ने न केवल अपनी मिसाइल ताकत को बचाए रखा है, बल्कि वह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन, होर्मुज स्ट्रेट पर अब भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है। यह खबर ऐसे समय में आई है जब वैश्विक तेल बाजार पहले से ही अस्थिर हैं और अमेरिका के भीतर ट्रंप प्रशासन की युद्ध रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं।

अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ा है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस जलडमरूमध्य के आसपास ईरान की कुल 33 मिसाइल साइट्स स्थित हैं, जिनमें से ताजा खुफिया जानकारी के अनुसार 30 साइट्स अब भी पूरी तरह से एक्टिव या आंशिक रूप से ऑपरेशनल मोड में हैं।

होर्मुज से होती है 20% कच्चे तेल की सप्लाई

गौरतलब है कि, दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। अगर ईरान की ये साइट्स सक्रिय हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि अमेरिकी युद्धपोत और अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकर ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की जद से बाहर नहीं हुए हैं। ट्रंप प्रशासन ने दावा किया था कि, इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमलों ने इन ठिकानों को मलबे में तब्दील कर दिया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि ईरान का मिसाइल इन्फ्रास्ट्रक्चर उम्मीद से कहीं ज्यादा लचीला साबित हुआ है।

खुफिया रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि, ईरान ने हमलों के दौरान अपनी सैन्य संपत्ति को बचाने के लिए डिसेप्शन और अंडरग्राउंड तकनीकों का बखूबी इस्तेमाल किया। डेटा के अनुसार, ईरान अब भी अपने लगभग 70 फीसदी मोबाइल मिसाइल लॉन्चरों को सुरक्षित रखने में कामयाब रहा है। ये मोबाइल लॉन्चर ईरान की सबसे बड़ी ताकत हैं क्योंकि इन्हें ट्रैक करना और नष्ट करना बेहद मुश्किल होता है।

इसके साथ ही, युद्ध पूर्व के मिसाइल स्टॉक का भी करीब 70 फीसदी हिस्सा अभी सुरक्षित बताया जा रहा है, जिसमें लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं जो पूरे मध्य पूर्व में किसी भी अमेरिकी बेस को निशाना बना सकती हैं। रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान की लगभग 90 फीसदी अंडरग्राउंड मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च फैसिलिटी फिर से आंशिक या पूरी तरह से क्रियाशील हो चुकी हैं।

ईरान के सैन्य ढांचे को नहीं खत्म कर सका अमेरिका

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि, अमेरिका की हवाई कार्रवाई ईरान के सैन्य ढांचे को पूरी तरह खत्म करने में इसलिए विफल रही क्योंकि हमलों की रणनीति में एक बुनियादी खामी थी। अमेरिकी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि हमलों के दौरान कई महत्वपूर्ण भूमिगत ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करने के बजाय सिर्फ उनके प्रवेश द्वारों को बंद करने तक ही सीमित रखा गया था। इसके पीछे की मुख्य वजह अमेरिका के पास बंकर-बस्टर हथियारों के स्टॉक की कमी बताई जा रही है।

बंकर-बस्टर मिसाइलें महंगी होती हैं और इनका उत्पादन समय लेता है। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए हजारों की संख्या में टोमहॉक और क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया, लेकिन ईरान के गहरे भूमिगत मिसाइल शहरों को जमींदोज करने के लिए जो भारी क्षमता वाले हथियार चाहिए थे, उनकी सप्लाई सीमित थी। इस सैन्य अभियान ने अमेरिका के खुद के शस्त्रागार पर भी गहरा असर डाला है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस संघर्ष के दौरान अमेरिका ने करीब 1100 लॉन्ग-रेंज क्रूज मिसाइलें, 1000 से ज्यादा टोमहॉक मिसाइलें और 1300 से अधिक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलें दागीं। इतने बड़े पैमाने पर हथियारों के इस्तेमाल ने अमेरिकी डिफेंस इन्वेंट्री में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है, जिसे भरने में कई साल लग सकते हैं।

नाटो और यूरोपीय देश चिंतित 

यही वजह है कि नाटो और यूरोपीय देश अब गहरी चिंता में हैं। उन्हें डर है कि अगर मिडिल ईस्ट में दोबारा पूर्ण पैमाने पर युद्ध छिड़ा, तो अमेरिका अपने बचे-खुचे हथियारों को खुद के लिए बचाएगा, जिससे यूक्रेन जैसे देशों को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के वे दावे अब खोखले नजर आ रहे हैं जिनमें उन्होंने कहा था कि ईरान कई सालों तक लड़ने लायक नहीं बचेगा।

missiles in Hormuz

खुफिया रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बावजूद व्हाइट हाउस अपने पुराने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ओलिविया वेल्स ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि, जो लोग ईरान के फिर से शक्तिशाली होने की बात कर रहे हैं, वे दरअसल ईरानी प्रोपेगेंडा का शिकार हैं।

हालांकि, प्रशासन के भीतर भी इसे लेकर दो फाड़ की स्थिति है। एक तरफ ट्रंप और उनके करीबी मंत्री अपनी जीत का ढिंढोरा पीट रहे हैं, वहीं इंटेलिजेंस एजेंसियां बार-बार आगाह कर रही हैं कि, ईरान की सैन्य क्षमता को कम आंकना एक आत्मघाती भूल साबित हो सकती है। सीजफायर के बावजूद दोनों देशों के बीच होर्मुज स्ट्रेट में छोटी-मोटी झड़पें इस बात का प्रमाण हैं कि ईरान अपनी संप्रभुता और सैन्य पहुंच को दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है।

ईरान की 30 मिसाइलें एक्टिव

वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह स्पष्ट है कि ईरान और अमेरिका के बीच का यह संघर्ष खत्म नहीं हुआ है, बल्कि सिर्फ एक ठहराव की स्थिति में है। ईरान की 30 मिसाइल साइट्स का एक्टिव होना न केवल सामरिक चुनौती है, बल्कि यह डोनाल्ड ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ पॉलिसी पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

अगर संघर्ष दोबारा शुरू होता है, तो अमेरिका को उन हथियारों के साथ मैदान में उतरना होगा जिनकी संख्या अब काफी कम हो चुकी है। दूसरी ओर, ईरान ने हमलों से बच निकलने और अपने ढांचे को दोबारा खड़ा करने की जो क्षमता दिखाई है, वह उसे भविष्य की वार्ताओं में एक मजबूत स्थिति प्रदान करती है। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप प्रशासन अपनी सैन्य रिपोर्टों को स्वीकार कर अपनी रणनीति बदलेगा या फिर मिडिल ईस्ट एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा होगा।

 

इसे भी पढ़ें- मार्क रुबियो की दो टूक, खाड़ी में उतरेगी अमेरिकी सेना, खत्म करेगी होर्मुज की घेरेबंदी

Related Articles

Back to top button