
इंसान का शरीर एक बेहद जटिल मशीन है, जो अपनी अधिकांश प्रक्रियाएं बिना हमें बताए खुद-ब-खुद पूरी करती है। इन्हीं में से एक है सांस लेना। एक स्वस्थ व्यक्ति दिन भर में हजारों बार सांस लेता है और छोड़ता है, लेकिन हम शायद ही कभी इस पर गौर करते हैं कि हमारी सांसों का रास्ता क्या है। हालिया स्वास्थ्य शोध और विशेषज्ञों की चेतावनियां एक चौंकाने वाले तथ्य की ओर इशारा कर रही हैं।
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बिगड़ सकती है चेहरे की बनावट
दुनिया की एक बड़ी आबादी अनजाने में माउथ ब्रीदिंग यानी मुंह से सांस लेने की शिकार है। यह सुनने में भले ही एक मामूली आदत लगे, लेकिन चिकित्सा विज्ञान की भाषा में यह एक ऐसी गंभीर समस्या है जो आपके फेफड़ों, हृदय, मानसिक स्वास्थ्य और यहां तक कि आपके चेहरे की बनावट को भी बिगाड़ सकती है।

अक्सर लोग यह तर्क देते हैं कि, ऑक्सीजन तो फेफड़ों तक पहुंचनी चाहिए, चाहे वह नाक से जाए या मुंह से, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि, इस धारणा को पूरी तरह से गलत बताती हैं। उनके अनुसार, हमारा शरीर प्राकृतिक रूप से केवल नाक से सांस लेने के लिए ही डिजाइन किया गया है। नाक केवल एक रास्ता नहीं है, बल्कि यह शरीर का सबसे आधुनिक एयर प्यूरीफायर और कंडीशनर है। जब हम नाक से सांस लेते हैं, तो नाक के भीतर मौजूद छोटे बाल और म्यूकस हवा में मौजूद धूल के कणों, प्रदूषण और हानिकारक बैक्टीरिया को रोक लेते हैं। इसके अलावा, नाक हवा को शरीर के तापमान के अनुकूल गर्म करती है और उसमें जरूरी नमी जोड़ती है।
महसूस होता है भारीपन और थकान
जब कोई व्यक्ति मुंह से सांस लेना शुरू करता है, तो यह सुरक्षा कवच पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाता है। मुंह से सीधे अंदर जाने वाली हवा ठंडी, शुष्क और प्रदूषित होती है। हेल्थ एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि, यह बिना फिल्टर वाली हवा सीधे आपके फेफड़ों और गले के कोमल ऊतकों से टकराती है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति को बार-बार गले में संक्रमण, टॉन्सिल्स में सूजन और फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी का सामना करना पड़ता है। यह आदत धीरे-धीरे शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर देती है, क्योंकि जो काम नाक को करना चाहिए था, उसका बोझ अब सीधे फेफड़ों पर आ जाता है।
मुंह से सांस लेने का सबसे घातक असर रात के समय देखने को मिलता है। बहुत से लोग इस बात से अनजान होते हैं कि नींद के दौरान उनका मुंह खुला रहता है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, रात भर मुंह से सांस लेने के कारण शरीर को मिलने वाली ऑक्सीजन का स्तर प्रभावित होता है। नाक से सांस लेने पर नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन होता है, जो रक्त वाहिकाओं को फैलाने और ऑक्सीजन के अवशोषण में मदद करता है। मुंह से सांस लेने पर यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है, जिससे रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो सकती है। यही कारण है कि, कई लोग 8-9 घंटे की लंबी नींद लेने के बावजूद सुबह उठते ही भारीपन और थकान महसूस करते हैं।
खत्म हो सकती है एकाग्रता
यह समस्या यहीं नहीं रुकती। विशेषज्ञों का कहना है कि मुंह से सांस लेना ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया जैसी गंभीर बीमारी का मुख्य कारण हो सकता है। स्लीप एपनिया में नींद के दौरान सांस बार-बार रुकती है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। डॉक्टर बताते हैं कि, नींद का बार-बार टूटना और गहरी नींद का न मिल पाना व्यक्ति की एकाग्रता को खत्म कर देता है, जिससे दिन भर चिड़चिड़ापन और काम में मन न लगने जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।
बढ़ते बच्चों में मुंह से सांस लेने की आदत उनकी शारीरिक संरचना को स्थायी रूप से बदल सकती है। चिकित्सा जगत में इसे एडिनोइड फेस के नाम से भी जाना जाता है। जब बच्चा लंबे समय तक मुंह खुला रखकर सांस लेता है, तो चेहरे की मांसपेशियां खिंचने लगती हैं। धीरे-धीरे चेहरा लंबा और संकरा होने लगता है, ठुड्डी पीछे की ओर दब जाती है और दांतों की सेटिंग बिगड़ जाती है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि, बच्चों में यह आदत उनके शैक्षणिक प्रदर्शन और व्यवहार को भी प्रभावित करती है। ऑक्सीजन की सही मात्रा न मिलने के कारण बच्चे सुस्त हो सकते हैं या फिर उनमें अति-सक्रियता देखी जा सकती है।
सुधारी जा सकती है आदत
मुंह से सांस लेने की आदत को पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है। अगर आप या आपके परिवार का कोई सदस्य सोते समय खर्राटे लेता है, तो यह पहला बड़ा संकेत है। इसके अलावा, सुबह उठते ही गला बहुत ज्यादा सूखा महसूस होना, होंठों का फटना, सांसों में बदबू और लगातार रहने वाली थकान इसके प्रमुख लक्षण हैं। चिकित्सक के अनुसार, कई बार लोग इसे केवल पानी की कमी या काम का तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि जड़ उनके सांस लेने के गलत तरीके में छिपी होती है।

राहत की बात यह है कि, मुंह से सांस लेना कोई लाइलाज बीमारी नहीं, बल्कि एक सुधारी जा सकने वाली आदत है। सबसे पहले इसके मूल कारण का पता लगाना अनिवार्य है। अगर किसी व्यक्ति को साइनस, एलर्जी, नाक की हड्डी टेढ़ी होने या नाक के अंदर मांस बढ़ने की समस्या है, तो वह चाहकर भी नाक से सांस नहीं ले पाएगा। ऐसे में सबसे पहले विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए ताकि नाक का रास्ता साफ किया जा सके।
कारण का उपचार होने के बाद, ब्रीदिंग एक्सरसाइज और प्राणायाम इस आदत को बदलने में जादुई भूमिका निभा सकते हैं। योग में अनुलोम-विलोम जैसे अभ्यास न केवल नाक के रास्ते को खोलते हैं, बल्कि मस्तिष्क को फिर से नाक से सांस लेने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। इसके साथ ही, सोते समय अपने सिर की पोजीशन सही रखना और नियमित शारीरिक व्यायाम करना भी फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाता है।
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