
नई दिल्ली। देश के तीन सबसे संवेदनशील और चर्चित धार्मिक स्थलों संभल की शाही जामा मस्जिद, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मामला और वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर जो कानूनी विवाद चल रहा है उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक नई पहल की थी, लेकिन ये पहल अभी तक अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकी।
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गहरी हैं कानूनी पेचीदगियों
सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों विवादों में शामिल हिंदू और मुस्लिम, दोनों पक्षों को मध्यस्थता के ज़रिए आपसी सहमति से मामला सुलझाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन दोनों ही पक्षों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। दोनों पक्षकारों का कहना है कि, इन मामलों में कानूनी पेचीदगियां इतनी गहरी हैं कि इनका समाधान सिर्फ अदालती सुनवाई के ज़रिए ही निकल सकता है। इसमें मध्यस्थता की कोई गुंजाइश नहीं है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट 21 से 23 अगस्त के बीच समाधान समारोह नाम से एक विशेष लोक अदालत कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। इस कार्यक्रम का मकसद कोर्ट में लंबित उन हज़ारों मामलों का निपटारा करना है, जिनमें पक्षकारों के बीच आपसी बातचीत या सहमति से समाधान निकलने की संभावना हो। इसी कड़ी में देशभर के अलग-अलग मामलों के पक्षकारों को नोटिस भेजा जा रहा है, ताकि वे मध्यस्थता के ज़रिए विवाद सुलझाने की कोशिश की जा सके।
दोनों पक्षों को भेजे गये नोटिस
इस प्रोसेस के तहत सर्वोच्च न्यायलय ने संभल, मथुरा और वाराणसी में मंदिर-मस्जिद विवाद से जुड़े हिन्दू और मुस्लिम पक्ष को नोटिस भेजे है। हालांकि, जब यह प्रपोज़ल हिंदू और मुस्लिम पार्टियों के सामने रखा गया, तो दोनों पक्ष ने इस पर असहमति जता दी। उन्होंने तर्क दिया कि, इन मामलों में उठाए गए मुद्दे सिर्फ़ ज़मीन या प्रॉपर्टी के मालिकाना हक तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें ऐतिहासिक तथ्य, धार्मिक मान्यताएं और कानूनी प्रावधान समेत कई जटिल पहलू शामिल हैं, जिन्हें न्यायिक प्रक्रिया के साथ ही सुलझाया जा सकता है।
ज्ञानवापी मस्जिद विवाद
वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद एक चल रहे दीवानी मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। इस मामले में हिंदू पक्ष का कहना है कि, सोमनाथ व्यास के परिवार द्वारा मस्जिद के तहखाने में साल 1993 तक नियमित रूप से हिंदू पूजा-अर्चना की जाती रही थी। वहीं मुस्लिम पक्ष इस दावे को सिरे से खारिज करता है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि मस्जिद की इमारत पर हमेशा से मुसलमानों का ही अधिकार रहा है।

हिंदू पक्ष दावा करता है कि, जिस ज़मीन पर मस्जिद बनी है, वहां पहले भगवान शंकर का मन्दिर था, जिसका एक हिस्सा 17वीं सदी में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन काल में तोड़ दिया गया था। मुस्लिम पक्ष तर्क देता है कि मस्जिद औरंगजेब के राज से भी पहले बनी थी, जिसमें बाद में कई स्ट्रक्चरल बदलाव किए गए। ये अलग-अलग दावे इस मामले की कानूनी पेंचदगियों को और बढ़ा रहे हैं।
मथुरा विवाद
मथुरा का विवाद भी कृष्णजन्मभूमि स्थल को लेकर है। इसके संरचनात्मक दावों को लेकर हिन्दू और मुस्लिम पक्ष के अपने-अपने दावे हैं। इस मामले को लेकर हिंदू पक्ष ने एक दीवानी अदालत में मुकदमा दायर करते हुए यह दावा किया कि, शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण कृष्ण जन्मभूमि की ज़मीन पर किया गया था। यह याचिका भगवान श्रीकृष्ण विराजमान और कुछ अन्य हिंदू भक्तों की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें मस्जिद को उसके मौजूदा स्थान से हटाने की मांग रखी गई है।

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि, कई ऐसे प्रमाण और संकेत मौजूद हैं, जो यह साबित करते हैं कि, शाही ईदगाह मस्जिद असल में एक प्राचीन हिंदू मंदिर की संरचना पर बनाई गई थी।
उल्लेखनीय है कि, सितंबर 2020 में दीवानी अदालत ने इस मूल याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि, पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के तहत इस तरह के मामले को स्वीकार नहीं किया जा सकता, लेकिन जब ये केस मथुरा जिला अदालत गया तो उसने फैसला पलट दिया। इसके बाद ये मामला कानूनी प्रक्रिया में एक्टिव हो गया।
संभल ईदगाह विवाद
संभल का विवाद तो अभी दो साल पहले सामने आया, लेकिन बेहद हिंसक रूप में आया। दरअसल, संभल की एक सिविल अदालत ने 19 नवंबर 2024 को एक अधिवक्ता आयुक्त को शाही जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद इलाके में तनाव फैल गया। पत्थरबाज़ी तथा वाहनों में आगजनी जैसी हिंसक घटनाएं सामने आईं। इस हिंस में चार लोगों की जान चली गई।

स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब 24 नवंबर को मस्जिद का दूसरा सर्वेक्षण करने के लिए सर्वेक्षकों की टीम चंदौसी कस्बे पहुंची। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के बीच सीधी झड़प हो गई, जिसने इलाके में सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ा दिया। यह घटनाक्रम आज भी संभल विवाद की सबसे संवेदनशील कड़ी माना जाता है।
दोनों पक्षों ने अस्वीकार किया प्रस्ताव
चूंकि तीनों ही विवादों में हिंदू और मुस्लिम, दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता वाली पेशकश को अस्वीकार कर दिया है, इसलिए अब यह लगभग तय माना जा रहा है कि, ये मामले समाधान समारोह के दायरे से बाहर रहेंगे और इनकी सुनवाई नियमित न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही जारी रहेगी। जानकारों का कहना है कि इन विवादों में शामिल ऐतिहासिक, धार्मिक और संवैधानिक सवाल इतने पेचीदा हैं कि इन्हें केवल आपसी सहमति या बातचीत के ज़रिए सुलझाना व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल है।
इन तीनों ही मामलों पर देशभर की नज़र टिकी हुई है, क्योंकि इनके फैसलों का असर न सिर्फ संबंधित स्थानों तक सीमित रहेगा, बल्कि इनका व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। फिलहाल, इन मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और संबंधित निचली अदालतों में सुनवाई आगे बढ़ने की उम्मीद है, जबकि मध्यस्थता का यह प्रयास अपने मौजूदा स्वरूप में असफल माना जा रहा है।
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