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	<title>इतिहास के पन्ने &#8211; Sarkari Manthan</title>
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	<title>इतिहास के पन्ने &#8211; Sarkari Manthan</title>
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		<title>मैं हिंसा की अपेक्षा कायरता को कभी नहीं चुनूँगा – महात्मा गाँधी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Om Tiwari]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 Feb 2026 09:40:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>महात्मा गांधी ने एक बार कहा था — &#8220;मैं हिंसा की अपेक्षा कायरता को कभी नहीं चुनूँगा। यदि मुझे केवल इन्हीं दो विकल्पों में से एक चुनना हो, तो मैं हिंसा को प्राथमिकता दूँगा।&#8221;  यह वाक्य उन लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो अहिंसा को कमज़ोरी का पर्याय समझते हैं। आज जब हम अहिंसा की बात करते हैं, तो अक्सर यह भ्रम उत्पन्न होता है कि जो व्यक्ति हाथ नहीं उठाता, वह डरपोक है। जो चुप रहता है, वह हारा हुआ है। लेकिन यह सोच न केवल अधूरी है, बल्कि खतरनाक भी है।</p>
<p>अहिंसा और कायरता — ये दो शब्द देखने में एक जैसे लग सकते हैं, क्योंकि दोनों में कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से हिंसा नहीं करता। लेकिन इनके अंतःकरण में जमीन-आसमान का अंतर है। कायरता भय से जन्म लेती है। वह डर जो व्यक्ति को सच बोलने से रोकता है, अन्याय के सामने खड़े होने से रोकता है, और जिम्मेदारी उठाने से भगाता है। दूसरी ओर, अहिंसा साहस से उत्पन्न होती है, वह साहस जो व्यक्ति को कहता है कि मैं प्रतिशोध ले सकता हूँ, लेकिन मैं नहीं लूँगा, क्योंकि मेरे पास एक उच्चतर उद्देश्य है।</p>
<p><strong>शक्ति का त्याग बनाम शक्ति का अभाव</strong></p>
<p>यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है, क्या आपने हिंसा न करने का चुनाव इसलिए किया क्योंकि आप सक्षम नहीं थे, या इसलिए कि आप सक्षम होते हुए भी संयम रखा? पहली स्थिति कायरता है, दूसरी अहिंसा।</p>
<p>एक सैनिक जो युद्ध के मैदान में डर के कारण हथियार नहीं उठाता, वह कायर है। लेकिन एक योद्धा जो युद्ध जीतने की क्षमता रखते हुए भी शांति का रास्ता चुनता है, वह अहिंसक है। भगवद्गीता में अर्जुन का प्रसंग इसी द्वंद्व को उजागर करता है। अर्जुन ने जब हथियार रखे, तो वह क्षण कायरता का था, वह भय और मोह से उपजा निर्णय था। श्रीकृष्ण ने उसे यही समझाया कि कर्तव्य से विमुख होना, अपनी जिम्मेदारी से भागना, यह अहिंसा नहीं, यह पलायन है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-103832 size-large" src="https://sarkarimanthan.com/wp-content/uploads/2026/02/mariananbu-gandhi-1024x768.jpg" alt="Gandhi Ji" width="1024" height="768" srcset="https://sarkarimanthan.com/wp-content/uploads/2026/02/mariananbu-gandhi-1024x768.jpg 1024w, https://sarkarimanthan.com/wp-content/uploads/2026/02/mariananbu-gandhi-300x225.jpg 300w, https://sarkarimanthan.com/wp-content/uploads/2026/02/mariananbu-gandhi-768x576.jpg 768w, https://sarkarimanthan.com/wp-content/uploads/2026/02/mariananbu-gandhi.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></p>
<p><strong>गांधी का अहिंसा-दर्शन: एक क्रांतिकारी विचार</strong></p>
<p>महात्मा गांधी ने अहिंसा को एक राजनीतिक और नैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उनकी अहिंसा में असाधारण साहस था। लाठियाँ खाना, जेल जाना, भूख हड़ताल करना, यह सब कायरता के लक्षण नहीं थे। वे जानते थे कि उनके सामने एक विशाल साम्राज्य है, लेकिन उन्होंने भय के बजाय नैतिक बल का सहारा लिया। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि निहत्थे इंसान की आत्मशक्ति सबसे बड़ी ताकत होती है।</p>
<p>गांधी का यह दर्शन इसीलिए क्रांतिकारी था क्योंकि उसमें कायरता के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जो व्यक्ति भय के कारण अहिंसा का पालन करता है, वह वास्तव में अहिंसक नहीं है। अहिंसा का सही अर्थ है कि सब कुछ जानते-समझते हुए, सक्षम होते हुए, शांति को चुनना।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में: क्या हम अहिंसक हैं या कायर</strong><strong>?</strong></p>
<p>आज की दुनिया में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। जब कोई दफ्तर में अन्याय देखकर चुप रह जाता है, क्या वह अहिंसक है? जब कोई सड़क पर किसी कमज़ोर को पीटते देखकर मुँह फेर लेता है, क्या वह शांतिप्रिय है? जब एक पत्रकार सत्ता के डर से सच नहीं लिखता, क्या वह अहिंसावादी है? नहीं! यह सब कायरता है — भय से उपजी चुप्पी, जिसे हम सुविधा के लिए &#8220;शांति&#8221; का नाम दे देते हैं।</p>
<p>असली अहिंसा वह है जो अन्याय के सामने खड़ी होती है, बिना हथियार उठाए, लेकिन बिना झुके भी। वह बोलती है, लिखती है, विरोध करती है लेकिन घृणा और हिंसा का सहारा नहीं लेती।</p>
<p>अहिंसा और कायरता के बीच की रेखा महीन ज़रूर है, लेकिन धुंधली नहीं। एक में शक्ति है, दूसरे में शक्तिहीनता। एक में चेतना है, दूसरे में पलायन। एक में नैतिक साहस है, दूसरे में मोह और भय की दासता।</p>
<p>हमें यह समझना होगा कि अहिंसा कोई निष्क्रियता नहीं है — यह एक सक्रिय, सचेत और साहसिक जीवन-दर्शन है। जो व्यक्ति सही मायनों में अहिंसक है, वह संसार का सबसे निडर प्राणी होता है, क्योंकि उसने हिंसा का रास्ता जानते हुए भी उसे अस्वीकार किया है।</p>
<p>कायरता हमें अंधेरे में रखती है। अहिंसा हमें रोशनी की ओर ले जाती है — लेकिन उस रोशनी तक पहुँचने के लिए पहले अंधेरे से लड़ने का साहस चाहिए।</p>
<p>— सम्पादकीय  / ओम तिवारी</p>
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		<title>गुरु नानक देव जयंती: गुरु नानक देव ने बेटों को नहीं…शिष्य को बनाया था अपना उत्तराधिकारी&#8230;</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/guru-nanak-dev-jayanti-guru-nanak-dev-had-made-his-disciple-and-not-his-son-his-successor</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Om Tiwari]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Nov 2024 10:21:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[गुरु नानक जयंती]]></category>
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		<category><![CDATA[पंजाब]]></category>
		<category><![CDATA[पाकिस्‍तान]]></category>
		<category><![CDATA[ब्राह्मण परिवार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज यानि 15 नवंबर को देशभर में 555वीं गुरु नानक जयंती (Guru Nanak Dev Jayanti) धूमधाम से मनाई जा रही है. गुरु नानक जयंती हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है. इस दिन को गुरु नानक प्रकाश पर्व के रूप में भी जाना जाता है. यह पर्व सिख समुदाय के लिए एक &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/guru-nanak-dev-jayanti-guru-nanak-dev-had-made-his-disciple-and-not-his-son-his-successor">गुरु नानक देव जयंती: गुरु नानक देव ने बेटों को नहीं…शिष्य को बनाया था अपना उत्तराधिकारी&#8230;</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>आज यानि 15 नवंबर को देशभर में 555वीं गुरु नानक जयंती (Guru Nanak Dev Jayanti) धूमधाम से मनाई जा रही है. गुरु नानक जयंती हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है. इस दिन को गुरु नानक प्रकाश पर्व के रूप में भी जाना जाता है. यह पर्व सिख समुदाय के लिए एक प्रमुख उत्सव है, जिसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. गुरु नानक जी को सिख धर्म (Sikh Religion) का पहला गुरु माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं, गुरु नानक देव ने अपने बाद बेटों को नहीं बल्कि किसी और को ही अपना उत्तराधिकारी चुना. इसके पीछे की कहानी भी बेहद दिलचस्प है…</p>
<p>सिखों के पहले धर्मगुरु यानि गुरु नानक देव जी के दो बेटे थे. इसके साथ ही उनके चार खास शिष्य भी थे. नानक देव अक्सर अपने इन चार शिष्यों और बेटों के साथ ही रहा करते थे. यही नहीं, समय-समय पर वो इन सभी की परीक्षा भी लिया करते थे.</p>
<h2>बचपन से ही विशेष शक्तियों के धनी थे गुरु नानक देव</h2>
<p><a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8" rel="nofollow noopener" target="_blank">पाकिस्तान</a> के पंजाब प्रांत में एक जगह है तलवंडी. यहीं पर एक ब्राह्मण परिवार रहता था. इस परिवार में साल 1469 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक देव का जन्म हुआ. सिख धर्म में मान्यता है कि बचपन से ही नानक देव जी विशेष शक्तियों के धनी थे. उन्हें अपनी बहन नानकी से काफी कुछ सीखने को मिला. 16 साल की उम्र में इनकी शादी सुलक्खनी से हो गई.</p>
<p>सुलक्खनी पंजाब के (भारत) गुरदासपुर जिले के लाखौकी की रहने वाली थीं. इनके दो बेटे श्रीचंद और लख्मी हुए. बेटों के जन्म के कुछ समय बाद ही नानक जी तीर्थयात्रा पर निकल गए. उन्होंने काफी लंबी यात्राएं की. इस यात्रा में उनके साथ मरदाना, लहना, बाला और रामदास भी गए. 1521 तक उन्होंने यात्राएं की. इस यात्रा के दौरान वे सबको उपदेश देते और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरुक करते थे. उन्होंने भारत, अफगानिस्तान और अरब के कई स्थानों का भ्रमण किया. इन यात्राओं को पंजाबी में “उदासियां” कहा जाता है.</p>
<h2><strong>नाले से कटोरा लाने की परीक्षा</strong></h2>
<p>एक समय की बात है, गुरु नानक देव ने सोचा कि क्यों न अपने शिष्यों की एक छोटी सी परीक्षा ली जाए. सिखों में प्रचलित इस कहानी के मुताबिक, गुरुनानक देव जी ने एक गंदे तालाब में अपना कटोरा जानबूझकर फेंक दिया. सबको लगा कि शायद उनसे गलती से गंदे तालाब में कटोरा गिर गया है. उस समय उनके चारों शिष्यों के साथ-साथ नानक जी के दोनों बेटे भी मौजूद थे.</p>
<p>नानक देव ने फिर बारी-बारी से सभी को कहा कि वो उस कटोरे को नाले से बाहर निकाल लाएं. एक-एक करके सभी जमात वहां से गायब हो गई. लेकिन नानक जी का शिष्य वहीं उनके साथ रहा. वो बिना देर किए तालाब में उतर गया. फिर कटोरा बाहर लेकर ही निकला. यह देख नानक जी उससे काफी खुश हुए. लहना के लिए उनके दिल में और भी जगह बन गई.</p>
<h2><strong>जब पेड़ से गिरे फल और मिठाइयां</strong></h2>
<p>एक और कहानी भी ऐसी ही प्रचलित है. एक समय की बात है. गरु नानक जी के यहां लंगर लगा करता था. उस दिन लंगर खत्म हो चुका था. तभी कुछ और भक्त नानक जी के यहां पहुंच गए. सभी को जोरों से भूख लगी थी. तब नानक जी ने अपने बेटों और शिष्यों से कहा कि वो सामने वाले पेड़ पर चढ़कर डाली हिला दें. वहां से फल-मिठाई गिरेंगी और उसे भक्तों में वितरित कर दें.</p>
<p>यह सुनकर सभी को लगा कि शायद नानक देव मजाक कर रहे हैं. क्योंकि ऐसा होना कतई संभव नहीं है. मगर इस बार भी लहना पेड़ पर चढ़ गए. उन्होंने डाली को जोर से हिलाया और वही हुआ जैसा नानक देव ने कहा था. पेड़ से फल और मिठाइयां गिरने लगीं. उन्हें सभी भक्तों में बांटा गया.</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें: <a href="https://sarkarimanthan.com/pm-modi-lashed-out-at-uddhav-thackeray-gave-a-big-challenge-by-taking-the-name-of-rahul-gandhi/">उद्धव ठाकरे पर बरसे पीएम मोदी, राहुल गांधी का नाम लेकर दे डाली बड़ी चुनौती</a></strong></p>
<h2><strong>इस शिष्य को सौंपी बागडोर</strong></h2>
<p>इसी तरह की कई कहानियां लहना की काफी प्रचलित हैं. लहना का यही सच्चा गुरु प्रेम था, जिसके कारण नानक देव भी सबसे ज्यादा भरोसा उसी पर करते थे. फिर जब उत्तराधिकारी चुनने का समय आया तब सभी को लगा कि दोनों बेटों में से कोई एक ही उत्तराधिकारी बनेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. गुरु नानक देव ने अपने परम शिष्य लहना को सिख पंथ को आगे ले जाने की बागडोर सौंपी. आगे चलकर लहना सिख पंथ के दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से मशहूर हुए.</p>
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		<title>ईरान का वो सूफी फकीर… जिसके नाम से फेमस है दिल्ली का ये इलाका, दिलचस्प है कहानी</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/that-sufi-fakir-of-iran-by-whose-name-this-area-of-u200bu200bdelhi-is-famous-the-story-is-interesting</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Om Tiwari]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Nov 2024 08:46:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[‘दिल्ली का नन्हा तिब्बत]]></category>
		<category><![CDATA[दिल्‍ली]]></category>
		<category><![CDATA[मजनू का टीला]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिल्ली को इतिहासों का गढ़ कहा जाता है. राज्य में कई ऐतिहासिक इमारतें और जगह हैं, जिन्हें देखने दुनिया भर से कई लोग आते हैं. दिल्ली की ऐतिहासिक जगहों में लाल किला, हुमायूं का मकबरा, पुराना किला समेत कई जगह शामिल हैं. इन्हीं में से एक मजनू का टीला भी है. नॉर्थ दिल्ली जिले में &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/that-sufi-fakir-of-iran-by-whose-name-this-area-of-u200bu200bdelhi-is-famous-the-story-is-interesting">ईरान का वो सूफी फकीर… जिसके नाम से फेमस है दिल्ली का ये इलाका, दिलचस्प है कहानी</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80" rel="nofollow noopener" target="_blank">दिल्ली</a> को इतिहासों का गढ़ कहा जाता है. राज्य में कई ऐतिहासिक इमारतें और जगह हैं, जिन्हें देखने दुनिया भर से कई लोग आते हैं. दिल्ली की ऐतिहासिक जगहों में लाल किला, हुमायूं का मकबरा, पुराना किला समेत कई जगह शामिल हैं. इन्हीं में से एक मजनू का टीला भी है. नॉर्थ दिल्ली जिले में एक इलाका है, जिसका आधिकारिक नाम तो न्यू अरुणा नगर कॉलोनी है, लेकिन लोग इस जगह को ‘मजनू का टीला’ के नाम से जानते हैं. मजनू का टीले में एक तिब्बती लोगों की दुनिया बसती है.</p>
<p>मजनू का टीला अपने तिब्बती रेस्टोरेंट्स के लिए फेमस है. यहां आपको ऑथेंटिक तिब्बती भोजन मिलेगा. हालांकि ज्यादातर लोगों के मन ये सवाल जरूर आता होगा कि कैसे एक धार्मिक जगह का नाम ‘मजनू का टीला’ रख दिया गया ? और इसके पीछे क्या इतिहास है.</p>
<p><strong>कैसे पड़ा नाम?</strong></p>
<p>मजनू के टीले के नाम के पीछे की कहानी सिख धर्म से जुड़ी हुई है. माना जाता है कि 15 वीं सदी में इस सिकंदर लोदी का शासनकाल था. लोदी एक सूफी संत था, जो ईरान का रहने वाला था. उस वक्त यहां के लोग सूफी फकीर को मजनू कहते थे. लोदी इसी इलाके में एक टीले पर रहा करता था. ये जगह यमुना नदी के पास थी और वो शख्स परमात्मा के नाम पर लोगों को मुफ्त में नदी पार करवाने का काम करता था.</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें: <a href="https://sarkarimanthan.com/more-than-50-percent-mlas-losing-elections-in-jharkhand-a-trend-of-20-years/">झारखंड में 50 फीसदी से ज्यादा विधायक हारते हैं चुनाव, 20 साल का ट्रेंड सोरेन के लिए बना टेंशन</a></strong></p>
<p>ऐसे में लोदी के काल में यहां गुरु नानक आए. ऐसे में जब गुरु नानक ने जब मजनू का सेवा भाव देखा, तो बहुत खुश हुए और उसे आशीर्वाद दिया. गुरु नानक ने इसके बाद यहां एक टीला बनवा दिया, जिसे मजनू का टीले के नाम से जाना जाने लगा. बाद में 1783 में सिख मिलिट्री लीडर बघेल सिंह ने मजनू का टीला गुरुद्वारा बनवा दिया, क्योंकि यहां गुरु नानक देव जी रुके थे.</p>
<p><strong>‘दिल्ली का नन्हा तिब्बत’</strong></p>
<p>मजनू का टीला को ‘दिल्ली का नन्हा तिब्बत’ के नाम से भी जाना जाता है. यह जगह तिब्बत फूड, कपड़े, सामान, घर की सजावट लिए बहुत फेमस है. पतली और अंधेरी गलियों में बसे इस इलाके में हमेशा बहुत रौनक रहती है.</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/that-sufi-fakir-of-iran-by-whose-name-this-area-of-u200bu200bdelhi-is-famous-the-story-is-interesting">ईरान का वो सूफी फकीर… जिसके नाम से फेमस है दिल्ली का ये इलाका, दिलचस्प है कहानी</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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			</item>
		<item>
		<title>यहां जन्मा ज्योतिष, नदी को नदी से जोड़ा, 9 हजार साल पुरानी ये कहानी… हैरान कर देगा ददरी मेले का इतिहास</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/astrology-born-here-connected-the-river-with-the-river-this-9-thousand-years-old-story-history-of-dadri-fair-will-surprise-you</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Om Tiwari]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 Nov 2024 09:14:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[कार्तिक पूर्णिमा]]></category>
		<category><![CDATA[ददरी]]></category>
		<category><![CDATA[नंदीग्राम]]></category>
		<category><![CDATA[बलिया]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान नारायण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में लगने वाले विश्व प्रसिद्ध ददरी मेले का नाम तो आपने सुना ही होगा. यह मेला करीब 10 दिन पहले ही शुरू हो चुका है. अभी यहां नंदीग्राम शुरू हुआ है, जहां पशुधन की खरीद फरोख्त शुरू हुई है. 15 नवंबर यानी कार्तिक पूर्णिमा से यहां मीना बाजार भी शुरू &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/astrology-born-here-connected-the-river-with-the-river-this-9-thousand-years-old-story-history-of-dadri-fair-will-surprise-you">यहां जन्मा ज्योतिष, नदी को नदी से जोड़ा, 9 हजार साल पुरानी ये कहानी… हैरान कर देगा ददरी मेले का इतिहास</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<figure><img loading="lazy" decoding="async" class="attachment-large size-large wp-post-image" src="https://images.tv9hindi.com/wp-content/uploads/2024/11/ballia.jpg" alt="यहां जन्मा ज्योतिष, नदी को नदी से जोड़ा, 9 हजार साल पुरानी ये कहानी… हैरान कर देगा ददरी मेले का इतिहास" width="1280" height="720" /></figure>
<p><a href="https://bh.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6" rel="nofollow noopener" target="_blank">उत्तर प्रदेश</a> के बलिया जिले में लगने वाले विश्व प्रसिद्ध ददरी मेले का नाम तो आपने सुना ही होगा. यह मेला करीब 10 दिन पहले ही शुरू हो चुका है. अभी यहां नंदीग्राम शुरू हुआ है, जहां पशुधन की खरीद फरोख्त शुरू हुई है. 15 नवंबर यानी कार्तिक पूर्णिमा से यहां मीना बाजार भी शुरू हो जाएगा. इस मेले का ना केवल ऐतिहासिक महत्व है बल्कि इसका पौराणिक महत्व भी है. सबसे बड़ी बात यह कि इस समय दुनिया भर में नदियों को जोड़ने की योजनाएं चल रही है, उसकी नींव इसी ददरी मेले में पड़ी थी. क्या आप जानते हैं कि यह मेला कब और कैसे शुरू हुआ? यदि नहीं, तो यहां हम आपको बता रहे हैं. इस मेले का जिक्र मत्स्य पुराण और पद्म पुराण में मिलता है.</p>
<p>कथा आती है कि भगवान नारायण के वक्ष पर लात मारने के बाद भृगु ऋषि को बहुत ग्लानि हुई. इसके बाद वह बलिया की धरती पर आए और गंगा के किनारे आश्रम बनाकर खगोल एवं ज्योतिष शास्त्र पर रिसर्च करने लगे. उसी समय से बलिया और गंगा के इस तटवर्ती क्षेत्र को भृगु क्षेत्र कहा जाता है. ज्योतिषीय गणनाओं के दौरान ही महर्षि भृगु ने देखा कि कलियुग के प्रारंभिक चरण में गंगा की जलधारा थम जाएगी. यह देखकर उन्हें चिंता हुई और अपने बेहद प्रिय शिष्य दर्दर मुनि से सलाह किया. उस समय भृगु ऋषि ने विचार किया कि अयोध्या तक आ रही सरयू की जलधारा को खींचकर गंगा में मिला दिया जाए तो गंगा की जलधारा लगातार बनी रहेगी.</p>
<h3>दुनिया में पहली बार जोड़ी गईं दो नदियां</h3>
<p>इसी सोच के साथ करीब 7000 ईसा पूर्व दोनों गुरु चेले अयोध्या पहुंच गए. वहां इन्होंने महर्षि वशिष्ठ के सामने यह प्रस्ताव रखा. वहीं महर्षि वशिष्ठ भी भृगु मुनि की भविष्यवाणी सुनकर चिंतित हो गए. उन्होंने तत्काल नदी जोड़ने के ऑपरेशन को हरी झंडी दे दी. इसके बाद भृगु मुनि द्वारा खींचे गए नक्शे के आधार पर दर्दर मुनि ने सरयू की जलधारा को खींचते हुए बलिया में गंगा की धारा से मिला दिया. पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक जैसे ही सरयू की धारा और गंगा की धारा आपस में टकराई तो दर-दर घर-घर की आवाजें आने लगीं. इन्हीं आवाजों को सुनकर महर्षि भृगु ने उस स्थान का नाम तो दर्दर रख दिया. यह उनके शिष्य का नाम भी था. इसी प्रकार जो जलधारा अयोध्या से निकलकर बलिया तक आई, उसे घर्घर यानी घाघरा कहा.</p>
<h3>कार्तिक पूर्णिमा को हुआ गंगा और घाघरा का संगम</h3>
<p>पौराणिक साक्ष्यों के मुताबिक घाघरा और गंगा का यह संगम कार्तिक महीने की पूर्णिमा का हुआ था. उसी उपलक्ष्य में बलिया के दर्दर क्षेत्र में भव्य और दिव्य मेले का आयोजन किया जाता है. दर्दर भूमि पर आयोजन की वजह से ही इस मेले को ददरी मेला कहा जाता है. चूंकि उस समय भृगु ऋषि का ज्योतिष विज्ञान पर रिसर्च पूरा हो चुका था और उन्होंने इसी रिसर्च के आधार पर दुनिया का पहला ज्योतिष शाष्त्र पर आधारित ग्रंथ भृगु संहिता की रचना कर ली थी. इसलिए उन्होंने इस ग्रंथ का इसी मेले में लोकार्पण किया और अपने सूत्रों का सार्वजनिक परीक्षण भी किया था.</p>
<h3>अब जानिए मेले की महत्ता</h3>
<p>ददरी मेले के दो हिस्से हैं. एक महीने चलने वाले इस मेले के तहत एक नवंबर से ही पशु मेला शुरू हो गया है. पशु मेले में भी दो हिस्से हैं. एक हिस्से में तो हाथी, घोड़े, गाय, भैंस समेत अन्य प्रजाति के जानवरों की खरीद फरोख्त होती है. वहीं दूसरे हिस्से में केवल गदहों की बिक्री होती है. इसे गरदह मेला कहा जाता है. इस गरदह मेले की एक अनोखी खासियत है. यहां देश भर से धोबी जनजाति के लोग गरहे खरीदने और बेचने के लिए आते हैं. यहीं पर उनकी आपस में मुलाकात होती है और यहीं उनके बेटे बेटियों की शादी भी हो जाती है. इसी प्रकार एक हालांकि मीना बाजार 15 नवंबर कार्तिक पूर्णिमा को शुरू होगा.</p>
<h3>क्षैतिज होती है सूर्य की किरणें</h3>
<p>पद्म पुराण के दर्दर क्षेत्र महात्म्य खंड के अनुसार भृगु क्षेत्र यानी बलिया और गाजीपुर की लोकेशन ऐसी है कि कार्तिक महीने में जब सूर्योदय होता है तो सूर्य की किरणें धरती पर क्षैतिज पड़ती हैं. ऐसे में गंगा और घाघरा के संगम पर पानी के साथ टकराकर यह किरणें पॉजिटिव एनर्जी जेनरेट करती हैं. इन किरणों में प्रभाव में आते ही कई तरह की बीमारियों का क्षय हो जाता है. खासतौर पर पुरुषत्व में वृद्धि होती है. इसी मान्यता के तहत कार्तिक पूर्णिमा को यहां सबसे बड़ा नहान होता है. इसमें शामिल होने के लिए समूचे उत्तर भारत से लोग आते हैं. मत्स्य पुराण के मुताबिक शरद पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा के बीच जो भी व्यक्ति यहां स्नान करता है, उसके सभी पाप कट जाते हैं.</p>
<p>यह भी पढ़ें: <a href="https://sarkarimanthan.com/raped-a-girl-in-a-dark-room-for-1-5-years-and-then-burnt-her-private-parts-firozs-brutality-came-to-light/">1.5 साल तक अंधेरे कमरे में किया लड़की से रेप, फिर जला दिया प्राइवेट पार्ट…सामने आई फिरोज की दरिंदगी</a></p>
<div class="qx-heading qx-article version7" data-url="https://sarkarimanthan.com/raped-a-girl-in-a-dark-room-for-1-5-years-and-then-burnt-her-private-parts-firozs-brutality-came-to-light/">
<div id="qx-widget-2599926461549422">
<h5 class="qx-widget-article-price qx-heading-priceup"><span style="font-size: 22px;">दुनिया भर में प्रसिद्धि</span></h5>
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</div>
<p>समय के साथ इस मेले के क्षेत्र और प्रभाव दोनों में ही कमी आई है. मुगल काल में इस मेले की चर्चा पूरे जंबूद्वीप में थी. उन दिनों यहां लगने वाले मेले में वैश्विक व्यापार होता था. ढाका से मलमल, लाहौर और कराची से मसाले, ईरान से घोड़े, पंजाब, हरियाणा, उड़ीसा, और नेपाल से गधे यहां पर खरीद फरोख्त के लिए लाए जाते थे.चीनी यात्री फ़ाह्यान ने भी इस मेले का जिक्र अपनी किताब में किया है.</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/astrology-born-here-connected-the-river-with-the-river-this-9-thousand-years-old-story-history-of-dadri-fair-will-surprise-you">यहां जन्मा ज्योतिष, नदी को नदी से जोड़ा, 9 हजार साल पुरानी ये कहानी… हैरान कर देगा ददरी मेले का इतिहास</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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		<title>ईमानदारी और सादगी के प्रतीक थे शास्त्री जी&#8230; </title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/shastri-ji-was-a-symbol-of-honesty-and-simplicity</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Om Tiwari]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Sep 2024 09:39:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[मुगलसराय]]></category>
		<category><![CDATA[लाल बहादुर शास्त्री]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर को शारदा प्रसाद और रामदुलारी देवी के घर उत्तर प्रदेश में मुगलसराय शहर के पास रामनगर में हुआ था। नेहरू जी के निधन के बाद शास्त्री जी देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। शास्त्री जी के ईमानदारी और सादगी-पूर्ण जीवन के अनेक किस्से है &#8211; पहला वाक़या जिक्र कर &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/shastri-ji-was-a-symbol-of-honesty-and-simplicity">ईमानदारी और सादगी के प्रतीक थे शास्त्री जी&#8230; </a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर को शारदा प्रसाद और रामदुलारी देवी के घर उत्तर प्रदेश में मुगलसराय शहर के पास रामनगर में हुआ था। नेहरू जी के निधन के बाद शास्त्री जी देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। शास्त्री जी के ईमानदारी और सादगी-पूर्ण जीवन के अनेक किस्से है &#8211;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पहला वाक़या जिक्र कर रहा हूं, </strong>जब शास्त्री जी देश के प्रधानमंत्री थे, एक बार उनके बेटे सुनील शास्त्री जी ने रात कही जाने हेतु सरकारी गाड़ी लेकर चले गए और जब वापस आए तो लाल बहादुर शास्त्री जी ने पूछा कहा गए थे, सरकारी गाड़ी लेकर इस पर सुनील जी कुछ कह पाते की इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री जी ने कहा कि सरकारी गाड़ी देश के प्रधानमंत्री को मिली है ना की उसके बेटे को, आगे से कही जाना हो तो सरकारी गाड़ी का प्रयोग ना किया करो, शास्त्री जी यही नहीं रुके उन्होंने अपने ड्राइवर से पता करवाया की गाड़ी कितने किलोमीटर चली है और उसका पैसा सरकारी राज कोष में भी जमा करवाया। </p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारे देश में आजकल जन प्रतिनिधियों के परिजनों के साथ उनके करीबी लोग भी उन्ही के  सरकारी गाड़ी में घूमते हैं अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दूसरा वाक़या जिक्र कर रहा हूं,</strong> लाला लाजपतराय ने आजादी की लड़ाई लड़ रहे गरीब देशभक्तों के लिए सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी बनायीं थी जो गरीब देशभक्तों को पचास रुपये की आर्थिक मदद प्रदान करती थी, एक बार जेल से उन्होंने अपनी पत्नी ललिता जी को पत्र लिखकर पूछा कि क्या सोसाइटी की तरफ से जो 50 रुपये की आर्थिक मदद मिलती हैं उन्हें, जवाब में ललिता जी ने कहा हाँ जिसमे से 40 रुपये में घर का खर्च चल जाता है। शास्त्री जी ये पता चलते ही बिना किसी देर किये सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी को पत्र लिखा कि मेरे घर का खर्च 40 रुपये में हो जाता हैं, कृपया मुझे दी जानी वाली सहयोग 50 रुपये से घटा कर 40 रुपये कर दी जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा देशभक्तों को भी आर्थिक सहयोग मिल सकें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आज का युग में तो यदि जन प्रतिनिधियों के सैलरी बढ़ोत्तरी की बात हो तो क्या सत्ता पक्ष, क्या विपक्ष दोनों एक मत हो इस मांग पर अपना समर्थन दे देते हैं, भले ही राष्ट्रहित और समाज हित के मुद्दों पर ये लड़ते देखे जाए। ये भी नहीं सोचते आज के वर्तमान जनप्रतिनिधि की वह तो सरकारी पैसे से मौज से जी रहे है और देश का किसान, मज़दूर इत्यादि गरीबी, महंगाई और अभाव की जिंदगी जी रहे हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>किस्सों के दौर में आगे चलते है तो एक किस्सा और जुड़ा है शास्त्री जी से, </strong>शास्त्री जी जब प्रधानमंत्री थे और उन्हें मीटिंग के लिए कही जाना था। जब वह कपड़े पहन रहे थे तो उनका कुर्ता फटा था जिसपर परिजनों ने कहा आप नया कपड़ा क्यों नहीं ले लेते हैं। इस पर पलट कर शास्त्री ने कहा की मेरे देश के अब भी लाखों लोगो के तन पर कपड़े नहीं है, फटा हुआ तो क्या हुआ इसके ऊपर कोट पहन लूंगा, और फटा कपड़ा इस तरह कुछ दिन और काम में आ जायेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसे थे हमारे शास्त्री जी, आज के जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों के सुट लाखों में आते हैं इन्हे इससे फर्क नहीं पड़ता की देश के लाखों लोगो की वार्षिक आय भी नहीं होगी लाखों रुपये।  </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कथनी और करनी में समानता रखते थे शास्त्री जी</strong>,</p>



<p class="wp-block-paragraph">बात सन 1965 का जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध चल रहा था और भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुंच गयी थी। घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिए कुछ समय के लिए युद्ध विराम की अपील की उस समय हम अमेरिका की पीएल-480 स्कीम के तहत हासिल लाल गेहूं खाने को बाध्य थे हम भारतीय। अमेरिका के राष्ट्रपति  ने शास्त्री जी को कहा कि अगर युद्ध नहीं रुका तो गेहूं का निर्यात बंद कर दिया जाएगा। </p>



<p class="wp-block-paragraph">उसके बाद अक्टूबर 1965 में दशहरे के दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में शास्त्री जी ने देश की जनता को संबोधित किया। उन्होंने देशवासियों से एक दिन का उपवास रखने की अपील की और साथ में खुद भी एक दिन उपवास का पालन करने का प्रण लिया। देश के सीमा के रक्षक जवान और देश के अंदर अन्नदाता के लिए <strong>जय जवान, जय किसान </strong>का नारा दिया।  </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>10 जनवरी 1966 में ताशकंद में</strong> भारत के प्रधानमंत्री शास्त्री जी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच बातचीत करने का समय निर्धारित थी। लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान तय किये गये निर्धारित समय पर मिले। बातचीत काफी लंबी चली और दोनों देशों के बीच शांति समझौता भी हो गया। ऐसे में दोनों मुल्कों के शीर्ष नेताओं और प्रतिनिधिमंडल में शामिल अधिकारियों का खुश होना उचित था। लेकिन उस दिन की रात शास्त्री जी के लिए मौत बनकर आई। 10-11 जनवरी के रात में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत  हुई। </p>



<p class="wp-block-paragraph">ताशकंद समझौते के कुछ घंटों बाद ही भारत के लिए सब कुछ बदल गया। विदेशी धरती पर संदिग्ध परिस्थितियों में भारतीय प्रधानमंत्री की मौत से सन्नाटा छा गया। शास्त्री जी की मौत के बाद तमाम सवाल खड़े हुए, उनकी मौत के पीछे साजिश की बात भी कही जाती है, क्योंकि, शास्त्री जी की मौत के दो अहम गवाह उनके निजी चिकित्सक आर एन चुग और घरेलू सहायक राम नाथ की सड़क दुर्घटनाओं में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई तो यह रहस्य और गहरा हो गया।<br><strong>देश के नागरिकों को चाहिए  की शास्त्री जी के मौत की निष्पक्ष जांच की मांग करें सरकार से, यही शास्त्री जी के प्रति देश वासियों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>Report: Ankur Singh </strong></p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/shastri-ji-was-a-symbol-of-honesty-and-simplicity">ईमानदारी और सादगी के प्रतीक थे शास्त्री जी&#8230; </a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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		<title>अजब-गजब : जानकार रह जायेंगे हैरान, 80 साल पुरानी तस्वीर में मिला टाइम ट्रैवल का ये सबूत!</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/strange-you-will-be-surprised-to-know-this-proof-of-time-travel-found-in-an-80-year-old-photo</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Sep 2023 11:36:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Feature Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[#hindinews]]></category>
		<category><![CDATA[#latestnewshindi]]></category>
		<category><![CDATA[#timetravel]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>टाइम ट्रैवल को लेकर अब तक कई बार अलग-अलग तरह के दावे किए जा चुके हैं। दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो टाइम ट्रैवलिंग करने की बात कहते हैं, लेकिन हकीकत क्या है इसके बारे में कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। सोशल मीडिया पर कई ऐसी फोटोज और वीडियोज हर दिन &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/strange-you-will-be-surprised-to-know-this-proof-of-time-travel-found-in-an-80-year-old-photo">अजब-गजब : जानकार रह जायेंगे हैरान, 80 साल पुरानी तस्वीर में मिला टाइम ट्रैवल का ये सबूत!</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Time_travel" rel="nofollow noopener" target="_blank">टाइम ट्रैवल </a>को लेकर अब तक कई बार अलग-अलग तरह के दावे किए जा चुके हैं। दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो टाइम ट्रैवलिंग करने की बात कहते हैं, लेकिन हकीकत क्या है इसके बारे में कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। सोशल मीडिया पर कई ऐसी फोटोज और वीडियोज हर दिन वायरल होते रहते हैं, जिसे लोग टाइम ट्रैवल के सबूत मानते हैं। इसी कड़ी में एक बार फिर कुछ ऐसा सामने आया है जिसके कारण इन दिनों टाइम ट्रैवल की चर्चा ज्यादा हो रही है। दरअसल, हाल ही में एक ऐसी तस्वीर वायरल हो रही है, जो ये दावा कर रही है कि टाइम ट्रैवल सच में होता है। हालांकि सोशल मीडिया और विदेशी मीडिया के बीच वायरल हो रही इस अद्भुत तस्वीर को लेकर जो दावे किए जा रहे हैं, वो कितने सच हैं इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2016 में एक फेसबुक ग्रुप में एक अद्भुत फोटो शेयर की गई थी। आइसलैंड देश से जुड़े फेसबुक ग्रुप की ये फोटो आज भी काफी चर्चा में बनी हुई है। इस तस्वीर को लेकर दावा किया जा रहा है कि उसमें एक ऐसा व्यक्ति मौजूद है, जो टाइम ट्रैवलर हो सकता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="512" height="268" src="https://sarkarimanthan.com/wp-content/uploads/2023/09/TIME-1.jpg" alt="" class="wp-image-76498"/></figure>



<p class="wp-block-paragraph">इस दावे के पीछे का आधार ये बताया जा रहा है कि ये व्यक्ति साल 1943 में मोबाइल फोन पर बात कर रहा है। वो भीड़ के बीचों-बीच खड़ा है और सबसे अलग हरकत कर रहा है। फोटो में लग रहा है कि वह व्यक्ति खड़े होकर फोन पर बात कर रहा है, जबकि रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ये तस्वीर 1943 के आइसलैंड के Reykjavík की है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ये तस्वीर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की बताई जा रही है। आप इस फोटो में देख सकते हैं कि इस भीड़भाड़ में सैनिक इधर-उधर आते-जाते दिख रहे हैं। वहीं कोने में एक दुकान की दीवार से लगकर एक शख्स खड़ा है, जिसने हाथों को कान पर रखा है, जिसे देखकर बिल्कुल ऐसा ही लग रहा है कि वह फोन पर बात कर रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस रहस्यमयी व्यक्ति के चेहरे पर चिंता की हल्की सी झलक भी देखने को मिल रही है। इस फोटो में कई अमेरिकी सैनिक सड़क से गुजरते दिख रहे हैं और कुछ आइसलैंड की कड़कड़ाती ठंड से निपटने के लिए ट्रेंच कोट पहने हुए नजर आ रहे हैं। इसके अलावा वहां कुछ पुलिसकर्मी भी खड़े हैं। हालांकि इस फोटो के पीछे का रहस्य बरकरार है।</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/strange-you-will-be-surprised-to-know-this-proof-of-time-travel-found-in-an-80-year-old-photo">अजब-गजब : जानकार रह जायेंगे हैरान, 80 साल पुरानी तस्वीर में मिला टाइम ट्रैवल का ये सबूत!</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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		<title>चंद्रयान-3 : आज से 56 साल पहले इस एक्टर ने कर ली थी &#8216;चांद पर चढ़ाई&#8217;, जानिये पूरी कहानी</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/chandrayaan-3-56-years-ago-this-actor-had-walked-on-the-moon-know-the-full-story</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anoop Mishra &#124; SARKARI MANTHAN]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Aug 2023 09:47:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Feature Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[मनोरंजन]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के मून मिशन चंद्रयान-3 पर दुनियाभर की नजरें टिकी हुई हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि लगभग 56 साल पहले बॉलीवुड ने एक ऐसी फिल्म बनाई थी जिसमें मून मिशन की कहानी बताई गई थी? इस फिल्म का नाम &#8216;चांद पर चढ़ाई&#8217; था और इसे हिंदी सिनेमा की पहली &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/chandrayaan-3-56-years-ago-this-actor-had-walked-on-the-moon-know-the-full-story">चंद्रयान-3 : आज से 56 साल पहले इस एक्टर ने कर ली थी &#8216;चांद पर चढ़ाई&#8217;, जानिये पूरी कहानी</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (<a href="https://en.wikipedia.org/wiki/ISRO" rel="nofollow noopener" target="_blank">ISRO</a>) के मून मिशन चंद्रयान-3 पर दुनियाभर की नजरें टिकी हुई हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि लगभग 56 साल पहले बॉलीवुड ने एक ऐसी फिल्म बनाई थी जिसमें मून मिशन की कहानी बताई गई थी? इस फिल्म का नाम &#8216;चांद पर चढ़ाई&#8217; था और इसे हिंदी सिनेमा की पहली साइंस फिक्शनल फिल्म के रूप में माना जाता है। दारा सिंह ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी और उन्होंने मून पर यात्री कैप्टन आनंद का किरदार निभाया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आमतौर पर लोग जानते हैं कि नील आर्मस्ट्रांग ने सन् 1969 में मून पर कदम रखा था, लेकिन कम लोगों को यह मालूम होगा कि दारा सिंह की &#8216;चांद पर चढ़ाई&#8217; फिल्म आर्मस्ट्रांग के चंद्रयान मिशन से 2 साल पहले ही रिलीज हो गई थी। यह फिल्म सन् 1967 में रिलीज हुई थी और इसमें मून पर जीवन की खोज के तरीकों का वर्णन किया गया था। फिल्ममेकर टीपी सुंदरम के निर्देशन में बनी इस फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर सफलता तो नहीं मिली, लेकिन इसने अगले दशकों में होने वाले विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अद्वितीय विकास का संकेत दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आपको बता दे, फिल्म &#8216;चांद पर चढ़ाई&#8217; में टैक्नोलॉजी का अद्वितीय उपयोग किया गया था, जैसे ईमेल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रॉकेट लॉन्चिंग आदि। फिल्म में दारा सिंह के साथ अनवर हुसैन, भगवान, जी रत्न, और पद्म खन्ना जैसे अभिनेता महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आए थे। बता दे, इस फिल्म ने वो विज्ञान और प्रौद्योगिकी की संभावनाओं को दिखाया था जो उस समय अद्वितीय थे। यह एक महत्वपूर्ण यादगार फिल्म रही जिसने विज्ञान की दुनिया में नई सोच और अद्वितीय विकास की दिशा में पहल की थी।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><strong><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color"> यह भी पढ़े :</mark></strong> <strong><a href="https://sarkarimanthan.com/update-related-to-chandrayaan-3-before-the-launch-of-chandrayaan-3-know-the-temperature-and-total-temperature-conditions/">चंद्रयान-3 से जुड़ी अपडेट : चंद्रयान-3 की लैंडिंग से पहले जानिये हालात और तापमान की पूरी स्थिति</a></strong></p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/chandrayaan-3-56-years-ago-this-actor-had-walked-on-the-moon-know-the-full-story">चंद्रयान-3 : आज से 56 साल पहले इस एक्टर ने कर ली थी &#8216;चांद पर चढ़ाई&#8217;, जानिये पूरी कहानी</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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		<item>
		<title>मिशन चंद्रयान-1 : प्रोब के उपर बना तिरंगा चांद पर जब स्थापित हो गया था, जानिए ! 15 साल पहले इसरो की कहानी</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/mission-chandrayaan-1-the-story-of-isro-15-years-ago-when-the-tricolor-on-the-probe-was-established-on-the-moon</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anoop Mishra &#124; SARKARI MANTHAN]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Aug 2023 08:35:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Feature Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>चांद की सतह के काफी करीब भारत का चंद्रयान-3 पहुंच चुका है। इसरो के मुताबिक चंद्रयान-3 को सॉफ्ट लैंडिंग करने में सफलता अवश्य मिलेगी। हालांकि, 19 अगस्त को रूस के लूना-25 मिशन चांद की सतह से टकरा गया था, जो दुखद समाचार था। लूना-25 की असफलता ने साल 2019 में चंद्रयान-2 की याद ताजा कर &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">चांद की सतह के काफी करीब भारत का <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Chandrayaan-3" rel="nofollow noopener" target="_blank">चंद्रयान-3</a> पहुंच चुका है। इसरो के मुताबिक चंद्रयान-3 को सॉफ्ट लैंडिंग करने में सफलता अवश्य मिलेगी। हालांकि, 19 अगस्त को रूस के लूना-25 मिशन चांद की सतह से टकरा गया था, जो दुखद समाचार था। लूना-25 की असफलता ने साल 2019 में चंद्रयान-2 की याद ताजा कर दी थी, लेकिन हम यहाँ एक ऐसे मिशन की बात करने जा रहे हैं, जो की साल 2008 में भारत ने शुरू किया था। उस समय तक, चांद के रहस्य को अमेरिका, रूस, जापान और यूरोपीय देशों ने सफलतापूर्वक खोजा था। भारत का चंद्रयान मिशन, साल 2008 में चांद पर नहीं पहुंचा, लेकिन चांद तक तिरंगा पहुंचाने में सफल रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>खास दिन था साल 2008 भारत के लिए<br></strong>आपको बता दे, साल 2008, 14 नवंबर भारत के लिए एक महत्वपूर्ण दिन था। हालांकि वातावरण में ठंड पड़ रही थी, लेकिन इसरो के दफ्तर में उत्साह भरा हुआ था। इसका कारण था &#8211; इसरो ने अपने अंतरिक्ष यान को चंद्रमा की सतह पर क्रैश करने का निर्णय लिया था। आठ दिनों बाद, अर्थात 22 नवंबर 2008 को, इसरो ने अपने अंतरिक्ष यान को चांद की सतह पर उतार दिया। इस भारतीय मून मिशन का नाम &#8216;चंद्रयान 1&#8217; था। इस स्पेसक्रॉफ्ट में 32 किलोग्राम का एक प्रोब भी था, जिसे इसरो ने &#8216;मून इंपैक्ट प्रोब&#8217; नाम दिया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इसरो ने मून इंपैक्ट प्रोब को नष्ट करने का दिया था आदेश<br></strong>17 नवंबर की रात को, इसरो ने मून इंपैक्ट प्रोब को नष्ट करने का आदेश दिया। उस समय प्रोब चांद की सतह से 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर घूम रहा था। जब आदेश दिया गया, प्रोब ने चांद की कक्षा से निकलकर सतह पर पहुँचने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। उस दौरान प्रोब की रफ्तार को धीरे-धीरे कम किया जा रहा था और इस प्रक्रिया को इसरो के इंजीनियर ध्यानपूर्वक संचालित कर रहे थे। प्रोब में वीडियो इमेजिंग सिस्टम, रडार अल्टीमेटर और मास स्पेक्ट्रोमीटर थे, जिनके माध्यम से चांद की सतह के बारे में जानकारी प्राप्त की जा रही थी। प्रोब चांद के करीब पहुँचते हुए विभिन्न जटिलताओं का सामना करना पड़ा जिसके कारण चांद की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग नहीं हो सकी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चांद की सतह पर तिरंगा<br></strong>आपको बता दे, प्रोब चांद की सतह पर पहुँच गया, लेकिन दुर्भाग्यवश एक हादसे के कारण भारत की पहली मून मिशन असफल हो गई। हालांकि, असल में ऐसा नहीं हुआ था। चंद्रयान-1 मिशन ने प्रोब के माध्यम से चांद की सतह पर छोटी जानकारियों को प्राप्त किया और इसका फायदा मिशन चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 मिशन में मिला। इस मिशन के माध्यम से हमें यह भी पता चला कि चांद की वास्तविकता उसकी पूरी रूपरेखा और गुरुत्वाकर्षण के साथ कुछ और बात है। सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि प्रोब ने चांद पर तिरंगे को स्थापित कर दिया था, जिससे भारत ने एक इतिहास रच दिया था।</p>



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		<title>आज ही के दिन मनाया जाता है कारगिल विजय दिवस, जानें इस दिन की पूरी दास्तान</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/kargil-victory-day-is-celebrated-on-this-day-know-the-whole-story-of-this-day</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anoop Mishra &#124; SARKARI MANTHAN]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Jul 2023 07:10:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Feature Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[#bharat]]></category>
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		<category><![CDATA[नरेन्द्र मोदी]]></category>
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		<category><![CDATA[मोदी सरकार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कारगिल विजय दिवस आज ही के दिन 26 जुलाई को मनाया जाता है। आइये बताते हैं इसका पूरा इतिहास। जैसा की हम सब जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के विभाजन के शुरुआत के दिनों से ही आजतक संघर्ष जारी है। अक्सर LOC पर गोलीबारी खबरें सुनाई देती रहती है। आपको बता दे, विभाजन के &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/kargil-victory-day-is-celebrated-on-this-day-know-the-whole-story-of-this-day">आज ही के दिन मनाया जाता है कारगिल विजय दिवस, जानें इस दिन की पूरी दास्तान</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Kargil_Vijay_Diwas" rel="nofollow noopener" target="_blank">कारगिल विजय दिवस</a> आज ही के दिन 26 जुलाई को मनाया जाता है। आइये बताते हैं इसका पूरा इतिहास। जैसा की हम सब जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के विभाजन के शुरुआत के दिनों से ही आजतक संघर्ष जारी है। अक्सर LOC पर गोलीबारी खबरें सुनाई देती रहती है। आपको बता दे, विभाजन के बाद से ही दोनों देशों का सैन्य बल कश्मीर के लिए लड़ता रहता है और ये लड़ाई आज भी जारी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कैसे जीती गई साल 1999 की <strong>जंग</strong>?<br></strong>आपको बता दे, साल 1999 में हुए कारगिल युद्ध में भारत ने पकिस्तान को धूल चटाया था। इस युद्ध में भारत और पाक आमने सामने था और भारतीय वीर जवानों ने बहुत ही बहादुरी से पाकिस्तान के कब्जे से करगिल की ऊंची चोटियों को आजाद कराया था। बता दे, साल 1999 की इस जंग में हमारे देश के कई जवान शहीद हुए थे जाते जाते उन्होंने ने अपनी वीरता से करगिल युद्ध में विजय भारत के नाम कर गए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>साल 1999 हमारे देश के इतिहास है एक सुनहरा पन्ना <br></strong>साल 1999 में आज ही के दिन करगिल विजय दिवस के तौर पर मनाया जाता है और यह दिन हमारे देश के इतिहास एक सुनहरा पन्ना है जो हमेशा चमकता रहेगा। यह दिन भारतीय सेना के वीरता और साहस का प्रतीक है। भारत की गौरवपूर्ण जीत और भारतीय जवानों की शाहदत इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो गयी। इसीलिए उन शहीदों की कुर्बानी की याद में आज ही के दिन 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस मनाया जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कारगिल को किया</strong> <strong>वापस भारत के नाम <br></strong>भारतीय सैनिकों ने अपने देश की रक्षा के लिए न जाने कितनी मुश्किलें और चुनौतियों का सामना किया है। दुश्मन के ऊंचे चोटियों पर भारतीय सैन्य ने अपने वीरता से झंडा गाढ़ दिया और कारगिल को वापस भारत के नाम कर दिया। यह विजय भारतीय सैन्य के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था, जो उन्हें अपनी दृढ़ता, समर्थन और एकता का संदेश दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शहीदों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि<br></strong>कारगिल विजय दिवस पर हम अपने वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं और उन्हें सम्मानित करते हैं, जो अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान न्यौछावर कर देते हैं। यह दिन हमें अपने देश के सैनिकों की शौर्य गाथाओं को याद करने का एक मौका देता है, जो हमेशा हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><strong><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color">यह भी पढ़े :</mark></strong> <strong><a href="https://sarkarimanthan.com/public-upset-due-to-heavy-rains-in-delhi-ncr-waterlogging-at-many-places-all-schools-closed-in-noida-greno/">दिल्ली-NCR में भारी बारिश से जनता परेशान, बहुत जगहों पर जलभराव, नोएडा-ग्रेनो में सभी स्कूल बंद</a></strong></p>
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		<title>मनोज कुमार: पीएम के कहने पर मनोज कुमार ने बनाई &#8216;उपकार&#8217;, मुंबई जाते हुए ट्रेन में ही लिख डाली थी पूरी कहानी</title>
		<link>https://sarkarimanthan.com/manoj-kumar-at-the-behest-of-pm-manoj-kumar-made-upkaar-wrote-the-whole-story-in-the-train-while-going-to-mumbai</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anoop Mishra &#124; SARKARI MANTHAN]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Jul 2023 11:35:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Feature Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास के पन्ने]]></category>
		<category><![CDATA[मनोरंजन]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज, 24 जुलाई भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता, निर्माता, और निर्देशक मनोज कुमार का 86वां जन्मदिन है। मनोज कुमार, जिनका जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था, हिंदी सिनेमा में अपने योगदान के लिए बहुत प्रसिद्ध हुए हैं, खासकर देशभक्ति भावना से भरी फिल्मों के लिए। इसीलिए, उन्हें भारत कुमार के &#8230;</p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/manoj-kumar-at-the-behest-of-pm-manoj-kumar-made-upkaar-wrote-the-whole-story-in-the-train-while-going-to-mumbai">मनोज कुमार: पीएम के कहने पर मनोज कुमार ने बनाई &#8216;उपकार&#8217;, मुंबई जाते हुए ट्रेन में ही लिख डाली थी पूरी कहानी</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आज, 24 जुलाई भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता, निर्माता, और निर्देशक <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Manoj_Kumar" rel="nofollow noopener" target="_blank">मनोज कुमार</a> का 86वां जन्मदिन है। मनोज कुमार, जिनका जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था, हिंदी सिनेमा में अपने योगदान के लिए बहुत प्रसिद्ध हुए हैं, खासकर देशभक्ति भावना से भरी फिल्मों के लिए। इसीलिए, उन्हें भारत कुमार के नाम से भी जाना जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आपको बता दे, साल 1965 में रिलीज हुई फिल्म &#8216;शहीद&#8217; में मनोज कुमार ने मशहूर क्रांतिकारी भगत सिंह का किरदार निभाया था। यह फिल्म दर्शकों को बहुत पसंद आई थी। इस फिल्म के देखने के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मनोज कुमार से लंबी बातचीत की, और उन्हें अपने नारे &#8216;जय जवान जय किसान&#8217; पर फिल्म बनाने का सुझाव दिया।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><strong><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color">यह भी पढ़े :</mark></strong> <strong><a href="https://sarkarimanthan.com/bigg-boss-ott-2-a-new-twist-is-going-to-come-this-week-know-which-two-contestants-will-be-evicted-from-bigg-boss/">बिग बॉस ओटीटी 2: इस हफ्ते आने वाला है नया ट्विस्ट, जाने – कौन से दो कंस्टेस्टेन्ट बिगबॉस से होंगे बेघर ?</a></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">साल 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में एक सार्वजनिक सभा में प्रधानमंत्री शास्त्री ने अपने नारे &#8216;जय जवान जय किसान&#8217; को लोगों के सामने प्रस्तुत किया था। इस नारे के प्रभाव से प्रेरित होकर मनोज कुमार ने जल्द ही फिल्म &#8216;उपकार&#8217; को निर्माण करने का निर्णय लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुंबई जाने के दौरान ट्रेन में ही मनोज कुमार ने इस कहानी को लिख डाला था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मनोज कुमार ने &#8216;उपकार&#8217; में स्वयं भी मुख्य भूमिका निभाई थी, जिसने लोगों के दिलों में ताक़तवर प्रभाव छोड़ा था। फिल्म &#8216;उपकार&#8217; ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक खास स्थान बना लिया था और इससे मनोज कुमार की अभिनय कला को नई पहचान मिली। आपको बता दे, मनोज कुमार का जीवन और योगदान भारतीय सिनेमा में एक अद्भुत कहानी है, जो हमें सिनेमा की शक्ति और राष्ट्रीय भावना को समझाती है। उनकी पुरानी फिल्में आज भी हमारे दिलों में ज़िंदा हैं और उनके जन्मदिन पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><strong><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color">यह भी पढ़े :</mark></strong> <strong><a href="https://sarkarimanthan.com/writer-yasir-usman-answers-all-the-questions-on-rekhas-live-in-relationship/">रेखा के लिव-इन रिलेशनशिप पर आए तमाम सवालों का खुलासा, लेखक यासिर उस्मान ने दिया जवाब</a></strong></p>
<p>&lt;p&gt;The post <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com/manoj-kumar-at-the-behest-of-pm-manoj-kumar-made-upkaar-wrote-the-whole-story-in-the-train-while-going-to-mumbai">मनोज कुमार: पीएम के कहने पर मनोज कुमार ने बनाई &#8216;उपकार&#8217;, मुंबई जाते हुए ट्रेन में ही लिख डाली थी पूरी कहानी</a> first appeared on <a rel="nofollow" href="https://sarkarimanthan.com">Sarkari Manthan</a>.&lt;/p&gt;</p>
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