
हरिद्वार। उत्तराखंड की राजनीति का एक ऐसा सूरज जो कभी न डूबने वाला लगता था, वह मंगलवार को हमेशा के लिए अस्त हो गया। जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जिंदगी पहले सेना में रहकर और फिर राजनीति में जनसेवा को समर्पित कर दी, वह मेजर जनरल (रि.) भुवन चंद्र खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं रहे। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी का अंतिम संस्कार हरिद्वार के श्मशान घाट पर पूरे राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ किया गया। इस अंतिम विदाई में पूरा उत्तराखंड उमड़ पड़ा। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक, पूर्व राज्यपाल से लेकर सांसद तक हर किसी की आंखें नम थीं और हर किसी की जुबान पर एक ही बात थी कि, बीसी खंडूड़ी जैसा नेता अब दोबारा नहीं आएगा।
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अनुशासन और जनसेवा की मिसाल
भुवन चंद्र खंडूड़ी का जीवन किसी साधारण राजनेता का जीवन नहीं था। वह पहले एक फौजी थे जो मेजर जनरल के पद तक पहुंचे, देश की सेवा की, अनुशासन को अपने खून में उतारा और जब राजनीति में आए तो उसी फौजी अनुशासन को अपने साथ लेकर आए। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल आज भी विकास और ईमानदारी की मिसाल के रूप में याद किया जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका सख्त रुख, जनता के प्रति उनकी जवाबदेही और राज्य के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ये सब मिलकर उन्हें उत्तराखंड की राजनीति का एक अलग ही चेहरा बनाते थे।

केंद्रीय मंत्री के रूप में भी उन्होंने देश को वह दिया जो आज भी पूरे भारत के काम आ रहा है। सांसद अनिल बलूनी ने इस पर रोशनी डालते हुए कहा कि खंडूड़ी ने देश के विकास में अहम योगदान दिया। उनके द्वारा बनाए गए सड़कों के जाल आज भी देश के काम आ रहे हैं। स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी महत्वाकांक्षी योजना उनकी दूरदृष्टि और देशसेवा की भावना का जीता-जागता प्रमाण है।
पुत्र मनीष ने दी मुखाग्नि
हरिद्वार के श्मशान घाट पर जब बीसी खंडूड़ी की चिता सजाई गई और उनके पुत्र मनीष खंडूड़ी ने उन्हें मुखाग्नि दी तो वहां उपस्थित हर व्यक्ति की आंखें भर आईं। राजकीय सम्मान के साथ-साथ सैन्य सम्मान भी दिया गया क्योंकि खंडूड़ी सिर्फ एक राजनेता नहीं बल्कि एक सैनिक भी थे। तिरंगे में लिपटी उनकी अर्थी ने एक बार फिर याद दिला दिया कि वह इस देश के लिए जीए और देश के लिए ही समर्पित रहे।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर, पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, सांसद अनिल बलूनी समेत तमाम सांसद, कैबिनेट मंत्री और वरिष्ठ नेता अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचे। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि बीसी खंडूड़ी का व्यक्तित्व और उनका काम किस कदर लोगों के दिलों में बसा हुआ था।
अभिभावक चला गया- धामी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस मौके पर भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि दिवंगत भुवन चंद्र खंडूड़ी का अचानक जाना अपूरणीय क्षति है। धामी ने कहा कि वह हमारे अभिभावक थे और समय-समय पर उनका मार्गदर्शन मिलता रहा। उनकी कमी को पूरा नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके आदर्श हमें हमेशा याद आते रहेंगे। मुख्यमंत्री के इन शब्दों में सिर्फ एक राजनीतिक श्रद्धांजलि नहीं थी बल्कि एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति सच्चा दर्द था।
सद्चरित और अनुशासन के प्रतीक थे- कोशियारी
पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने खंडूड़ी जी को सद्चरित, अनुशासन और विकास का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि, आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके काम हमें हमेशा याद आते रहेंगे। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए उदाहरण हमेशा के लिए लाभदायक रहेंगे। कोश्यारी और खंडूड़ी की जोड़ी उत्तराखंड की राजनीति में एक ऐसे दौर की प्रतीक रही जब नेता अपने काम से पहचाने जाते थे।
तपस्वी व्यक्तित्व के धनी थे खंडूड़ी- खट्टर
केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने बीसी खंडूड़ी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने सेना, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जैसे अहम पदों पर रहते हुए देश की सेवा की।

खट्टर ने उन्हें सुलझे हुए विचार के तपस्वी व्यक्तित्व वाले नेता बताया और कहा कि उनका कार्यकाल हमेशा याद किया जाएगा। यह शब्द बताते हैं कि खंडूड़ी का प्रभाव सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं था बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान एक कर्मठ और ईमानदार नेता के रूप में थी।
उत्तराखंड ने खोया अपना अभिभावक
बीसी खंडूड़ी का जाना उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है। यह उस पीढ़ी के एक प्रतिनिधि का जाना है जो राजनीति को सेवा मानती थी, सत्ता को अवसर नहीं। जो फौजी अनुशासन को जनजीवन में लेकर आए और जिन्होंने साबित किया कि राजनीति में भी ईमानदारी से काम किया जा सकता है। उनके जाने से जो शून्य पैदा हुआ है वह लंबे समय तक भरा नहीं जा सकेगा। लेकिन उनके आदर्श, उनका काम और उनकी विरासत उत्तराखंड की राजनीति और समाज को हमेशा राह दिखाती रहेगी।
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