
नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार संविधान संशोधन बिल को अगले मानसून सत्र में लाने की तैयारी कर रही है। इसे लेकर अब उसे एक बड़ी राहत मिलने वाली है। दरअसल, शरद पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने ऐलान किया है कि, संविधान संशोधन बिल को अपना समर्थन देगी। बुधवार को मुंबई में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेस में इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की जानकारी शरद पवार की बेटी और पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने दी।
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सुप्रिया सुले का बड़ा ऐलान
सुप्रिया सुले ने स्पष्ट किया कि, आगामी मानसून सत्र में उनकी पार्टी चुनाव क्षेत्रों के पुनर्गठन यानी परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन बिल को अपना समर्थन देगी। हालांकि, इसके लिए उन्होंने एक ख़ास शर्त भी रखी है। सुले ने कहा, पार्टी तभी इस बिल का समर्थन करेगी जब इसमें लोकसभा और विधानसभा, दोनों की सीटों की संख्या में 50% की बढ़ोतरी का स्पष्ट प्रस्ताव शामिल हो।

इस 50% की शर्त का जिक्र करके सुप्रिया सुले ने बड़ी ही चतुराई से गेंद अब पूरी तरह भाजपा के पाले में डाल दी है। राजनीतिक हलकों में इसे एक रणनीतिक कदम के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि इससे यह साफ संदेश जा रहा है कि एनसीपी बिना शर्त समर्थन नहीं दे रही, बल्कि सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग को केंद्र में रखकर आगे बढ़ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों की बातों पर गौर करें, तो इस शर्त के सामने आने के बाद अब सरकार भी संभवतः 50% के इसी प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की तैयारी कर सकती है, ताकि विपक्ष के इस अहम सहयोगी दल का समर्थन बरकरार रखा जा सके।
सर्वदलीय बैठक में हुई अहम चर्चा
इस पूरे मुद्दे की पृष्ठभूमि पर बात करते हुए सुप्रिया सुले ने बताया कि, यह प्रस्ताव अचानक सामने नहीं आया, बल्कि इस पर पहले से ही उच्च स्तर पर बातचीत चल रही थी। उन्होंने खुलासा किया कि, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हाल ही में एक सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई थी।
सुले ने यह भी स्पष्ट किया कि, इस अहम बैठक में सिर्फ उनकी पार्टी ही नहीं, बल्कि शिवसेना (यूटीबी), कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) जैसे अन्य प्रमुख दलों का रुख भी सकारात्मक दिखा। इससे यह संकेत मिल रहा है कि, सीटों की संख्या बढ़ाने का मुद्दा अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के बीच जैसा दिख रहा है। सुले ने आगे कहा कि, अगर आगामी सत्र में यह बिल संसद में पेश किया जाता है, तो उनकी पार्टी इसका पूरी तरह समर्थन करने के लिए तैयार है।
20 जुलाई से शुरू होगा सत्र
आपको बता दें कि, संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने वाला है, जो 13 अगस्त तक चलेगा। राजनीतिक गलियारों में इस बात की संभावना जताई जा रही है कि, सरकार इसी सत्र के दौरान परिसीमन से जुड़े इस महत्वपूर्ण संविधान संशोधन बिल को पेश कर सकती है। यह बिल सरकार के लिए इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले के सत्र में विपक्षी दलों की एकजुटता के चलते यह बिल पारित नहीं हो सका था। ऐसे में अब शरद पवार गुट की एनसीपी का समर्थन मिलना सरकार के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है।
एनडीए का बढ़ा संख्याबल
महाराष्ट्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली शरद पवार की एनसीपी के इस समर्थन के बाद भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन का संसद में संख्याबल काफी मजबूत हो गया है। मौजूदा समय में शरद पवार गुट के पास लोकसभा में कुल आठ सांसद हैं। इसके अलावा एक ख़ास बात ये भी है कि, शरद पवार खुद राज्यसभा के सदस्य हैं, जिससे उच्च सदन में भी इस समर्थन का असर देखने को मिल सकता है।
इस समर्थन के जुड़ने से अब संविधान संशोधन बिल को लेकर मोदी सरकार की राह पहले की तुलना में काफी आसान होती दिख रही है। दरअसल, इससे पहले भी सरकार को इस मोर्चे पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण सहयोग मिल चुका है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के करीब 20 बागी सांसद और शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के छह सांसद पहले ही एनडीए के पक्ष में समर्थन जता चुके हैं। इन सभी समर्थनों को अगर जोड़कर देखा जाए, तो सरकार के लिए संख्याबल की स्थिति संसद में काफी मजबूत होती नजर आ रही है।
जुड़ा क्षेत्रीय दलों का हित
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ होता है कि, परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा यह मुद्दा अब सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की लड़ाई न रहकर, विभिन्न क्षेत्रीय दलों के हितों से भी जुड़ गया है। सुप्रिया सुले द्वारा रखी गई 50 प्रतिशत सीट बढ़ोतरी की शर्त इस बात का संकेत है कि, क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक ताकत और संसदीय उपस्थिति बढ़ाने के अवसर के तौर पर इस बिल को देख रहे हैं।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि, क्या सरकार वाकई 50 प्रतिशत सीट बढ़ोतरी के प्रस्ताव के साथ यह बिल संसद में पेश करती है। क्या अन्य दल भी एनसीपी की तरह इसी शर्त पर अपना समर्थन देने का फैसला करते हैं। 20 जुलाई से शुरू हो रहे मॉनसून सत्र में यह बिल निश्चित रूप से सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दों में से एक बनकर उभर सकता है, और इसका असर आने वाले समय में देश की चुनावी राजनीति की दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
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