
इस्लामाबाद। सिंधु नदी प्रणाली का पानी रुकने की आशंका ने पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान और सेना प्रमुख आसिम मुनीर को बेचैन कर दिया है। इस्लामाबाद की ओर से भारत के खिलाफ लगातार तीखे बयान आ रहे हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि, पाकिस्तान का एक पुराना और कट्टर प्रतिद्वंद्वी देश अफगानिस्तान इस मुद्दे पर खुलकर भारत के पक्ष में खड़ा नजर आ रहा है। अफगान नागरिकों का कहना है कि, जिस मुल्क ने कभी 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर होते देखा था, उसके साथ अब वैसा ही सलूक होना चाहिए जैसा भारत कर रहा है।
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भारत ने हाल ही में सिंधु जल संधि (IWT) से जुड़े एक विवाद पर हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) के फैसले को मानने से इनकार कर दिया है। भारत का रुख रहा है कि, यह मामला उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर की संस्था द्वारा तय नहीं किया जा सकता। भारत के इस कड़े रुख की अफगानिस्तान में जमकर तारीफ हो रही है।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच इन दिनों रिश्ते बेहद तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं और इसी माहौल में सोशल मीडिया पर अफगान यूजर्स खुलकर लिख रहे हैं कि पाकिस्तान चाहे जितना भी विरोध या शिकायत करे, भारत को सिंधु का पानी रोकने के अपने फैसले पर अडिग रहना चाहिए।
पीओके में पाक आर्मी का खुला विरोध
इसी सिलसिले में अफगानिस्तान में शिक्षा, स्वतंत्रता, न्याय और शांति जैसे मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले ‘फजल अफगान’ नाम के एक एक्स हैंडल ने भारत के समर्थन में एक पोस्ट साझा की। इस पोस्ट में लिखा गया है कि, भारत को सिंधु जल की आपूर्ति स्थगित ही रखनी चाहिए और पाकिस्तानी सेना, जिसे व्यंग्यात्मक रूप से 93 हजार वाली टीम कहा गया, को अपनी स्थिति पर रोने-गिड़गिड़ाने दिया जाए। पोस्ट में सीधे तौर पर यह संदेश दिया गया कि, आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला देश जल-सहयोग की उम्मीद नहीं रख सकता।
उसी अफगान हैंडल ने एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें बड़ी भीड़ के बीच कुछ सैनिकों की वर्दी की पैंटें हवा में लहराई जाती दिख रही हैं। दावा किया गया कि, यह दृश्य पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओके) का है, जहां स्थानीय जनता इन दिनों पाकिस्तानी सैन्य प्रशासन के खिलाफ खुलकर सड़कों पर उतर रही है और अपनी नाराजगी जाहिर कर रही है। इस वीडियो के कैप्शन में एक तीखा व्यंग्य किया गया, कहा गया कि दुनिया में सब कुछ अस्थायी होता है, लेकिन पाकिस्तानी सेना का यह “अपमान-समारोह” मानो स्थायी परंपरा बन चुका है।
1971 के आत्मसमर्पण की याद
दरअसल “93 हजार” का यह जिक्र इतिहास के एक बेहद अपमानजनक अध्याय की ओर इशारा करता है। 16 दिसंबर 1971 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में भारतीय सेना के सामने पाकिस्तान के करीब 93,000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था। ढाका के रेस कोर्स मैदान में पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष सरेंडर के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे।

यह घटना आधुनिक सैन्य इतिहास के सबसे बड़े आत्मसमर्पणों में गिनी जाती है और आज भी पाकिस्तान के लिए एक गहरे राष्ट्रीय अपमान के रूप में याद की जाती है। इसी घटना का हवाला देकर अफगान सोशल मीडिया यूजर्स पाकिस्तानी सेना पर तंज कस रहे हैं।
पाकिस्तान में शुरू हुई पानी की किल्लत
सिंधु जल संधि को लेकर भारत के मौजूदा कड़े रुख ने पाकिस्तान की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। अब तक इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के दबाव में भारत अपना फैसला बदल देगा, लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। गर्मी का मौसम शुरू होते ही पाकिस्तान में पानी की किल्लत को लेकर आशंकाएं गहरा गई हैं।
इसी वजह से इस्लामाबाद ने हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर वैश्विक समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की। पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि, यदि सिंधु जल संधि को फिर से पूरी तरह लागू नहीं किया गया, तो इससे कागजों पर बनी पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाएंगे।
भारत के पक्ष में अफगान नागरिक
यह पूरा घटनाक्रम दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में आ रहे बदलाव को भी दर्शाता है। पारंपरिक रूप से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच धार्मिक और सामरिक निकटता की चर्चा होती रही है, लेकिन बीते कुछ समय से दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, आतंकवाद के आरोप-प्रत्यारोप और आपसी अविश्वास ने रिश्तों को गहरा नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में अफगान नागरिकों का भारत के पक्ष में खुलकर सामने आना यह संकेत देता है कि, क्षेत्रीय समीकरण अब पुराने खांचों से आगे बढ़ रहे हैं। जहां एक तरफ पाकिस्तान खुद को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग महसूस कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ भारत को इस विवाद में अप्रत्याशित समर्थन मिल रहा है, भले ही वह केवल सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं के स्तर पर ही क्यों न हो।
भारत ने अपनाया सख्त रुख
फिलहाल भारत ने अपने रुख में किसी तरह की नरमी के संकेत नहीं दिए हैं। सरकार का कहना है कि, जब तक सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद पर पाकिस्तान ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक जल-सहयोग जैसे मुद्दों पर सामान्य स्थिति बहाल करना संभव नहीं है।
पाकिस्तान की ओर से भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गुहार लगाई जा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि, उसे राजनयिक और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव भारत के फैसले पर कोई असर डाल पाता है या नहीं।
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