उत्तर प्रदेश में हाउस टैक्स बढ़ाने की तैयारी, 15 साल बाद बदलेंगी दरें

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों को एक और झटका लगने वाला है। दरअसल राज्य सरकार लंबे समय से चली आ रही हाउस टैक्स की दरों में संशोधन करने की तैयारी कर रही है। अगर यह प्रस्ताव अमल में आया, तो लखनऊ सहित प्रदेश के सभी नगर निगम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ सकता है। सरकार का तर्क है कि नगर निकायों की आर्थिक हालत सुधारने और उनकी आय बढ़ाने के लिए यह कदम अब जरूरी हो चुका है।

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15 साल से नहीं बदली दरें 

जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश नगर पालिका वित्तीय संसाधन विकास बोर्ड ने प्रदेश के सभी नगर निगमों में लागू मौजूदा हाउस टैक्स की दरों की समीक्षा शुरू करने का संकेत दे दिया है। बोर्ड का मानना है कि, मौजूदा दरें अब काफी पुरानी पड़ चुकी हैं। इतने सालों में शहरों की आबादी, विकास कार्य और महंगाई तीनों ही काफी बढ़ चुके हैं। ऐसे में नगर निकायों की आमदनी बढ़ाने के लिए दरों में बदलाव करना जरूरी समझा जा रहा है। यही वजह है कि, अब नई दरों को लेकर तैयारी शुरू कर दी गई है।

लंबे समय से नहीं हुआ बदलाव

अगर बात राजधानी लखनऊ की करें, तो यहां हालात कुछ ज्यादा ही पुराने हैं। साल 2010 के बाद से यहां हाउस टैक्स की दरों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। यानी पिछले करीब डेढ़ दशक से लखनऊ के लोगों से उन्हीं पुरानी दरों के हिसाब से संपत्ति कर वसूला जा रहा है। हालांकि इस बीच नगर निगम की तरफ से दो बार साल 2016 और फिर 2023 में टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव तैयार भी किए गए थे, लेकिन दोनों ही मौकों पर पार्षदों और जनप्रतिनिधियों के विरोध के चलते इन्हें अमल में नहीं लाया जा सका।

Municipal council

अब एक बार फिर यह मामला राज्य सरकार के स्तर पर जोर पकड़ रहा है। माना जा रहा है कि, इस बार सरकार सभी नगर निगमों की आर्थिक स्थिति और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक नया और व्यापक प्रस्ताव तैयार कर सकती है, जो सिर्फ लखनऊ तक सीमित न होकर पूरे प्रदेश के नगर निगमों पर लागू होगा।

 कमाई का सबसे बड़ा जरिया है टैक्स

संपत्ति कर को नगर निगमों की आमदनी का सबसे बड़ा साधन माना जाता है। शहरों में सड़कें बनाने, साफ-सफाई का इंतजाम करने, पीने के पानी की व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट लगाने और जल निकासी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर होने वाला ज्यादातर खर्च इसी टैक्स से आने वाले पैसे से पूरा किया जाता है।

नगर निकायों का कहना है कि, वर्षों पुरानी दरों की वजह से उन्हें अब पर्याप्त राजस्व नहीं मिल पा रहा। शहरीकरण की रफ्तार जिस तेजी से बढ़ रही है, उसी अनुपात में नागरिक सुविधाओं की मांग भी बढ़ रही है। मौजूदा आय से इन जरूरतों को पूरा कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। सरकार का तर्क है कि, अगर वक्त के हिसाब से हाउस टैक्स की दरों को अपडेट किया जाए, तो नगर निगम अपने-अपने इलाकों में बेहतर सुविधाएं मुहैया करा सकेंगे।

हो सकता है विरोध

हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि यह फैसला बिना किसी अड़चन के लागू हो जाएगा। हाउस टैक्स बढ़ने का सीधा मतलब है आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ। ऐसे में राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की तरफ से इसका विरोध होने की पूरी आशंका जताई जा रही है। पहले भी जब-जब टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव सामने आए हैं, पार्षदों और स्थानीय नेताओं ने इन्हें लेकर आपत्ति जताई है। कई बार यही विरोध प्रस्तावों को रोकने की वजह भी बना है।

Municipal council

यही वजह है कि विशेषज्ञों और स्थानीय अधिकारियों का मानना है कि, सरकार इस बार भी किसी अंतिम फैसले पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों, जिसमें पार्षद, जनप्रतिनिधि और नगर निकाय के अधिकारी शामिल हैं से विस्तार से बातचीत करेगी। इसके बाद ही आगे की प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाया जाएगा।

 आम आदमी की जेब पर पड़ेगा असर 

अगर यह प्रस्ताव लागू हो जाता है, तो इसका सीधा असर उन तमाम परिवारों पर पड़ेगा जो नगर निगम क्षेत्रों में अपने घरों के मालिक हैं। हर साल चुकाए जाने वाले संपत्ति कर की रकम बढ़ने से घरेलू बजट पर असर पड़ना तय है। हालांकि, तर्क ये भी दिया जा रहा है कि अगर इस बढ़ी हुई आय का इस्तेमाल सही तरीके से शहर की सड़कों, सफाई व्यवस्था और अन्य नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने में किया जाए, तो लंबे समय में आम नागरिकों को भी इसका फायदा मिल सकता है।

फिलहाल यह मामला अभी प्रस्ताव की अवस्था में ही है और इस पर अंतिम मुहर लगना बाकी है, लेकिन इतना जरूर तय है कि आने वाले दिनों में यूपी के शहरी इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों की नजर इस फैसले पर टिकी रहेगी, क्योंकि यह सीधे तौर पर उनकी जेब से जुड़ा मामला है।

 

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