KGMU हॉस्टल में गरमाया नॉनवेज बैन का मुद्दा, छात्र नाराज, विपक्ष भी कूदा विवाद में

लखनऊ। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के छात्रावासों में मांसाहारी भोजन पर पाबंदी लगाने के फैसले को लेकर अब राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। इस मामले में सपा और कांग्रेस कूद गई हैं। छात्रों में भी इसे लेकर मतभेद की स्थिति है। दरअसल, हाल ही में विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टलों में अब केवल शाकाहारी भोजन परोसे जाने का आदेश जारी किया है, जिसके बाद छात्रों के एक वर्ग में असंतोष देखा जा रहा है और विपक्षी दलों ने इसे लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।

इसे भी पढ़ें- मायावती ने शाहूजी महाराज को श्रद्धांजलि दी, KGMU का नाम बदलने की मांग

क्या है पूरा मामला

आपको बता दें कि, बीते दिनों खबर आई थी केजीएमयू में अब शाकाहारी खाना ही मिलेगा। ये निर्देश कुलपति खुद ने दिया है। इस निर्देश के बाद विद्यालय के छात्रावासों में रहने वाले सभी छात्र-छात्राओं के लिए भोजन व्यवस्था बदल दी गई है। अब हॉस्टल की रसोई से मांसाहारी खाने की व्यवस्था पूरी तरह से हट गई। अब केवल शाकाहारी थाली ही उपलब्ध कराई जा रही है। इस फैसले ने कैंपस में रहने वाले वे छात्र मुश्किल में आ गये हैं, जिन्हें नॉनवेज पसंद हैं और वे इसे अक्सर खाना पसंद करते हैं।

KGMU

हालांकि, हॉस्टल स्टाफ इस मुद्दे पर सीधे तौर पर कुछ भी बोलने से बच रहा है, लेकिन ऑफ़ कैमरा एक अनौपचारिक बातचीत में पता चला कि अभी तक सप्ताह में एक दिन छात्रों की मांग पर अंडा करी बनाई जाती थी, लेकिन नए नियम लागू होने के बाद अब यह सुविधा भी समाप्त कर दी गई है। हॉस्टल प्रशासन का साफ कहना है कि, जिन छात्रों को मांसाहारी भोजन करना है, उन्हें कैंपस से बाहर जाकर अपनी खाने की व्यवस्था करनी होगी।

तैयार हो रहा नया मेन्यू

इस बदलाव को लेकर सी. वी. छात्रावास के प्रभारी एस. एन. सिंह ने अपनी सफाई पेश करते हुए बताया कि, छात्रावास के लिए पूरी तरह नया मेन्यू तैयार किया जा रहा है। उनके मुताबिक, इस नए मेन्यू में छात्रों के प्रोटीन और समग्र डाइट का विशेष ख्याल रखा गया है, ताकि उन्हें पौष्टिक और संतुलित भोजन मिल सके। प्रभारी का दावा है कि, छात्रों को पर्याप्त मात्रा में भोजन मुहैया कराया जा रहा है और शाकाहारी विकल्पों के जरिए भी उनकी पोषण संबंधी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।

छात्रों में मतभेद

कुलपति के इस फैसले को लेकर छात्रों की राय बंटी हुई है। कुछ छात्र इसे सही ठहरा रहे हैं और कह रहे हैं शाकाहारी भोजन उनके लिए बेहतर और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प है। वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में छात्रों ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह फैसला समानता के सिद्धांत के खिलाफ है, क्योंकि किसी भी छात्र की व्यक्तिगत खान-पान की पसंद पर इस तरह प्रतिबंध लगाना  कहीं से भी उचित नहीं है। इन छात्रों का कहना है कि, जिन्हें नॉनवेज खाना है, उनके लिए हॉस्टल में ही अलग से व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि दोनों वर्गों के छात्रों को उनकी पसंद के अनुसार भोजन मिल सके।

विपक्ष ने साधा निशाना

जैसे ही यह मामला सार्वजनिक हुआ, प्रदेश के सियासी माहौल में हलचल मच गई। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, दोनों ही विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन को घेरना शुरू कर दिया।

कांग्रेस ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, सरकार और प्रशासन केजीएमयू जैसे महत्वपूर्ण संस्थान की वास्तविक और बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय, छात्रों की खान-पान की आदतों पर हस्तक्षेप कर रहे हैं। उनके अनुसार, यह ध्यान भटकाने की एक रणनीति है, जिसमें असली मुद्दों को दरकिनार कर गैर-जरूरी विषयों को तूल दिया जा रहा है।

हर मोर्चे पर विफल हुआ सत्ता पक्ष

वहीं समाजवादी पार्टी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए इसे भाजपा का दोहरा करार दिया। उनका कहना था कि, जब सत्तारूढ़ दल विकास के मोर्चे पर विफल साबित होता है, तब वह इस तरह के भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दों को हवा देकर जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है। उन्होंने इस संदर्भ में पश्चिम बंगाल का उदाहरण भी दिया, जहां हाल में हुए प्रदर्शनों और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की टिप्पणियों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि, बीजेपी जानबूझकर समाज में विभाजन और भेद पैदा करने की कोशिश कर रही है।

KGMU

यह विवाद ऐसे समय पर सामने आया है जब देश में शैक्षणिक संस्थानों में खान-पान से जुड़े फैसले अक्सर राजनीतिक बहस का विषय बन जाते हैं। छात्रावासों में भोजन को लेकर लिए गए प्रशासनिक निर्णय कई बार सामाजिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता से जुड़ जाते हैं, जिससे मामला केवल मेन्यू में बदलाव तक सीमित न रहकर पहचान, अधिकार और समानता जैसे व्यापक सवालों से जुड़ जाता है।

प्रदेश में तूल पकड़ रहा मुद्दा

फिलहाल स्थिति यह है कि, केजीएमयू प्रशासन अपने फैसले पर कायम है और इसे छात्रों की सेहत से जोड़कर उचित ठहरा रहा है, जबकि एक वर्ग के छात्र और विपक्षी दल इसे अधिकारों में कटौती और राजनीतिक रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि, क्या विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के विरोध के मद्देनजर अपने फैसले पर पुनर्विचार करता है या यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में और तूल पकड़ता है।

 

इसे भी पढ़ें- KGMU में कैंसर दवाओं के घोटाले की जांच का दायरा बढ़ा, ये विभाग को आए रडार पर

Related Articles

Back to top button