बंगाल चुनाव के पहले चरण में खूनी तांडव, हुमायूं कबीर और सुवेंदु सरकार पर हमला

पश्चिम बंगाल। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र के महापर्व का आगाज एक बार फिर उम्मीदों के विपरीत खूनी संघर्ष और चीख-पुकार के बीच हुआ। 152 विधानसभा सीटों पर आज हुए पहले चरण के मतदान के दौरान बंगाल की धरती एक बार फिर राजनीतिक हिंसा से लाल हो गई। कहीं पोलिंग बूथों पर सरेआम लाठियां चलीं, तो कहीं ईवीएम मशीनों के साथ सरेराह खिलवाड़ के चौंकाने वाले आरोप लगे। मुर्शिदाबाद से लेकर मालदा और कूचबिहार से लेकर सिलीगुड़ी तक, आज पूरे दिन सिर्फ और सिर्फ अराजकता की तस्वीरें सामने आईं, जिसने न केवल शांतिपूर्ण मतदान के दावों की पोल खोल दी, बल्कि चुनाव आयोग की सुरक्षा व्यवस्था को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

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मुर्शिदाबाद और कूचबिहार में भारी बवाल

आज सुबह जैसे ही मतदान की प्रक्रिया शुरू हुई, लगा था कि मतदाता शांति से अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, लेकिन सूरज चढ़ने के साथ ही राज्य का पारा भी हाई हो गया। सबसे ज्यादा तनाव मुर्शिदाबाद के नौदा इलाके में देखा गया। यहाँ एजेयूपी (AJUP) प्रमुख और रेजीनगर से उम्मीदवार हुमायूं कबीर के काफिले पर उपद्रवियों ने ईंटों और लाठियों से हमला कर दिया। कबीर की कार के शीशे चकनाचूर हो गए और टीएमसी व एजेयूपी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी झड़प हुई। कबीर ने मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों पर निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए इस हमले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

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उधर, कूचबिहार के तूफानगंज में हालात इतने बेकाबू हो गए कि वहां तैनात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवानों को मोर्चा संभालना पड़ा। मतदान केंद्र के बाहर असामाजिक तत्वों ने डेरा जमा लिया था और मतदाताओं को डरा-धमका रहे थे। स्थिति को हाथ से निकलता देख जवानों ने लाठीचार्ज किया और उपद्रवियों को वहां से खदेड़ा। इसी तरह दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज में बीजेपी उम्मीदवार सुवेंदु सरकार पर हुए हमले ने सनसनी फैला दी। सुवेंदु को सूचना मिली थी कि एक बूथ पर जैमिंग की जा रही है, लेकिन जब वे वहां पहुंचे, तो टीएमसी समर्थकों ने उन्हें घेरकर बुरी तरह पीटा। सुवेंदु का आरोप है कि पुलिस की आंखों के सामने उन पर लाठियां बरसाई गईं।

मालदा में अधिकारियों को बनाया बंधक

मालदा के मोथाबाड़ी इलाके में तो जनता का गुस्सा सीधे अधिकारियों पर ही फूट पड़ा। यहाँ ईवीएम खराब होने के कारण घंटों मतदान रुका रहा और जब चुनाव आयोग का अधिकारी देरी से पहुंचा, तो नाराज मतदाताओं ने उन्हें बंधक बना लिया और उनके साथ हाथापाई की। वहीं, मालदा के हरिश्चंद्रपुर में टीएमसी के ही दो गुट आपस में भिड़ गए और अपनी ही पार्टी के कैंप ऑफिस में तोड़फोड़ कर डाली।

जामुड़िया में लावारिस EVM

इन सबके बीच जामुड़िया विधानसभा क्षेत्र से आई खबर ने चुनाव आयोग की नींद उड़ा दी है। यहाँ श्रीपुर इलाके में एक निजी गाड़ी सड़क किनारे लावारिस खड़ी मिली, जिसमें भारी संख्या में रिजर्व ईवीएम रखी हुई थीं।

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‘ऑन इलेक्शन ड्यूटी’ लिखी इस गाड़ी के पास कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था, जिससे चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आसनसोल उत्तर से टीएमसी प्रत्याशी मलय घटक ने भी सनसनीखेज दावा किया कि गुजरात, मध्य प्रदेश और बिहार से स्पेशल ट्रेनों और बसों के जरिए बाहरी गुंडे बंगाल बुलाए गए हैं।

बंगाल का काला इतिहास

बंगाल में चुनाव और हिंसा का रिश्ता दशकों पुराना है। आज की घटनाओं ने उन जख्मों को फिर से ताजा कर दिया है जो पिछले कुछ वर्षों में बंगाल ने झेले हैं। याद दिला दें कि 10 अप्रैल 2021 को कूचबिहार के सीतलकुची में वोटिंग के दौरान हुई हिंसा में सुरक्षा बलों की फायरिंग में चार लोगों की जान गई थी। वहीं, 8 जुलाई 2023 को हुए पंचायत चुनाव के दौरान एक ही दिन में 15 लोगों की हत्या कर दी गई थी और सरेआम मतपेटियां लूटी गई थीं। साल 2018 के पंचायत चुनाव में तो करीब 34 प्रतिशत सीटों पर विपक्ष को पर्चा तक नहीं भरने दिया गया था। पुरानी घटनाओं और आज के हालात को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि बंगाल में सरकारें बदलीं, साल बदले, लेकिन चुनावी हिंसा का चरित्र जस का तस है।

 दहशत के साये में लोकतंत्र

आज की हिंसा और अराजकता का सबसे बुरा असर उस आम नागरिक पर पड़ रहा है, जो लोकतंत्र में विश्वास रखते हुए वोट डालने निकला था। टीएमसी पर गुंडागर्दी के आरोप लग रहे हैं, तो वहीं विपक्षी उम्मीदवारों पर हो रहे हमले प्रशासन की पोल खोल रहे हैं।

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चुनाव आयोग का वह दावा कि ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा’, आज धरातल पर पूरी तरह हवा-हवाई साबित हुआ। अगर पहले चरण की यह तस्वीर है, तो आने वाले चरणों में शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।

क्या पश्चिम बंगाल में कभी बिना खून-खराबे के चुनाव संपन्न हो पाएंगे? क्या राजनीतिक दल सत्ता के लिए जनता के खून का खेल खेलना बंद करेंगे? यह सवाल आज हर उस वोटर के मन में है जो पोलिंग बूथ पर जाने से पहले अपनी सुरक्षा के लिए डर रहा है।

 

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