अखिलेश की टेंशन बढ़ाएगा कांग्रेस का मुस्लिम स्ट्राइक रेट, सीट शेयरिंग को लेकर आ सकती है ‘INDIA’ में दरार

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में इंडिया अलायंस की मजबूती और सपा-कांग्रेस की दोस्ती की चर्चा अक्सर होती रहती है, लेकिन परदे के पीछे 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर एक ऐसी बिसात बिछ रही है, जो गठबंधन के भीतर दरार पैदा कर सकती है। असम, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के हालिया चुनाव परिणामों ने कांग्रेस को एक नया आत्मविश्वास दिया है, जिसे राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस का मुस्लिम स्ट्राइक रेट कहा जा रहा है। आंकड़ों के इस खेल ने समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

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मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में दबदबा

अखिलेश यादव भले ही सार्वजनिक मंचों से एकजुटता का दावा कर रहे हों, लेकिन मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर कांग्रेस की बढ़ती पकड़ और उसकी जीत की गारंटी आने वाले समय में सीट शेयरिंग के दौरान तनातनी का सबसे बड़ा कारण बनने वाली है। अगर हालिया विधानसभा चुनावों और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के प्रदर्शन का विश्लेषण करें, तो एक दिलचस्प पैटर्न उभरकर सामने आता है। असम में कांग्रेस ने 20 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, जिनमें से 18 ने शानदार जीत दर्ज की।

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इसी तरह केरल में 8 मुस्लिम प्रत्याशियों ने जीत का परचम लहराया, जबकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी कांग्रेस का प्रदर्शन मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में प्रभावशाली रहा। ये आंकड़े केवल चुनावी नतीजे नहीं हैं, बल्कि यह कांग्रेस की उस पुरानी पहचान की वापसी का संकेत हैं, जिसमें वह अल्पसंख्यकों की पहली पसंद हुआ करती थी।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी लंबे समय से एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे अपनी सत्ता की इमारत खड़ी करती आई है, लेकिन अब कांग्रेस के इस बढ़ते ग्राफ ने अखिलेश यादव के लिए अपनी इस अभेद्य किलेबंदी को बचाए रखने की चुनौती पेश कर दी है।उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 143 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है। इनमें से 73 सीटें तो ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 30 फीसदी से भी अधिक है।

निर्णायक भूमिका में मुस्लिम मतदाता

2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने जिन 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी, उनके दायरे में करीब 45 विधानसभा सीटें आती हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि, कांग्रेस अब इन्हीं आंकड़ों को ढाल बनाकर 2027 के चुनावों में सपा से बड़ी हिस्सेदारी की मांग करेगी।

विशेषकर सहारनपुर, सीतापुर, बाराबंकी और प्रयागराज जैसे जिलों में जहां मुस्लिम आबादी 25 फीसदी से अधिक है, वहां कांग्रेस अपने उम्मीदवारों को उतारने के लिए मजबूती से दावा ठोक सकती है। अमेठी और रायबरेली जैसे गांधी परिवार के गढ़ में भी मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं और कांग्रेस इन सीटों को किसी भी कीमत पर सपा के लिए नहीं छोड़ना चाहेगी।

सपा और कांग्रेस के बीच असली तनातनी उन सीटों को लेकर होगी, जहां मुस्लिम उम्मीदवार के जीतने की संभावना सबसे अधिक है। अखिलेश यादव का जीतने वाले उम्मीदवार का फॉर्मूला कांग्रेस के लिए संजीवनी बन सकता है, क्योंकि कांग्रेस अब दूसरे राज्यों के स्ट्राइक रेट को उदाहरण के तौर पर पेश करेगी।

सपा को सेंधमारी बर्दाश्त नहीं

यदि कांग्रेस मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर अपना दावा बढ़ाती है, तो सपा के लिए अपने कद्दावर मुस्लिम नेताओं को संतुष्ट करना मुश्किल हो जाएगा। सपा अपने पारंपरिक वोटबैंक में किसी भी तरह की सेंधमारी को बर्दाश्त नहीं करेगी, क्योंकि मुस्लिम वोटबैंक ही वह आधार है जो उसे यूपी में मुख्य विपक्षी दल और सत्ता का दावेदार बनाए रखता है। ऐसे में अखिलेश यादव के सामने दोहरी चुनौती होगी एक तरफ गठबंधन को टूटने से बचाना और दूसरी तरफ अपने वफादार वोटबैंक को कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होने से रोकना।

जानकारों की मानें तो कांग्रेस की रणनीति अब बैकफुट पर रहने की नहीं, बल्कि फ्रंटफुट पर आकर खेलने की है, जिस तरह से असम और बंगाल जैसे राज्यों में मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस पर भरोसा जताया है, उससे यूपी के मुसलमानों के बीच भी यह संदेश गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को टक्कर देने के लिए कांग्रेस एक मजबूत विकल्प हो सकती है।

यह मनोवैज्ञानिक बढ़त सपा के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है। अगर 2027 में मुस्लिम मतदाता रणनीतिक वोटिंग के तहत सपा के बजाय कांग्रेस की ओर झुके, तो यूपी का पूरा राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। अखिलेश यादव के लिए मुश्किल यह है कि वे कांग्रेस को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते और उसे बहुत अधिक सीटें देकर अपनी जमीन भी कमजोर नहीं करना चाहते।

सपा के पीडीए पर प्रहार

आने वाले दिनों में अमेठी की जगदीशपुर और गौरीगंज, प्रयागराज की हंडिया और फूलपुर, तथा सहारनपुर नगर जैसी सीटों पर दावों-प्रतिदावों का दौर शुरू होगा। सीट शेयरिंग की मेज पर जब दोनों दल बैठेंगे, तो 2011 की जनगणना के आंकड़े और हालिया चुनाव परिणाम हथियारों की तरह इस्तेमाल किए जाएंगे।

अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे में अब अल्पसंख्यक हिस्से पर कांग्रेस की पैनी नजर है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए कांग्रेस की मांगों के आगे झुकेंगे या फिर सीट शेयरिंग का यह पेच गठबंधन की गांठ को कमजोर कर देगा। 2027 की जंग केवल भाजपा बनाम इंडिया अलायंस नहीं, बल्कि अलायंस के भीतर वर्चस्व की जंग भी साबित होने वाली है।

 

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