
नई दिल्ली। हरियाणा के जींद स्टेशन पर जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई, वैसे ही भारत के रेल इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया। देश की पहली ऐसी ट्रेन जो डीजल या बिजली से नहीं, बल्कि हाइड्रोजन से चलती है। जींद से सोनीपत के बीच करीब 89 किलोमीटर के इस रूट पर दौड़ने वाली यह ट्रेन नमो ग्रीन रेल के नाम से जानी जा रही है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि, यह चलते समय धुआं नहीं, पानी की भाप छोड़ती है।
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अब सवाल उठता है कि यह हाइड्रोजन आखिर है क्या, यह कितने रंग-रूप में आता है और भारत की इस ट्रेन में इस्तेमाल होने वाला हाइड्रोजन बाकियों से अलग क्यों माना जा रहा है।
क्या है हाइड्रोजन फ्यूल
ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला तत्व हाइड्रोजन है, लेकिन यह प्रकृति में अकेला कभी नहीं मिलता। यह हमेशा किसी न किसी यौगिक से जुड़ा रहता है, कभी पानी के रूप में, कभी हाइड्रोकार्बन जैसे यौगिकों में बंधा हुआ। जब वैज्ञानिक इसे इन यौगिकों से अलग करके ईंधन के तौर पर तैयार करते हैं तब यह हाइड्रोजन फ्यूल बनता है।

इसकी सबसे खास बात यह है कि, जब यह जलता है या फ्यूल सेल के भीतर इस्तेमाल होता है, तो पेट्रोल-डीजल की तरह कार्बन डाइऑक्साइड नहीं छोड़ता, बल्कि सिर्फ पानी की भाप बाहर निकालता है। यही वजह है कि, इसे दुनिया भर में सबसे स्वच्छ ईंधनों में गिना जाता है।
कई रंगों ने होता है हाइड्रोजन
यहां एक और बात समझनी जरूरी है, इड्रोजन खुद रंगहीन गैस है, लेकिन उसे बनाने के तरीके के आधार पर उसे अलग-अलग रंगों में बांटा जाता है। यह वर्गीकरण दरअसल यह बताता है कि, उस हाइड्रोजन को तैयार करते वक्त पर्यावरण को कितना नुकसान हुआ।
ग्रीन हाइड्रोजन
सबसे साफ-सुथरा है ग्रीन हाइड्रोजन, जिसे पानी का इलेक्ट्रोलिसिस करके बनाया जाता है। इसके लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली सौर या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से आती है। इसमें कार्बन उत्सर्जन लगभग न के बराबर होता है, इसलिए इसे सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है।
ब्लू हाइड्रोजन
इसके बाद आता है ब्लू हाइड्रोजन, जो प्राकृतिक गैस से तैयार होता है, लेकिन इस प्रक्रिया में निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को हवा में छोड़ने के बजाय स्टोर कर लिया जाता है।
हरियाणा में मोदी जी का हुआ भव्य स्वागत! pic.twitter.com/jN3vqLfDH4
— Sambit Patra (@sambitswaraj) July 17, 2026
ग्रे हाइड्रोजन
फिर है ग्रे हाइड्रोजन, जो भी प्राकृतिक गैस से ही बनता है, मगर इसमें बनने वाली CO₂ सीधे वायुमंडल में छोड़ दी जाती है। दुनिया में आज सबसे ज्यादा इस्तेमाल इसी हाइड्रोजन का हो रहा है, क्योंकि यह अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है।
ब्लैक और ब्राउन हाइड्रोजन

इनके अलावा ब्लैक और ब्राउन हाइड्रोजन हैं, जो क्रमशः कोयले और लिग्नाइट यानी भूरे कोयले से बनते हैं। ये दोनों सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले प्रकार माने जाते हैं।
पिंक हाइड्रोजन
वहीं पिंक हाइड्रोजन परमाणु ऊर्जा की मदद से इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए तैयार होता है और इसमें भी कार्बन उत्सर्जन काफी कम रहता है।
येलो हाइड्रोजन
येलो हाइड्रोजन का उत्पादन सामान्य ग्रिड बिजली से होता है, इसलिए इसका प्रदूषण स्तर उस बिजली के स्रोत पर निर्भर करता है।
टर्क्वॉइज़ हाइड्रोजन
सबसे नया नाम है टर्क्वॉइज़ हाइड्रोजन, जो प्राकृतिक गैस की मीथेन को पायरोलिसिस की प्रक्रिया से गुजार कर बनाया जाता है, इसमें CO₂ की जगह ठोस कार्बन बनता है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है।
भारत की ट्रेन में कौन सा हाइड्रोजन
यहां एक सवाल ये भी है कि, भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन में इस्तेमाल हो रहा हाइड्रोजन किस श्रेणी में आता है? तो जवाब है, ग्रीन हाइड्रोजन। यानी सबसे साफ और सबसे कम प्रदूषण फैलाने वाला हाइड्रोजन। यह चुनाव अपने आप में बताता है कि, भारत सरकार इस प्रोजेक्ट को सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि के तौर पर नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की एक गंभीर कोशिश के तौर पर देख रही है।

यह ट्रेन दरअसल भारत के नेशनल हाइड्रोजन मिशन का हिस्सा है, जिसकी नींव मोदी सरकार ने फरवरी 2022 में रखी थी। इस मिशन के तहत सरकार ने 2030 तक करीब 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। दिलचस्प बात यह है कि ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए जिन दो चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह पानी और सस्ती बिजली और भारत के पास दोनों ही प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। देश की लंबी समुद्री सीमा और सौर ऊर्जा की भरपूर संभावनाएं इस मिशन को व्यावहारिक बनाती हैं।
रेलवे का बड़ा प्लान
यह सिर्फ एक ट्रेन का प्रोजेक्ट नहीं है। साल 2023 में तत्कालीन रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि, भारतीय रेलवे हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज योजना के तहत आने वाले समय में कुल 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना बना रहा है। यह पूरा प्रोजेक्ट कोई छोटा-मोटा निवेश नहीं है, एक ट्रेन को बनाने में करीब 80 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जबकि इसके लिए जरूरी जमीनी ढांचा तैयार करने पर अलग से करीब 70 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
डीजल इंजन से कितना अलग
आम डीजल इंजन जलने पर धुआं और कार्बन उत्सर्जन छोड़ते हैं, जो हवा में मिलकर प्रदूषण बढ़ाते हैं। इसके उलट हाइड्रोजन इंजन का सिद्धांत बिल्कुल अलग है, इसमें हाइड्रोजन के जरिए बिजली पैदा की जाती है और इसी बिजली से ट्रेन चलती है। इस पूरी प्रक्रिया में निकलने वाला उपोत्पाद सिर्फ पानी की भाप होता है, कोई हानिकारक गैस नहीं। यही अंतर इसे पारंपरिक ईंधन से चलने वाली ट्रेनों की तुलना में कहीं ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बनाता है।
भारत शामिल हुआ दौड़ में
भारत के लिए यह कदम इसलिए भी अहम है, क्योंकि दुनिया के कई विकसित देश पहले से हाइड्रोजन ट्रेनों के प्रयोग में जुटे हैं। अब भारत भी इस दौड़ में शामिल हो चुका है। अगर आने वाले सालों में तय की गई 35 ट्रेनों की योजना सफलतापूर्वक जमीन पर उतरती है, तो यह न सिर्फ रेलवे के प्रदूषण स्तर को घटाने में मदद करेगी, बल्कि भारत को हरित ऊर्जा के क्षेत्र में एक मजबूत मिसाल के तौर पर भी स्थापित कर सकती है। फिलहाल जींद-सोनीपत रूट पर दौड़ रही यह ट्रेन इस बड़े सफर की सिर्फ शुरुआत भर है।
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