रक्षा मंत्रालय का कड़ा प्रहार, खराब उपकरण देने पर 10 साल तक के लिए ब्लैकलिस्ट होगी कंपनी, गाइडलाइन जारी

 नई दिल्ली। रक्षा सौदे में पारदर्शिता लाने और हथियारों व उपकरणों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के मकसद से केंद्र सरकार ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। दरअसल, रक्षा मंत्रालय ने डिफेंस सप्लायरों और वेंडरों के लिए नई और बेहद सख्त गाइडलाइंस जारी की हैं, जिसके तहत अब उन कंपनियों और सप्लायरों पर शिकंजा कसा जाएगा जो या तो समय पर सामान की डिलीवरी नहीं करते या फिर घटिया दर्जे के उपकरणों की सप्लाई करते हैं।

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भुगतना होगा आर्थिक दंड

नई नीति में स्पष्ट किया गया है कि, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या खराब प्रदर्शन की स्थिति में कंपनियों को न केवल भारी आर्थिक दंड भुगतना होगा, बल्कि उन्हें 10 साल तक के लिए सभी सरकारी कॉन्ट्रैक्ट से ब्लैकलिस्ट या प्रतिबंधित भी किया जा सकता है। यह नया फ्रेमवर्क साल 2016 की पुरानी गाइडलाइंस की जगह लेगा और रक्षा खरीद प्रक्रिया में जीरो टॉलरेंस की नीति को मजबूती से लागू करेगा।

Defence Rule

रक्षा मंत्रालय की नई नियमावली में सबसे कड़ा प्रहार भ्रष्टाचार और नैतिक दुराचार पर किया गया है। मंत्रालय ने यह साफ कर दिया है कि इंटीग्रिटी पैक्ट (IP) का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि कोई कंपनी रिश्वतखोरी, गैर-कानूनी कमीशन या किसी भी तरह की धोखाधड़ी में संलिप्त पाई जाती है, तो उस पर अधिकतम 10 साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह कदम रक्षा सौदों में बिचौलियों की भूमिका को खत्म करने और सरकारी धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है।

इसके अलावा, यदि कोई वेंडर किसी भी प्रकार के नैतिक दुराचार का दोषी पाया जाता है, तो उसके लिए भी सजा का प्रावधान समान रूप से कड़ा रखा गया है। सरकार का मानना है कि, सेना के लिए खरीदे जाने वाले उपकरणों की विश्वसनीयता और उन्हें बनाने वाली कंपनी की ईमानदारी अटूट होनी चाहिए, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।

30 दिन में देना होगा स्पष्टीकरण

इन नियमों की खास बात यह है कि, इसमें केवल मुख्य कंपनी ही नहीं, बल्कि उसके सहयोगी फर्मों, जॉइंट वेंचर्स और यहां तक कि, उन संस्थाओं को भी दायरे में लिया गया है जो मर्जर या अधिग्रहण के जरिए बनी हैं। अक्सर देखा गया है कि कंपनियां बैन होने के बाद अपना नाम बदलकर या पुनर्गठन करके दोबारा सिस्टम में घुसने की कोशिश करती हैं, लेकिन नई गाइडलाइन ने इस चोर दरवाजे को पूरी तरह बंद कर दिया है।

अब रक्षा मंत्रालय के पास यह कानूनी अधिकार होगा कि, वह बैन की गई कंपनी से जुड़ी हर उस नई इकाई को ब्लॉक्ड एंटिटी घोषित कर दे, जो पुरानी कंपनी की देनदारियां या कामकाज संभाल रही है। वेंडरों को अपने ऊपर लगे आरोपों पर सफाई देने के लिए 30 दिनों का अनिवार्य समय दिया जाएगा, जिसके बाद एक हाई-पावर कमेटी मामले की समीक्षा करेगी और अंतिम फैसला लेगी।

रक्षा क्षेत्र में केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि उपकरणों की खराब क्वालिटी और डिलीवरी में होने वाली देरी भी एक बड़ी चुनौती रही है। नई गाइडलाइंस ने इस पहलू पर विशेष ध्यान दिया है। अब वेंडरों को केवल सामान बेचने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि उन्हें उपकरणों के प्रदर्शन की पूरी जवाबदेही लेनी होगी।

मंत्रालय ने तय किए मानक 

परफॉर्मेंस को मापने के लिए मंत्रालय ने स्पष्ट मानक तय किए हैं, जिनमें डिलीवरी का समय, सर्विस देने की क्षमता, उपकरणों का डाउनटाइम (खराब रहने की अवधि) और उनके फेल होने की दर को शामिल किया गया है। यदि कोई सिस्टम उम्मीद के मुताबिक काम नहीं करता है, तो शुरुआती तौर पर कंपनी पर छह महीने का बैन लगाया जाएगा, जिसे जांच के बाद 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

यह नई नीति वेंडरों को हर कदम पर जवाबदेह बनाएगी। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि, सेना को मिलने वाले उपकरण विश्वस्तरीय हों और युद्ध जैसी स्थितियों में वे पूरी तरह भरोसेमंद साबित हों। देरी से होने वाली सप्लाई को लेकर भी अब मंत्रालय का रुख सख्त रहेगा। यदि कोई कंपनी कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को पूरा करने में बार-बार नाकाम रहती है, तो उस पर एक साल का प्रतिबंध लगाया जाएगा, जिसकी समीक्षा बाद में उच्च स्तरीय समिति द्वारा की जाएगी। इस प्रक्रिया में आर्थिक दंड यानी पेनाल्टी लगाने की विस्तृत प्रक्रिया को भी पहले से कहीं अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया गया है ताकि कंपनियों में नियम तोड़ने का डर बना रहे।

रक्षा मंत्रालय के इस कदम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत और रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने के विजन से जोड़कर देखा जा रहा है। जब भारतीय रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां सख्त मानकों का पालन करेंगी, तो उनकी साख अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बढ़ेगी।

तकनीकी बारीकियों का रखा गया ध्यान

नई गाइडलाइंस 2016 के फ्रेमवर्क की तुलना में अधिक व्यापक हैं और इसमें तकनीकी बारीकियों का भी पूरा ध्यान रखा गया है। मंत्रालय ने यह संदेश दे दिया है कि भारत अब रक्षा खरीद के मामले में किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं है। जीरो टॉलरेंस का यह रुख न केवल भ्रष्टाचार को खत्म करेगा, बल्कि उन देशी और विदेशी कंपनियों को भी प्रोत्साहित करेगा जो ईमानदारी और गुणवत्ता के साथ काम करना चाहती हैं।

Defence Rule

विशेषज्ञों का मानना है कि, इन बदलावों से रक्षा क्षेत्र में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को भी बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि अब नियम और दंड की प्रक्रिया बिल्कुल साफ है। कंपनियों को पता है कि उनकी किन गलतियों का क्या नतीजा होगा। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ भारतीय सशस्त्र बलों को मिलेगा, जिन्हें अब बेहतर क्वालिटी के हथियार और उपकरण समय पर मिल सकेंगे।

रक्षा मंत्रालय की यह नई गाइडलाइन आने वाले समय में भारत के रक्षा ईकोसिस्टम को अधिक सुव्यवस्थित, पारदर्शी और शक्तिशाली बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगी। अब वेंडरों के पास केवल दो ही विकल्प हैं- या तो वे उच्चतम मानकों पर खरे उतरें या फिर भारतीय रक्षा बाजार से बाहर होने के लिए तैयार रहें।

 

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