
लखनऊ। यूपी की सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) की हालिया जांच रिपोर्टों ने एक ऐसे खौफनाक और सोचे-समझे पैटर्न का खुलासा किया है, जो राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। बीते पांच वर्षों के दौरान पकड़े गए विभिन्न आतंकी मॉड्यूल्स और अवैध धर्मांतरण के मामलों का विश्लेषण करने पर यह तथ्य सामने आया है कि अब दुश्मन देश और कट्टरपंथी संगठन अपनी साजिशों को अंजाम देने के लिए हिंदू चेहरों को ढाल बना रहे हैं।
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दिया जाता है आर्थिक लालच
यह एक ऐसी रणनीति है, जिसमें पहले सोशल मीडिया और आर्थिक लालच के जरिए युवाओं का ब्रेनवॉश किया जाता है, फिर उनका गुप्त रूप से धर्मांतरण कराकर उन्हें आतंकी गतिविधियों के लिए मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस साइलेंट वॉर के पीछे विदेशी फंडिंग और पाकिस्तानी हैंडलर्स का एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय है, जो उत्तर प्रदेश की सामाजिक एकता को खंडित करने और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की तैयारी कर रहा है।

उत्तर प्रदेश एटीएस द्वारा हाल ही में ध्वस्त किए गए आतंकी मॉड्यूल्स ने सुरक्षा विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है। इस नए खतरनाक पैटर्न की सबसे ताजा मिसाल तुषार और कृष्णा मिश्रा जैसे युवाओं के मामलों में देखने को मिली है। तुषार नामक युवक, जिसकी पहचान एक सामान्य हिंदू युवा के रूप में थी, वह हिजबुल्लाह जैसे खतरनाक संगठन की विचारधारा से प्रभावित होकर आतंकी साजिशें रच रहा था।
वहीं, बाराबंकी का कृष्णा मिश्रा सीधे तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के संपर्क में था। इसी तरह विकास गहलावत और पपला पंडित जैसे आरोपी भी विदेशी आकाओं के इशारे पर जघन्य वारदातों को अंजाम देने की फिराक में थे। इन मामलों में सबसे चिंताजनक बात यह है कि, इन युवाओं का इस्तेमाल स्लीपर सेल के तौर पर किया जा रहा था, ताकि सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचकर वे भीड़भाड़ वाले इलाकों या महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को निशाना बना सकें।
2021 में हुआ था बड़े सिंडिकेट का खुलासा
धर्मांतरण और कट्टरपंथ के इस घालमेल की जड़ें साल 2021 के उस बड़े खुलासे से जुड़ी हैं, जिसने पूरे देश को हिला दिया था। तब एटीएस ने इस्लामिक दावा सेंटर के नाम पर चलाए जा रहे एक विशाल धर्मांतरण सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया था। उमर गौतम और मुफ्ती काजी जहांगीर आलम कासमी की गिरफ्तारी के बाद यह साफ हुआ कि करोड़ों रुपये की विदेशी फंडिंग के जरिए मूक-बधिर छात्रों और समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को निशाना बनाया जा रहा था।
इन मासूमों को नौकरी, बेहतर जीवन और शादी का लालच देकर पहले इस्लाम स्वीकार करने पर मजबूर किया गया और फिर उनमें से कई को कट्टरपंथी विचारधारा की ओर धकेला गया। इसी कड़ी में मौलाना कलीम सिद्दीकी का नाम भी सामने आया, जिसने कथित तौर पर अपने ट्रस्ट और एनजीओ के माध्यम से अवैध धर्मांतरण का एक व्यवस्थित नेटवर्क खड़ा कर लिया था।
यह नेटवर्क केवल धर्म परिवर्तन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य एक ऐसा कैडर तैयार करना था जो भविष्य में भारत विरोधी गतिविधियों में सहायक हो सके। वर्ष 2025 में बलरामपुर से सामने आया मामला इस कन्वर्जन-टू-टेरर मॉडल की पुष्टि करता है। यहां जलालुद्दीन उर्फ छांगुर कनेक्शन ने जांच एजेंसियों को हैरान कर दिया।
विदेशी हैंडलर के हाथ में होती है डोर
आरोप है कि, जलालुद्दीन ने विदेश से आए नीतू और नवीन वोहरा का गुप्त तरीके से धर्मांतरण करवाया और फिर उन्हें इस पूरे नेटवर्क का चेहरा बना दिया। नीतू और नवीन को आगे रखकर विदेशी फंडिंग हासिल की गई और उनकी हिंदू पहचान का लाभ उठाकर अन्य युवाओं को इस जाल में फंसाया गया। यह एक ऐसी मॉडस ऑपरेंडी है जिसमें सामने दिखने वाला व्यक्ति आपकी ही आस्था और संस्कृति का हिस्सा लगता है, लेकिन उसके पीछे की डोर विदेशी हैंडलर्स के हाथों में होती है।
इसके बाद आगरा पुलिस ने भी एक ऐसे ही बड़े रैकेट का खुलासा किया, जिसमें दो बहनों के लापता होने की जांच करते समय रेडिकलाइजेशन और हथियारों के साथ सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट करने जैसे खतरनाक सुराग मिले। इस मामले की जांच के तार अमेरिका और कनाडा से होने वाली फंडिंग तक जा पहुंचे हैं।

जांच एजेंसियों ने इस पूरे नेटवर्क के काम करने के तरीके यानी मॉड्स आपरेंडी को तीन अलग-अलग स्तरों में विभाजित किया है। सबसे पहले भावनात्मक और डिजिटल जाल बुना जाता है। इसके लिए टेलीग्राम, सिग्नल और इंस्टाग्राम जैसे सुरक्षित माने जाने वाले ऐप्स का इस्तेमाल किया जाता है।
वीडियो दिखाकर करते हैं ब्रेनवॉश
पाकिस्तानी हैंडलर्स इन प्लेटफॉर्म्स पर भारतीय युवाओं से संपर्क साधते हैं और उन्हें पहले भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। दूसरे स्तर पर उन्हें कट्टरपंथी वीडियो दिखाकर और देश के खिलाफ जहर उगलकर उनका मानसिक धर्मांतरण (ब्रेनवॉश) किया जाता है। जब युवा पूरी तरह से उनकी गिरफ्त में आ जाता है, तब उसे आर्थिक लालच, फर्जी पासपोर्ट या विदेश में सुरक्षित जीवन देने का प्रलोभन देकर भौतिक रूप से धर्मांतरण और फिर आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार किया जाता है।
एटीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह मॉडल बेहद खतरनाक है क्योंकि इसमें आरोपी को यह एहसास ही नहीं होने दिया जाता कि वह अपने ही देश के खिलाफ एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बन चुका है। वर्तमान में सुरक्षा एजेंसियां इस मॉडल से जुड़े कई अन्य संदिग्धों की तलाश में जुटी हुई हैं।
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