
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा है, जिसने सत्ता पक्ष के खेमे में हलचल पैदा कर दी है। यह स्ट्राइक सीमा पार नहीं बल्कि उस वोटर लिस्ट की है, जिसे बीते दिन निर्वाचन आयोग ने जारी की है। प्रदेश में एसआईआर के जो आंकड़े सामने आए हैं, उसने भाजपा के चुनावी गणित को पूरी तरह से उलझा कर रख दिया है।
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एक दशक पीछे गई मतदाता संख्या
चुनाव आयोग की फाइनल लिस्ट यह गवाही दे रही है कि, उत्तर प्रदेश मतदाता संख्या के मामले में एक दशक पीछे चला गया है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां प्रदेश में 13.39 करोड़ वोटर थे, वहीं इस ताजा सफाई अभियान के बाद यह संख्या घटकर 13.39 करोड़ से भी करीब 49 लाख कम रह गई है। जानकार इसे प्रदेश के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा शुद्धिकरण अभियान मान रहे हैं क्योंकि SIR के बाद प्रति विधानसभा सीट औसतन 71 हजार से ज्यादा वोटर कम हो गए हैं।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कड़ी चेतावनी और संगठन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद बीजेपी कार्यकर्ता जमीन पर वह सक्रियता नहीं दिखा पाए जिसकी उम्मीद की जा रही थी। नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की ताजपोशी के समय मुख्यमंत्री ने खुद मंच से आगाह किया था कि जिनके नाम कटे हैं उन्हें वापस जुड़वाया जाए, लेकिन आंकड़ों ने सरकार और संगठन के समन्वय की पोल खोल दी है।
सपा कार्यकर्ताओं ने दिखाई तत्परता
जानकारों का कहना है कि, बीजेपी के कार्यकर्ता और स्थानीय नेता सरकार या संगठन में पद पाने की होड़ में इतने मशगूल रहे कि उन्होंने घर-घर जाकर वोट चेक करने की बुनियादी मेहनत ही नहीं की। इसके विपरीत विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता कहीं ज्यादा चौकन्ने नजर आए। उन्होंने न सिर्फ लोगों के नाम जुड़वाने में मदद की बल्कि आपत्तियां दर्ज कराने में भी तत्परता दिखाई। निर्वाचन आयोग के पास पहुंचे कुल ज्ञापनों में से 80 प्रतिशत से ज्यादा अकेले सपा की तरफ से थे, जो साफ करता है कि, विपक्ष ने इस अभियान को बीजेपी से कहीं ज्यादा गंभीरता से लिया।
एक तरफ सरकार ‘नारी वंदन’ जैसे नारों से महिलाओं को साधने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर इस लिस्ट से सबसे ज्यादा गाज महिलाओं के नामों पर ही गिरी है। आंकड़ों पर गौर करें, तो लिस्ट से करीब 1.12 करोड़ महिलाओं के नाम हटा दिए गए हैं, जबकि पुरुषों के हटने वाले नामों की संख्या 93 लाख के आसपास है। कई सीटों पर महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहता है, ऐसे में इतनी बड़ी कटौती बीजेपी के रणनीतिकारों के लिए गहरी चिंता का सबब बन गई है।
बीजेपी के गढ़ में कम हुई वोटर्स की संख्या
हैरानी की बात यह भी है कि, बीजेपी के मजबूत गढ़ मानी जाने वाली सीटों पर वोटरों का भारी सफाया हुआ है, जिन 16 विधानसभा सीटों पर 1 लाख से ज्यादा वोट कटे हैं, उनमें से 15 सीटें बीजेपी के कब्जे वाली हैं। उदाहरण के तौर पर अयोध्या में जहां जीत का अंतर पहले ही कम हो चुका था, वहां अब 20 प्रतिशत यानी 80 हजार से ज्यादा वोट कम हो गए हैं। लखनऊ कैंट जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर भी 1.24 लाख वोट कम होना बीजेपी की आंतरिक कलह और कार्यकर्ताओं की लापरवाही की ओर इशारा करता है।
बीजेपी की मंशा भले ही विपक्षी वोट बैंक को लेकर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि मुस्लिम बहुल जिलों में वोटर लिस्ट की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। संभल, रामपुर और मुरादाबाद जैसे जिलों में कटौती का प्रतिशत बीजेपी के प्रभाव वाले शहरी क्षेत्रों से काफी कम रहा है। इसका मतलब यह है कि, जहां विपक्ष मजबूत था वहां वोट बच गए और जहां बीजेपी की जिम्मेदारी थी वहां भारी कटौती हो गई।
हिली यूपी की सियासी जमीन
हालांकि, इस पूरे विवाद पर उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का कहना है कि, यह लिस्ट पूरी पारदर्शिता और शुचिता से बनाई गई है और इसे किसी दल विशेष के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की है कि, अगर वे वैध मतदाता हैं तो अभी भी अपना नाम जुड़वा सकते हैं क्योंकि निर्वाचन आयोग ने यह प्रक्रिया बिना किसी दुर्भावना के पूरी की है, लेकिन सच्चाई यही है कि इस नई लिस्ट ने यूपी की सियासी जमीन को पूरी तरह हिला दिया है और अब बीजेपी के सामने चुनौती यह है कि वह चुनाव से पहले अपने इन ‘खोए हुए’ वोटरों को वापस कैसे लेकर आती है।
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