
लखनऊ। केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल पारित किए गए नए वक्फ कानून को मध्य प्रदेश में पहले ही लागू किया जा चुका है। वहां की सरकार ने इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार राज्य के वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन कर दिया है, जिससे मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है जहां यह कानून अमल में लाया गया। अब उत्तर प्रदेश में भी इसी तर्ज पर वक्फ बोर्ड का ढांचा बदलने की तैयारी चल रही है। केंद्र सरकार ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम-2025 इसलिए लाया था, ताकि वक्फ बोर्डों के कामकाज में पारदर्शिता आए, महिलाओं और गैर-मुस्लिम समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो और संपत्तियों का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जा सके।
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यूपी में बदला जायेगा वक्फ बोर्ड
नए संशोधित कानून के लागू होते ही उत्तर प्रदेश के सुन्नी और शिया, दोनों वक्फ बोर्डों की बनावट पूरी तरह बदल जाएगी। इस बार पहली दफा दोनों बोर्डों में दो-दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को अनिवार्य रूप से नियुक्त किया जाएगा, साथ ही मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त पसमांदा मुस्लिम समुदाय को भी बोर्ड में जगह मिलेगी।

भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री दानिश आजाद अंसारी का कहना है कि, आने वाले दिनों में सिर्फ यूपी नहीं बल्कि पूरे देश में संशोधित वक्फ कानून और उसके नियमों को लागू किया जाएगा। उन्होंने संकेत दिया है कि उत्तर प्रदेश में भी मध्य प्रदेश जैसी ही व्यवस्था अपनाई जाएगी।
मध्य प्रदेश के वक्फ बोर्ड में कानून के मुताबिक, दो हिंदू सदस्यों को शामिल किया गया है। वहां बोर्ड में कुल 11 सदस्यों की व्यवस्था है, जिनमें से कुछ पद अपने आप (पदेन) भरे जाते हैं, जैसे स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष और पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण आयुक्त। चूंकि राज्य में बार काउंसिल के चुनाव अभी जारी हैं, वहां फिलहाल कोई अध्यक्ष नहीं है, इसलिए बाकी सभी सदस्यों की नियुक्ति पहले ही की जा चुकी है। इस संबंध में पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग अधिसूचना भी जारी कर चुका है।
इन्हें मिलेगा स्थान
उत्तर प्रदेश में दोनों वक्फ बोर्डों के पुनर्गठन से बड़ा परिवर्तन आने की उम्मीद है। नए कानून के अनुसार बनने वाले बोर्ड में मुस्लिम धर्मगुरुओं, कानून के जानकारों, महिलाओं और पसमांदा समाज यानी सभी वर्गों को स्थान मिलेगा। इससे बोर्ड के कामकाज और उसकी बनावट, दोनों में व्यापक बदलाव देखने को मिलेंगे।
11 सदस्यीय बोर्ड में दो सीटें अनिवार्य रूप से गैर-मुस्लिम यानी हिंदू सदस्यों के लिए आरक्षित होंगी। यूपी सरकार पारदर्शिता और बेहतर प्रबंधन का हवाला देते हुए इन दो सदस्यों को नामित करेगी। यह पहला मौका होगा जब राज्य के सुन्नी और शिया, दोनों वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल किए जाएंगे।
बोर्ड में मुस्लिम महिलाओं के साथ-साथ पिछड़े पसमांदा मुसलमानों को भी अनिवार्य रूप से प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
संपत्तियों के डिजिटलीकरण पर जोर
नए कानून के तहत वक्फ संपत्तियों का दस्तावेजीकरण अनिवार्य किया जा रहा है, ताकि प्रबंधन में पारदर्शिता आए। उत्तर प्रदेश में सभी वक्फ संपत्तियों को उम्मीद पोर्टल पर दर्ज करने का काम चल रहा है, जिसका मकसद अवैध कब्जों पर लगाम लगाना और संपत्तियों का सही उपयोग सुनिश्चित करना है। इससे बोर्ड के पास हर संपत्ति का सटीक ब्योरा भी उपलब्ध हो सकेगा।
एक बड़ा बदलाव संपत्ति के सत्यापन को लेकर भी आया है। पुराने कानून में वक्फ बाय यूजर यानी लंबे समय से इस्तेमाल के आधार पर किसी संपत्ति को वक्फ मान लेने का प्रावधान था, भले ही उसके पास कोई औपचारिक कागजात हों या न हों। नए कानून में इस प्रावधान को खत्म कर दिया गया है। अब किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित करने के लिए वैध वक्फनामा यानी कानूनी दस्तावेज होना जरूरी होगा।
इसके अलावा वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसलों को अब अंतिम नहीं माना जाएगा। पहले जहां ट्रिब्यूनल का निर्णय ही आखिरी होता था, वहीं अब उसके खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में अपील की जा सकेगी। किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले अब सख्त राजस्व जांच की प्रक्रिया से भी गुजरना होगा। इन बदलावों का मकसद वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकना और बोर्ड के कामकाज में जवाबदेही बढ़ाना बताया जा रहा है।
कानून बनने से लेकर अब तक का सफर
वक्फ (संशोधन) अधिनियम-2025 को 2025 के बजट सत्र में संसद में पेश किया गया था, जिसका देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध भी हुआ। अप्रैल 2025 में यह विधेयक दोनों सदनों से पारित हो गया। लोकसभा में 288 और राज्यसभा में 232 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया था। 5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने इस पर अपनी मुहर लगा दी। इसके बाद कानून का विरोध कर रहे पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। पांच याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सितंबर 2025 में कानून के कुछ प्रावधानों पर रोक लगा दी थी।
इन बिन्दुओं पर लगी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि, किसी भी वक्फ बोर्ड में तीन से ज्यादा गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं हो सकते, हालांकि, वक्फ बाय यूजर के मुद्दे पर कोई फैसला नहीं दिया गया। मूल कानून में यह शर्त थी कि, केवल वही व्यक्ति वक्फ बोर्ड का सदस्य बन सकता है जो कम से कम पांच साल से इस्लाम धर्म का पालन कर रहा हो, कोर्ट ने इस शर्त पर भी रोक लगा दी और कहा कि जब तक राज्य सरकारें इस बारे में उचित नियम नहीं बनातीं, तब तक यह शर्त लागू नहीं होगी।
गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या को लेकर भी कोर्ट ने स्पष्टता दी। बोर्ड में तीन से ज्यादा और केंद्रीय वक्फ परिषद में चार से ज्यादा गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं हो सकते। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि, यदि संभव हो तो बोर्ड का सीईओ किसी मुस्लिम सदस्य को ही बनाया जाए। एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव में कोर्ट ने जिला कलेक्टर को यह अधिकार देने से इनकार किया कि, वह तय करे कि वक्फ बोर्ड द्वारा अतिक्रमित कोई संपत्ति सरकारी है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि, नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े फैसले लेने की इजाजत कलेक्टर को नहीं दी जा सकती।
पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी जताई आपत्ति
उत्तर प्रदेश के सुन्नी वक्फ बोर्ड का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका है, इसलिए नए बोर्ड का गठन नए संशोधित कानून के तहत ही तय माना जा रहा है। हालांकि, विपक्षी दल इसे मुस्लिम समुदाय के अधिकारों में हस्तक्षेप बताते हुए इसका विरोध कर रहे हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इन बदलावों पर आपत्ति जताई है।
क्या है वक्फ बोर्ड
‘वक्फ’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है किसी संपत्ति को धार्मिक या सामाजिक भलाई के लिए ट्रस्ट के रूप में समर्पित कर देना। एक बार संपत्ति वक्फ हो जाने के बाद उसे न तो खरीदा-बेचा जा सकता है और न ही किसी को दान या उपहार में दिया जा सकता है। मुस्लिम समुदाय के लोग अक्सर अपनी संपत्तियां स्कूल, मस्जिद, मदरसा, क्लिनिक या कब्रिस्तान जैसे धार्मिक और सार्वजनिक उपयोग के लिए वक्फ करते हैं। इन संपत्तियों के रखरखाव और प्रबंधन की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड की होती है।
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