
लखनऊ। सड़क कनेक्टिविटी के मामले में उत्तर प्रदेश, देश के कई राज्यों को पीछे छोड़ चुका है। इसी कड़ी में प्रदेश सरकार अब तराई और पूर्वांचल क्षेत्र के उन जिलों पर फोकस करने जा रही है, जो राजधानी लखनऊ से अभी पूरी तरह फोर लेन कनेक्टिविटी स्थापित नहीं कर पाएं हैं। ऐसे ही पांच जिलों को फोर लेन नेटवर्क के दायरे में लाने के लिए केंद्र सरकार के सामने, यूपी की योगी सरकार ने एक विस्तृत प्रस्ताव रखा गया था, जिस पर अब केंद्र की मुहर लग चुकी है। यह परियोजना प्रदेश की सड़क अवसंरचना के लिहाज से एक एक उपलब्धि मानी जा रही है।
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CM योगी ने नितिन गडकरी के सामने रखा प्रस्ताव
बता दें कि, पीलीभीत, बलिया, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर और बलरामपुर, ये पांच ऐसे जिले हैं, जो अभी तक लखनऊ से अभी तक पूरी तरह फोर लेन कनेक्ट नहीं हो पाएं हैं। इन जिलों को फोर लेन नेटवर्क से जोड़ने के लिए नेशनल हाइवेज के कुल 154.5 किलोमीटर हिस्से का चौड़ीकरण और उन्नयन किया जाना जरूरी है।

गौरतलब है कि, यह प्रस्ताव पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के बीच हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान रखा गया था। इस बैठक में केंद्र सरकार का रुख इस प्रस्ताव को लेकर काफी सकारात्मक रहा, जिसके बाद अब इस दिशा में आगे की कार्यवाही शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है।
चार लेन में विकसित होंगे हाईवे
प्रदेश सरकार की तरफ से रखे गए इस प्रस्ताव के अनुसार, अलग-अलग जिलों में अलग-अलग नेशनल हाइवे के हिस्सों को चार लेन में विकसित किया जाना प्रस्तावित है। पीलीभीत जिले में एनएच-30 का 12 किलोमीटर हिस्सा चौड़ा किया जाएगा। बलिया में एनएच-31 के 12.5 किलोमीटर हिस्से का उन्नयन होगा। महाराजगंज में एनएच-730 का 21 किलोमीटर हिस्सा फोर लेन में तब्दील होगा। इसी तरह सिद्धार्थनगर जिले में सबसे बड़ा हिस्सा, यानी एनएच-28 का करीब 70 किलोमीटर भाग चार लेन के रूप में विकसित किया जाएगा।
बलरामपुर में एनएच-330 का 39 किलोमीटर हिस्सा भी इस योजना का हिस्सा है। सरकार का मानना है कि इन सभी हाइवे खंडों के फोर लेन में तब्दील होने से इन क्षेत्रों में आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक विकास को नई गति मिलेगी, साथ ही स्थानीय लोगों को आवागमन में भी बड़ी सहूलियत होगी।
फोर लेन कनेक्टविटी से नहीं जुड़ पाए 33 जिला मुख्यालय
आपको बता दें कि, एक तरफ जहां प्रदेश में एक्सप्रेसवे नेटवर्क का विस्तार तेजी से हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ यह तथ्य भी सामने आया है कि, प्रदेश के 33 जिला मुख्यालय ऐसे हैं, जो आपस में अभी तक फोर लेन कनेक्टिविटी से नहीं जुड़ पाए हैं। इस कमी को दूर करने के लिए संबंधित नेशनल हाइवे पैचों का चौड़ीकरण किया जाएगा, जो फिलहाल फोर लेन मानकों के अनुरूप विकसित नहीं हैं।

योजना पूरी होने के बाद इन जिलों के बीच तेज, सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाली सड़क संपर्क व्यवस्था स्थापित हो सकेगी, जिससे न केवल यात्रियों के आवागमन में सुविधा होगी, बल्कि माल परिवहन की दक्षता में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। इस पूरी योजना के तहत प्रस्तावित संपर्क मार्गों की कुल लंबाई 2576.18 किलोमीटर आंकी गई है, जिन्हें अपग्रेड किए जाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार के समक्ष रखा गया है।
फोर लेन से जुड़ेंगे ये जिला मुख्यालय
इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत प्रदेश के कई जिला मुख्यालयों को आपस में फोर लेन सड़कों से जोड़ा जाना प्रस्तावित है। इनमें अमेठी-प्रतापगढ़, अंबेडकरनगर-सुल्तानपुर, अयोध्या-गोंडा, बाराबंकी-बहराइच, अलीगढ़-बदायूं, आगरा-एटा, मैनपुरी-फर्रुखाबाद, इटावा-कन्नौज, कानपुर देहात-हमीरपुर, कानपुर नगर-हमीरपुर, गोरखपुर-महाराजगंज, महाराजगंज-कुशीनगर, महोबा-झांसी, गोंडा-बस्ती, बलरामपुर-गोंडा, बहराइच-लखीमपुर खीरी, प्रतापगढ़-जौनपुर, प्रयागराज-चित्रकूट, फतेहपुर-बांदा, पीलीभीत-लखीमपुर खीरी, शाहजहांपुर-फर्रुखाबाद, संतकबीरनगर-सिद्धार्थनगर, सिद्धार्थनगर-बस्ती, चित्रकूट-फतेहपुर, बांदा-महोबा, हमीरपुर-महोबा, रायबरेली-प्रतापगढ़, हरदोई-कन्नौज, मुरादाबाद-बदायूं, मेरठ-बागपत, गाजीपुर-जौनपुर और जौनपुर-प्रयागराज शामिल हैं।
आमतौर पर देखा जाता है कि, नेशनल हाइवे के निर्माण के दौरान एक बड़ी समस्या यह सामने आती है, वह है मिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री ढोने वाले भारी वाहन। चूंकि इन सड़कों की भार वहन क्षमता सीमित होती है, इसलिए भारी वाहनों के लगातार आवागमन से ये सड़कें जल्दी ही खराब होने लगती हैं। समस्या यह है कि, इन सड़कों की मरम्मत के लिए फिलहाल कोई निश्चित और स्थायी व्यवस्था मौजूद नहीं है। यही वजह है कि, इन सड़कों की मरम्मत का पूरा अतिरिक्त वित्तीय बोझ राज्य सरकार को ही उठाना पड़ता है, जो कि राज्य के बजट पर एक अतिरिक्त बोझ होता है।
निर्माण खर्च की भरपाई के लिए बनेगी नई व्यवस्था
एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, इस बार केंद्र सरकार के समक्ष यह मुद्दा भी गंभीरता से रखा गया था, कि सड़कों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए कोई ठोस व्यवस्था स्थापित की जाए। इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से एक महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया गया, जिसके तहत नेशनल हाइवे पर वसूले जाने वाले टोल राजस्व का एक उपयुक्त हिस्सा उन राज्य मार्गों और ग्रामीण सड़कों की मरम्मत के लिए निर्धारित किया जाना चाहिए, जो नेशनल हाइवे के निर्माण कार्य के दौरान क्षतिग्रस्त होती हैं।

सरकार का मानना है कि, यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो इससे न केवल सड़कों की समयबद्ध और नियमित मरम्मत सुनिश्चित हो सकेगी, बल्कि राज्य सरकार पर पड़ने वाला अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी काफी हद तक कम हो जाएगा। इस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार की ओर से सकारात्मक रुख अपनाते हुए इस दिशा में जल्द ही ठोस कदम उठाए जाने का आश्वासन दिया गया है, जिससे आने वाले समय में प्रदेश की सड़क अवसंरचना को और अधिक मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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