तीन हफ्ते से ज्यादा की खांसी को न करें इग्नोर, हो सकता है फेफड़ों के कैंसर का संकेत

बदलते मौसम और प्रदूषण के बीच खांसी-जुकाम एक आम समस्या मानी जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी एक मामूली सी दिखने वाली खांसी जानलेवा भी हो सकती है? चिकित्सा विशेषज्ञों और हालिया शोधों ने एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। यदि आपको या आपके किसी परिचित को तीन सप्ताह यानी 21 दिन से अधिक समय से लगातार खांसी आ रही है, तो यह केवल वायरल इन्फेक्शन या एलर्जी नहीं, बल्कि फेफड़ों के कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है।

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फेफड़ों का कैंसर दुनिया भर में मौत के सबसे बड़े कारणों में से एक बनकर उभरा है। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि, हर साल फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या प्रोस्टेट, ब्रेस्ट और कोलन कैंसर से होने वाली कुल मौतों से भी कहीं अधिक है। विडंबना यह है कि इसके लक्षण तब तक स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते, जब तक कि बीमारी अपने गंभीर चरण में न पहुंच जाए। आइए जानते हैं फेफड़ों का कैंसर कितना घातक है और इसके लक्षण और बचाव क्या हैं।

नहीं होता दर्द का एहसास

फेफड़ों का कैंसर शरीर में दबे पांव दस्तक देता है। डॉक्टरों का कहना है कि फेफड़ों के भीतर दर्द महसूस करने वाली तंत्रिकाएं  बहुत कम होती हैं, इसलिए जब तक ट्यूमर काफी बड़ा न हो जाए या फेफड़ों की बाहरी परत को प्रभावित न करने लगे, तब तक मरीज को किसी खास दर्द का अहसास नहीं होता। यही कारण है कि इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है।

Lung Cancer Awareness

सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, फेफड़ों के कैंसर के मामले आमतौर पर 65 वर्ष की आयु के बाद अधिक देखे जाते हैं। हालांकि, बिगड़ती जीवनशैली और पर्यावरण के कारण अब युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इस बीमारी का सबसे बड़ा जोखिम कारक धूम्रपान है, जो फेफड़ों की कोशिकाओं के डीएनए को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाता है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जो लोग कभी धूम्रपान नहीं करते, वे भी इसका शिकार हो रहे हैं। इसका एक मुख्य कारण ‘रेडॉन गैस’ है। ये एक प्राकृतिक, गंधहीन गैस जो घरों या इमारतों की नींव से रिसकर फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है।

 2 से 3 हफ्ते की खांसी  को हल्के में न लें

अमेरिका के मेमोरियलकेयर कैंसर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ डॉ. डेविड यशार का कहना है कि, लगातार बनी रहने वाली खांसी फेफड़ों के कैंसर का सबसे सामान्य और प्राथमिक संकेत है।

अक्सर लोग खांसी होने पर कफ सिरप या घरेलू काढ़े का सहारा लेते हैं। यदि खांसी 2 से 3 हफ्तों के भीतर ठीक नहीं हो रही है या दवा लेने के बावजूद इसकी तीव्रता बढ़ रही है, तो यह खतरे की घंटी है। फेफड़ों में पनपने वाला ट्यूमर जब वायुमार्ग में अवरोध पैदा करता है या उसे इरिटेट करता है, तो शरीर उसे बाहर निकालने के लिए लगातार खांसने की प्रतिक्रिया देता है।

ये हैं 5 प्रमुख लक्षण

फेफड़ों का कैंसर केवल खांसी तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों ने कुछ ऐसे लक्षणों की सूची दी है, जिन्हें अक्सर लोग सामान्य फ्लू या थकान समझकर छोड़ देते हैं।

खून के साथ खांसी

यदि थूक या खांसी के साथ खून की कुछ बूंदें भी दिखाई दें, तो बिना देर किए ऑन्कोलॉजिस्ट से मिलें। यह ट्यूमर द्वारा रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाने का संकेत हो सकता है।

सांस लेने में तकलीफ

सीढ़ियां चढ़ते समय या मामूली पैदल चलने पर भी अगर आपकी सांस फूलने लगे, तो समझ लें कि फेफड़ों की क्षमता कम हो रही है।

सीने में लगातार दर्द

हंसने, खांसने या गहरी सांस लेने पर सीने में होने वाला दर्द जो कंधों या पीठ तक जाता हो, फेफड़ों के कैंसर का लक्षण हो सकता है।

अचानक वजन कम होना

बिना किसी डाइटिंग या एक्सरसाइज के अगर शरीर का वजन तेजी से यानी 5-10 किलो गिर जाए, तो यह कैंसर कोशिकाओं द्वारा शरीर की ऊर्जा सोखने का परिणाम हो सकता है।

आवाज में भारीपन 

यदि आपकी आवाज बिना किसी गले के संक्रमण के अचानक बैठ गई है या भारी हो गई है और हफ्तों तक ठीक नहीं हो रही, तो यह फेफड़ों के ट्यूमर द्वारा वोकल कॉर्ड की नसों पर दबाव डालने के कारण हो सकता है।

 देरी पड़ सकती है भारी

डॉक्टरों का मानना है कि, फेफड़ों के कैंसर का इलाज तभी सबसे प्रभावी होता है जब उसे स्टेज-1 या स्टेज-2 में पकड़ लिया जाए। दुर्भाग्य से, भारत जैसे देशों में अधिकांश मामले स्टेज-3 या स्टेज-4 में रिपोर्ट होते हैं।

यदि किसी व्यक्ति में उपरोक्त लक्षण दिखते हैं, तो डॉक्टर सबसे पहले चेस्ट एक्स-रे की सलाह देते हैं। हालांकि, छोटी गांठों को पकड़ने के लिए सीटी स्कैन अधिक सटीक माना जाता है। यदि स्कैन में कुछ संदिग्ध मिलता है, तो बायोप्सी के जरिए यह पुष्टि की जाती है कि कोशिकाएं कैंसरग्रस्त हैं या नहीं। आजकल लिक्विड बायोप्सी और पीईटी स्कैन जैसी आधुनिक तकनीकें भी उपलब्ध हैं जो बीमारी की गहराई का सटीक पता लगाती हैं।

फेफड़ों के कैंसर के 80 फीसदी से अधिक मामलों के पीछे तंबाकू का सेवन जिम्मेदार है। सिगरेट के धुएं में 7,000 से अधिक रसायन होते हैं, जिनमें से कम से कम 70 कैंसर पैदा करने वाले होते हैं। केवल सक्रिय धूम्रपान करने वाले ही नहीं, बल्कि पैसिव स्मोकर्स (जो दूसरों के धुएं के संपर्क में रहते हैं) को भी उतना ही खतरा है। डॉक्टरों की सलाह है कि यदि आपने सालों पहले स्मोकिंग छोड़ भी दी है, तब भी आपको नियमित रूप से फेफड़ों की स्क्रीनिंग करानी चाहिए।

बचाव के उपाय 

धूम्रपान छोड़ें: यह फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

प्रदूषण से बचाव: अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में मास्क का प्रयोग करें।

स्वस्थ आहार: ताजे फल और सब्जियां, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर हों, कोशिकाओं की मरम्मत में मदद करते हैं।

नियमित चेकअप: यदि आपकी उम्र 50 से अधिक है और आप स्मोकिंग हिस्ट्री रखते हैं, तो साल में एक बार लो-डोज सीटी स्कैन  जरूर कराएं।

फेफड़ों का कैंसर अब लाइलाज नहीं रह गया, बशर्ते इसे समय रहते पहचान लिया जाए। 3 हफ्ते से ज्यादा की खांसी को सिर्फ मौसम का असर कहना आपके जीवन पर भारी पड़ सकता है। सतर्कता ही इस बीमारी के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है। यदि आपका शरीर आपको कोई संकेत दे रहा है, तो उसे सुनें और तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें।

 

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