
नई दिल्ली। भारतीय उपभोक्ताओं के लिए आने वाले दिन आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं। एक तरफ जहां वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर ईरान और इजराइल के बीच बढ़ती तल्खी और होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित नाकेबंदी ने कच्चे तेल की आपूर्ति को बाधित कर रखा है, वहीं अब देश के सामने एक नया और अधिक गंभीर संकट पाम ऑयल के रूप में खड़ा हो गया है।
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आम आदमी की जेब पर असर
यह संकट केवल रसोई के बजट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपके सुबह के साबुन से लेकर शाम के स्नैक्स तक हर चीज़ को महंगा करने की क्षमता रखता है। भारत, जो अपनी खाद्य तेल की जरूरतों के लिए विदेशी बाजारों पर अत्यधिक निर्भर है, अब इंडोनेशिया की बदलती घरेलू नीतियों के कारण एक ऐसी स्थिति में फंस गया है, जहां कीमतों पर नियंत्रण पाना मुश्किल होता जा रहा है। पाम ऑयल की वैश्विक किल्लत और बढ़ती मांग के बीच भारतीय बाजार में उत्पादों की लागत बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।

भारत दुनिया के उन देशों में शुमार है, जहां पाम ऑयल की खपत सबसे अधिक है। आंकड़ों के अनुसार, भारत को अपनी विशाल जनसंख्या और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सालाना लगभग 9.5 मिलियन टन पाम ऑयल की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, घरेलू स्तर पर पाम ऑयल का उत्पादन न के बराबर है। देश के भीतर ताड़ के तेल का उत्पादन महज 400,000 टन से भी कम होता है, जो कुल मांग का 5 प्रतिशत भी नहीं है। इस भारी अंतर को पाटने के लिए भारत पूरी तरह से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों, मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया पर निर्भर रहता है।
भारत के लिए संकट की घड़ी
पाम ऑयल के उत्पादन के लिए विशिष्ट जलवायु की आवश्यकता होती है, जिसमें निरंतर वर्षा और अत्यधिक जल की उपलब्धता अनिवार्य है। दक्षिण-पूर्व एशिया की भौगोलिक स्थिति इन पेड़ों के लिए सबसे अनुकूल है, यही कारण है कि वहां से होने वाली जरा सी भी सप्लाई बाधा भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए संकट का सबब बन जाती है।
वर्तमान संकट की सबसे बड़ी वजह इंडोनेशिया सरकार द्वारा लिया गया एक रणनीतिक फैसला है। भारत अपनी जरूरत का लगभग आधा पाम ऑयल अकेले इंडोनेशिया से मंगाता है। अब इंडोनेशिया ने अपनी निर्यात नीति में बड़ा बदलाव करते हुए पाम ऑयल का इस्तेमाल घरेलू स्तर पर ‘B50’ बायोडीजल बनाने के लिए करने का निर्णय लिया है। इंडोनेशिया अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ाने के लिए खाद्य तेल को ईंधन में परिवर्तित कर रहा है।
इस कदम का सीधा अर्थ यह है कि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात के लिए उपलब्ध होने वाला पाम ऑयल अब काफी कम हो जाएगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इंडोनेशिया के इस फैसले से वैश्विक बाजार में सालाना 15 से 20 लाख टन पाम ऑयल की कमी हो जाएगी। जब दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक देश से आपूर्ति कम होती है, तो इसका सीधा असर कीमतों में उछाल के रूप में दिखाई देता है और भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति किसी दोहरी मार से कम नहीं है क्योंकि यहां मांग लगातार बढ़ रही है और विकल्प सीमित हैं।
बिगड़ेगा मासिक बजट
पाम ऑयल का संकट केवल खाना पकाने के तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक जीवनशैली के लगभग हर उत्पाद का एक अनिवार्य हिस्सा है। एफएमसीजी सेक्टर, जो साबुन, शैम्पू, और डिटर्जेंट जैसे उत्पाद बनाता है, पाम ऑयल का सबसे बड़ा औद्योगिक उपभोक्ता है। साबुन और शैम्पू में झाग बनाने के लिए पाम ऑयल से निकलने वाले फैटी एसिड और ग्लिसरीन का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।

यदि कच्चे माल के रूप में पाम ऑयल की कीमतें बढ़ती हैं, तो हिंदुस्तान यूनिलीवर और गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स जैसी दिग्गज कंपनियों के पास अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। अनुमान लगाया जा रहा है कि, आने वाले हफ्तों में इन उत्पादों की कीमतों में 5 से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यह वृद्धि मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के मासिक बजट को बिगाड़ने के लिए काफी है।
महंगाई की यह आंच केवल सफाई के उत्पादों तक ही नहीं, बल्कि सौंदर्य प्रसाधनों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तक भी पहुंच रही है। लिपस्टिक, फेस क्रीम, लोशन और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों की बनावट और स्थायित्व बनाए रखने के लिए पाम ऑयल एक मुख्य घटक होता है। कॉस्मेटिक कंपनियां पहले से ही उच्च विनिर्माण लागत से जूझ रही हैं और अब पाम ऑयल की कमी उनके मार्जिन पर दबाव डालेगी। इसके साथ ही, बच्चों और युवाओं के बीच लोकप्रिय स्नैक्स जैसे बिस्किट, चिप्स, और फ्राइड नमकीन भी महंगे होने की कगार पर हैं।
महंगे होंगे स्नैक्स
पारले, ब्रिटानिया और हल्दीराम जैसी कंपनियां अपने उत्पादों को तलने और बेक करने के लिए बड़े पैमाने पर पाम ऑयल का इस्तेमाल करती हैं। पाम ऑयल की लागत बढ़ने से पैकेट के आकार में कटौती हो सकती है या फिर सीधे तौर पर एमआरपी बढ़ाई जा सकती है। इससे न केवल शहरी उपभोक्ता बल्कि ग्रामीण बाजार भी प्रभावित होगा जहां इन सस्ते स्नैक्स की भारी मांग रहती है।
वर्तमान में भारत एक ऐसी स्थिति में है जहां उसे दो तरफा मोर्चे पर लड़ना पड़ रहा है। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चा तेल महंगा हो रहा है, जिससे परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है। वहीं दूसरी ओर, पाम ऑयल के संकट ने रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं की उत्पादन लागत को बढ़ा दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में अगर किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि या नाकेबंदी होती है, तो जहाजों के रूट लंबे हो जाएंगे, जिससे समुद्री माल ढुलाई की दरों में और इजाफा होगा।
कृषि नीतियों पर पुर्नविचार की जरूरत
इसका परिणाम यह होगा कि जो पाम ऑयल पहले से ही महंगा है, वह भारत पहुंचते-पहुंचते और भी अधिक महंगा हो जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि खाद्य तेल और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से खुदरा महंगाई दर पर दबाव बढ़ेगा, जिससे ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो सकती है। इस गहरे होते संकट ने भारत को अपनी कृषि नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
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