सुप्रीम कोर्ट ने दी लखनऊ कुकरैल नाइट सफारी परियोजना मंजूरी, लेकिन माननी होंगी ये शर्तें

लखनऊ। लखनऊ में बनने वाली महत्वाकांक्षी कुकरैल नाइट सफारी परियोजना को लेकर एक बड़ी खबर आ रही है। बताया जा रहा है कि,  सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को लखनऊ स्थित कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट में प्रस्तावित ‘नाइट सफारी और जूलॉजिकल पार्क प्रोजेक्ट’ को आगे बढ़ाने की इजाजत दे दी है। हालांकि, इस मंजूरी के साथ कोर्ट ने कुछ शर्तें भी रख दी हैं। कोर्ट ने कई सख्त पर्यावरणीय और नियामक शर्तें भी जोड़ दी हैं, जिनका पालन राज्य सरकार को करना होगा।

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सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी 

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के सामने दलील दी कि, इस परियोजना से पूरे रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में गंभीर खलल पड़ेगा और जंगल कापारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है, जिससे यहां रहने वाले जानवरों को दिक्कत होगी।

Kukrail Night Safari

इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने एक तीखा सवाल किया कि, क्या देश को विकास कार्यों से यूं ही रुका रहना चाहिए। उन्होंने आगे यह भी टिप्पणी की कि पारंपरिक तरीके से बने चिड़ियाघर अब पुराने और अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसे में आधुनिक समय की जरूरतों के हिसाब से इस तरह के नए और वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन किए गए प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने की जरूरत है। बेंच ने यह भी कहा कि, इस पूरे मामले को देखने और मूल्यांकन करने के लिए विशेषज्ञ हैं, जो जरूरी सावधानियां सुनिश्चित कर सकते हैं।

संरक्षण के भरोसे के साथ मिली मंजूरी

अदालत ने अपनी टिप्पणी में यह स्पष्ट किया कि, इस परियोजना के दौरान वन्यजीव संरक्षण से जुड़े सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। सरकार की तरफ से कोर्ट को यह भरोसा दिलाया गया कि, क्षेत्र में मौजूद इनवेसिव यानी बाहरी प्रजातियों को हटाने का काम भी किया जाएगा, ताकि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे। इसके साथ ही यह जानकारी भी अदालत के सामने रखी गई कि, मौजूदा चिड़ियाघर वाइल्डलाइफ कॉरिडोर के दायरे में नहीं आता, जिससे वन्यजीवों की आवाजाही पर कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ेगा।

CEC की निगरानी में पूरा होगा प्रोजेक्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी परियोजना पर नजर रखने के लिए सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) के एक सदस्य को समय-समय पर परियोजना स्थल का दौरा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने ये भी आदेश दिया है कि, इस निरीक्षण के आधार पर नियमित रिपोर्ट अदालत को सौंपी जाए, जिसमें पहली रिपोर्ट अगले तीन महीने के भीतर प्रस्तुत करनी होगी।

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गौरतलब है कि, सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने पहले ही इस पूरे मुद्दे पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश की थी, जिसमें कड़ी शर्तों के साथ नाइट सफारी प्रोजेक्ट को मंजूरी देने की सिफारिश की गई थी। राज्य सरकार ने भी इन सभी शर्तों को मानने पर अपनी सहमति जता दी है।

देश का पहला अर्बन नाइट सफारी 

यह परियोजना अपने आप में देश की एक बेहद खास पहल मानी जा रही है, क्योंकि यह भारत का पहला अर्बन नाइट सफारी प्रोजेक्ट होगा। यह विशाल परियोजना दो अलग-अलग चरणों में बांटी गई है। इसे करीब 5,000 हेक्टेयर में फैले कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट के भीतर विकसित किया जाएगा। इस पूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने में 1,500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत आने का अनुमान है।

लखनऊ जू को शिफ्ट करने का प्रस्ताव खारिज

इस मामले में एक अहम फैसला यह भी लिया गया है कि, सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने लखनऊ के मौजूदा चिड़ियाघर, जो करीब 72 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है, उसे कुकरैल क्षेत्र में शिफ्ट करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है। यह फैसला पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

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इसके अलावा कमेटी ने जंगल क्षेत्र से गुजरने वाली मौजूदा सड़क को लेकर भी एक महत्वपूर्ण बदलाव का निर्देश दिया है। पहले इस सड़क को चार लेन के चौड़े कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की योजना थी, लेकिन अब कमेटी ने इसे सिर्फ दो लेन तक सीमित रखने का आदेश दिया है, ताकि जंगल क्षेत्र पर पड़ने वाला दबाव कम से कम रहे।

एडवेंचर जोन की योजना भी रद्द

परियोजना के शुरुआती डिजाइन में एक बड़ा एडवेंचर जोन भी प्रस्तावित था, जिसमें ट्राम सर्विस, रात के अंधेरे में जंगल का रोमांचक अनुभव, विभिन्न मनोरंजक गतिविधियां और ऑगमेंटेड रियलिटी आधारित थिएटर जैसी सुविधाएं शामिल करने की योजना थी, लेकिन कमेटी ने पर्यावरणीय कारणों का हवाला देते हुए इस पूरे एडवेंचर जोन की योजना को भी रद्द कर दिया है।

सख्त गाइडलाइंस  

सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने इस परियोजना को मंजूरी देते समय कई अन्य सख्त शर्तें भी लागू की हैं। राज्य सरकार को सफारी पार्क के निर्माण के लिए सेंट्रल जू अथॉरिटी (CZA) द्वारा तय की गई गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन करना होगा। इसके साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी नियामक और पर्यावरणीय जरूरतें पूरी हों, राज्य सरकार को एक अलग ओवरसाइट कमेटी का भी गठन करना होगा, जो समय-समय पर परियोजना का निरीक्षण और सुपरविजन करेगी।

पेड़ काटने पर भी सख्त शर्तें

परियोजना के दौरान पेड़ों की कटाई को लेकर भी कमेटी ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सिर्फ उन्हीं पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है, जिनका हटना रीडिजाइनिंग, रीअलाइनमेंट या जरूरी इंजीनियरिंग बदलावों के लिए अनिवार्य हो। इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी रखी गई है कि, हर एक पेड़ को काटने के बदले 10 नए पेड़ अनिवार्य रूप से लगाए जाएंगे, यानी 1:10 का अनुपात हर हाल में बनाए रखना होगा।

वन्यजीव पर्यटन का नया मॉडल है प्रोजेक्ट

कुल मिलाकर देखा जाए, तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर सामने आया है। जहां एक तरफ अदालत ने आधुनिक और वैज्ञानिक तर्ज पर बने नाइट सफारी जैसी परियोजनाओं को हरी झंडी दी है।

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वहीं दूसरी तरफ पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़े कई सख्त प्रावधान भी लागू किए हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार किस तरह इन तमाम शर्तों का पालन करते हुए इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाती है। क्या यह प्रोजेक्ट वाकई देश में शहरी वन्यजीव पर्यटन का एक नया मॉडल बनकर उभरता है।
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