
हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि को आस्था और शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष चैत्र नवरात्रि कल 19 मार्च दिन गुरुवार से शुरू हो रही है। ऋतु परिवर्तन के इस संधि काल में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का विशेष आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है, जो हिमालय की पुत्री होने के कारण अडिगता और स्थिरता का प्रतीक मानी जाती हैं।
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सुख समृद्धि के द्वार खोलेगा शुभ संयोग
इस वर्ष चैत्र नवरात्रि पर ग्रहों की स्थिति और शुभ संयोग भक्तों के लिए सुख-समृद्धि के द्वार खोलने वाले माने जा रहे हैं। अगर आप भी अपने घर में कलश स्थापित करते हैं, तो समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि, इस बार घटस्थापना के लिए सुबह और दोपहर में बेहद सीमित लेकिन प्रभावशाली शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्रि से जुड़ी हर जानकारी, नियम और मुहूर्त।

चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व भारतीय जनमानस में नई ऊर्जा और संकल्प का संचार लेकर आता है। इस वर्ष 19 मार्च से शुरू होने वाली नवरात्रि का समापन राम नवमी के भव्य उत्सव के साथ होगा। धार्मिक मान्यता है कि, चैत्र नवरात्रि के पहले दिन ही सृष्टि का आरंभ हुआ था, इसलिए इसे नव-संवत्सर के आरंभ के रूप में भी मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है, लेकिन पहले दिन का महत्व सबसे अधिक होता है क्योंकि इसी दिन घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ शक्ति की अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है।
सौभाग्य प्रदान करती हैं मां शैलपुत्री
नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विधान है। जैसा कि, नाम से स्पष्ट है, शैल का अर्थ है पर्वत और पुत्री का अर्थ है बेटी। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। इन्हें प्रकृति की देवी और सौभाग्य प्रदान करने वाली माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से मां शैलपुत्री का संबंध मूलाधार चक्र से है।
विशेषज्ञों का कहना है कि, जो भक्त मानसिक अशांति, अनिर्णय की स्थिति या जीवन में अस्थिरता से जूझ रहे हैं, उनके लिए मां शैलपुत्री की शरण में जाना सर्वोत्तम मार्ग है। इनकी आराधना से व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन के संचालन में आ रही बाधाएं स्वतः ही दूर होने लगती हैं। मां का स्वरूप सौम्य है, वे नंदी पर सवार हैं और उनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में कमल सुशोभित है।
सीमित है शुभ मुहूर्त का समय
कलश स्थापना को नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, कलश को भगवान गणेश और ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। 19 मार्च को घटस्थापना के लिए भक्तों को समय का विशेष ध्यान रखना होगा, क्योंकि शुभ मुहूर्त की अवधि काफी सीमित है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, घटस्थापना का पहला और मुख्य शुभ मुहूर्त सुबह 06:52 से शुरू होकर सुबह 07:43 तक रहेगा। भक्तों के पास पूजन शुरू करने के लिए केवल 50 मिनट का समय होगा। यदि कोई साधक सुबह के इस मुहूर्त का लाभ नहीं उठा पाता है, तो शास्त्रों में अभिजीत मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ विकल्प माना गया है। दोपहर में अभिजीत मुहूर्त 12:05 से 12:53 तक रहेगा, जिसकी कुल अवधि 48 मिनट है। मान्यता है कि, सही और सटीक मुहूर्त में की गई कलश स्थापना घर में बरकत, खुशहाली और आध्यात्मिक उन्नति लेकर आती है।
ब्रह्म मुहूर्त में करें पूजा
शक्ति की उपासना के लिए आडंबर से अधिक शुद्धता और श्रद्धा की आवश्यकता होती है। नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा के लिए घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को सबसे उत्तम माना गया है।
सबसे पहले लकड़ी की एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद निर्धारित शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना की प्रक्रिया शुरू करें। कलश में जल, गंगाजल, सिक्का, सुपारी और अक्षत डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और उस पर नारियल स्थापित करें। ध्यान रहे कि कलश स्थापना के समय ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ मंत्र का जाप करना फलदायी होता है।
मां को प्रिय है सफेद रंग
मां शैलपुत्री को सफेद रंग अत्यंत प्रिय है, जो शांति और शुद्धता का प्रतीक है, इसलिए उन्हें सफेद पुष्प जैसे चमेली या सफेद कनेर अर्पित करने चाहिए। भोग के रूप में गाय के शुद्ध दूध से बनी मिठाइयां या सफेद चीजें (जैसे मिश्री या खीर) अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके पश्चात घी का एक अखंड दीपक प्रज्वलित करें। यह दीपक न केवल अंधेरे को दूर करता है, बल्कि भविष्य की नकारात्मक आशंकाओं को समाप्त कर जीवन में सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
मानसिक विकारों से मिलती है मुक्ति
पूजा के समापन पर मां शैलपुत्री की आरती करना अनिवार्य माना गया है। सुबह की आरती सूर्योदय के समय और संध्या आरती सूर्यास्त के तुरंत बाद करनी चाहिए। आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि, आरती के समय यदि पूरा परिवार एक साथ उपस्थित हो, तो घर के वातावरण में आपसी प्रेम और तालमेल बढ़ता है। आरती के बाद साधक को अपनी मनोकामनाएं मां के सम्मुख रखनी चाहिए। सच्ची भक्ति से की गई यह प्रार्थना न केवल मानसिक विकारों से मुक्ति दिलाती है, बल्कि इससे व्यक्ति की संपत्ति और सामाजिक मान-सम्मान में भी वृद्धि की प्रबल संभावना बनती है।
चैत्र नवरात्रि केवल एक उपवास का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर की सुप्त शक्तियों को जगाने का समय है। 19 मार्च से शुरू होने वाले इन नौ दिनों में संयम, सेवा और सिमरन का पालन करने से साधक को नई दिशा प्राप्त होती है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना कर मां शैलपुत्री का ध्यान करना आपके घर को नकारात्मकता से मुक्त कर खुशहाली के नए अध्याय की शुरुआत करेगा।
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