
दूध को सदियों से संपूर्ण आहार माना जाता रहा है। यही वजह है कि, नवजात शिशुओं को जन्म के बाद से ही मां का दूध पिलाया जाता है और परिवार के बड़े-बुजुर्ग अक्सर बच्चों और बड़ों दोनों को नियमित दूध पीने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि, दूध हड्डियों को मजबूत बनाता है, शरीर को पोषण देता है और समग्र स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र की कुछ रिपोर्ट्स और अध्ययनों ने इस लोकप्रिय धारणा पर एक नई चर्चा शुरू कर दी है।
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स्वास्थ्य पर प्रभाव
लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि, क्या अत्यधिक मात्रा में दूध या डेयरी उत्पादों का सेवन कुछ स्थितियों में स्वास्थ्य पर अलग प्रभाव भी डाल सकता है? यह विषय काफी संवेदनशील है, इसलिए इसे समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखना बेहद जरूरी है।
पार्किंसन रोग एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार है, जिसमें मस्तिष्क की कुछ कोशिकाएं प्रभावित होती हैं, जिससे गतिशीलता, संतुलन और अन्य शारीरिक क्रियाओं पर असर पड़ता है। दुनिया भर के शोधकर्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बीमारी के कारणों और जोखिम कारकों को लेकर लगातार अध्ययन कर रहे हैं। इन अध्ययनों में डेयरी उत्पादों, खासकर दूध के सेवन के साथ इसके संभावित संबंध की भी चर्चा हुई है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, दूध पीना पार्किंसन रोग का सीधा कारण नहीं है। यह कोई सिद्ध निष्कर्ष नहीं है, बल्कि कुछ बड़े पैमाने के अवलोकनात्मक अध्ययनों में एक सहसंबंध देखा गया है यानी जिन लोगों ने लंबे समय तक ज्यादा मात्रा में डेयरी उत्पादों का सेवन किया, उनमें इस बीमारी का जोखिम कुछ अन्य समूहों की तुलना में थोड़ा अधिक पाया गया। यह जोखिम पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक नजर आया है, लेकिन इसमें कई अन्य कारक जैसे उम्र, जीवनशैली, आनुवंशिकता और पर्यावरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
और भी कई कारण होते हैं पार्किंसन के
इस दिशा में सबसे चर्चित अध्ययनों में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़ी नर्सेस हेल्थ स्टडी और हेल्थ प्रोफेशनल्स फॉलो-अप स्टडी शामिल हैं। इन लंबी अवधि की रिसर्च में हजारों प्रतिभागियों की खान-पान की आदतों और स्वास्थ्य स्थिति को 20-25 वर्षों तक मॉनिटर किया गया। परिणामों में पाया गया कि, जो व्यक्ति रोजाना तीन या उससे अधिक सर्विंग लो-फैट डेयरी उत्पाद लेते थे, उनमें पार्किंसन विकसित होने का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किया गया।
इसी प्रकार अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की कैंसर प्रिवेंशन स्टडी में भी डेयरी उत्पादों के अधिक सेवन वाले पुरुषों में यह आंकड़ा थोड़ा ऊंचा देखा गया। हालांकि, सभी विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि ये अध्ययन सहसंबंध दिखाते हैं, कारण-कार्य संबंध स्थापित नहीं करते। दूध का सेवन अकेले इस बीमारी को जन्म नहीं देता। कई अन्य अध्ययन भी हैं जो इस संबंध को कमजोर या अस्पष्ट बताते हैं। इसलिए स्वास्थ्य प्रेमियों को सलाह दी जाती है कि बिना चिकित्सकीय परामर्श के अपनी डाइट में अचानक कोई बड़ा बदलाव न करें।
वैज्ञानिकों ने इस संभावित संबंध की व्याख्या के लिए कई थ्योरी प्रस्तुत की हैं। इनमें से एक थ्योरी दूध में मौजूद प्राकृतिक या पर्यावरणीय तत्वों से जुड़ी है। उदाहरण के लिए, कुछ अध्ययनों में पेस्टिसाइड अवशेषों या पर्यावरणीय प्रदूषकों की चर्चा की गई है जो चारे के माध्यम से जानवरों तक पहुंच सकते हैं। दूसरी थ्योरी गैलेक्टोज नामक प्राकृतिक शर्करा पर आधारित है, जिसके अधिक मात्रा में सेवन से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ने की संभावना जताई जाती है। इसके अलावा, गट-ब्रेन एक्सिस यानी पेट और मस्तिष्क के बीच के जटिल संबंध पर भी शोध हो रहा है।
पेट के माइक्रोबायोम पर असर
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि, डेयरी उत्पादों का अधिक सेवन पेट के माइक्रोबायोम को प्रभावित कर सकता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से शरीर के अन्य सिस्टम पर असर डालता है। यूरिक एसिड के स्तर पर डेयरी का प्रभाव भी एक चर्चा का विषय रहा है, क्योंकि यूरिक एसिड मस्तिष्क की कुछ कोशिकाओं के लिए सुरक्षात्मक भूमिका निभा सकता है। इन सभी बिंदुओं के बावजूद, दूध और डेयरी उत्पाद पोषण के महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं।
वे कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन डी और अन्य जरूरी पोषक तत्व प्रदान करते हैं जो हड्डियों, मांसपेशियों और समग्र विकास के लिए आवश्यक हैं, इसलिए संतुलित मात्रा में दूध का सेवन अधिकांश लोगों के लिए फायदेमंद माना जाता है। सबसे अच्छा तरीका यह है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ से सलाह ली जाए। हर व्यक्ति की शरीर रचना, जीवनशैली और स्वास्थ्य इतिहास अलग-अलग होता है।
संयमित सेवन करें
अगर कोई व्यक्ति पार्किंसन रोग के जोखिम कारकों से चिंतित है, तो वह स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम, अच्छी नींद और तनाव प्रबंधन पर ध्यान दे सकता है। संक्षेप में, दूध स्वास्थ्य का खजाना है, लेकिन हर अच्छी चीज की तरह इसका भी संयमित और गुणवत्तापूर्ण सेवन जरूरी है। वैज्ञानिक शोध लगातार आगे बढ़ रहे हैं और भविष्य में इस विषय पर और स्पष्ट जानकारी उपलब्ध हो सकती है। फिलहाल, संतुलित दृष्टिकोण अपनाना और विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी लेना सबसे उचित है।
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