भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम डील: दशकों के इंतजार के बाद मिली सफलता

 नई दिल्ली। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति का सिलसिला दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूती देने वाला है। दुनिया में सबसे ज्यादा यूरेनियम भंडार रखने वाला ऑस्ट्रेलिया दशकों तक भारत को यह खनिज देने से इंकार करता रह, लेकिन 2014 में हुए एक समझौते ने इस दिशा में नया रास्ता खोल दिया।

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उल्लेखनीय है कि, दुनिया भर में मौजूद यूरेनियम के कुल ज्ञात और आसानी से निकाले जा सकने वाले भंडार का लगभग 28 से 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले ऑस्ट्रेलिया के पास है, जो इसे किसी भी अन्य देश से आगे रखता है। साउथ ऑस्ट्रेलिया का ओलंपिक डैम, नॉर्दर्न टेरिटरी के रेंजर और जाबिलुका क्षेत्र, तथा वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की खदानें इस भंडार के मुख्य केंद्र हैं। अनुमान है कि, कुल भंडार करीब 16.7 लाख टन के आसपास है।

आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद

गुणवत्ता के लिहाज से भी ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम खास माना जाता है। यहां का अयस्क अक्सर उच्च श्रेणी का होता है, जिससे इसे निकालना आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद रहता है और इसमें अशुद्धियां भी कम होती हैं, जो परमाणु ईंधन बनाने के लिए अनुकूल है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया की स्थिर राजनीतिक व्यवस्था, मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा और अंतरराष्ट्रीय अप्रसार नीतियों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता उसे एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता बनाती हैं।

India-Australia Uranium Deal

ऐसे कई अन्य यूरेनियम उत्पादक देशों में राजनीतिक अस्थिरता या सुरक्षा संबंधी जोखिम पाए जाते हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया इस मामले में अपवाद है। रासायनिक रूप से देखें तो यह सामान्य प्राकृतिक यूरेनियम ही है, जिसमें ज्यादातर U-238 और कुछ मात्रा में U-235 होता है, यानी कोई विशेष परमाणविक गुण नहीं, बल्कि इसकी उपलब्धता और भरोसेमंदी ही इसे अलग बनाती है।

भारत को यूरेनियम की जरूरत क्यों

भारत के अपने घरेलू यूरेनियम भंडार सीमित हैं और उनमें से अधिकांश निम्न श्रेणी के हैं। घरेलू उत्पादन सालाना करीब 400 से 500 टन के आसपास ही सिमटा है, जबकि देश की जरूरत इससे कहीं अधिक, हजारों टन में है। भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, विशेष रूप से प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR), स्थिर और निरंतर यूरेनियम आपूर्ति पर निर्भर करता है। भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 22 गीगावॉट या उससे अधिक करने का लक्ष्य रखा है। इस विस्तार को घरेलू उत्पादन अकेले पूरा नहीं कर सकता।

ऐसे में ऑस्ट्रेलिया से आयात भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हो जाता है। रूस या कजाकिस्तान जैसे सीमित स्रोतों पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया एक बड़ा और भरोसेमंद विकल्प उपलब्ध कराता है। 2008 में हुए भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर समझौते और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) से मिली छूट के बाद भारत ने कई देशों के साथ इस दिशा में करार किए और ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम अब IAEA की निगरानी वाले रिएक्टरों को ईंधन देने के काम आ रहा है।

परमाणु उर्जा की भूमिका अहम

आर्थिक नजरिए से भी सस्ता और भरोसेमंद ईंधन बिजली उत्पादन की लागत घटाता है और भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने में सहायक बनता है। रणनीतिक स्तर पर यह साझेदारी क्वाड समूह के भीतर भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को भी मजबूती देती है। हालांकि भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम अंततः थोरियम आधारित आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ने का लक्ष्य रखता है, फिर भी शुरुआती चरणों में यूरेनियम की जरूरत बनी रहेगी।

India-Australia Uranium Deal

बढ़ते वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा एजेंडे में परमाणु ऊर्जा की भूमिका लगातार अहम होती जा रही है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने में ऑस्ट्रेलिया एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है, खासकर भारत जैसे देश के लिए जो बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा विस्तार की योजना बना रहा है।

दशकों के इनकार से समझौते तक का सफर

यह साझेदारी रातों-रात नहीं बनी। 1974 में हुए पोखरण-1 परमाणु परीक्षण के बाद ऑस्ट्रेलिया समेत कई पश्चिमी देश भारत को लेकर सतर्क हो गए थे। 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने एक सख्त नीति अपनाई, जिसके तहत केवल उन्हीं देशों को यूरेनियम बेचा जाना था जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए हों। भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उसकी नजर में यह संधि भेदभावपूर्ण थी।

1998 के बाद सख्त हुई स्थिति

1998 के पोखरण-2 परीक्षणों के बाद स्थिति और सख्त हो गई। 2007 में जॉन हॉवर्ड सरकार ने भारत को यूरेनियम बेचने की अनुमति देने का फैसला लिया था, लेकिन इसके बाद सत्ता में आई लेबर पार्टी सरकार ने 2007-2010 के दौरान इस फैसले को पलट दिया और फिर वही शर्त दोहराई कि बिना NPT हस्ताक्षर के कोई आपूर्ति नहीं होगी।

असली मोड़ 2008 में आया, जब भारत और अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर समझौता हुआ और NSG से छूट मिली। इसके तहत भारत ने अपने सिविल और सैन्य परमाणु कार्यक्रमों को अलग किया और सिविल सुविधाओं को IAEA की सुरक्षा निगरानी के दायरे में लाया।

 IAEA निगरानी के तहत होगी निगरानी

इसी आधार पर 2014 में तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबॉट की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया, भारत को यूरेनियम बेचने वाला पहला ऐसा देश बना जिसने NPT पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद यह कदम उठाया। 2015 में माल्कम टर्नबुल के कार्यकाल में इस समझौते को व्यावहारिक रूप से लागू किया गया।

इस बदलाव के पीछे कई कारण थे, भारत का मजबूत अप्रसार रिकॉर्ड, चीन के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले क्वाड जैसी रणनीतिक साझेदारियों की जरूरत और ऑस्ट्रेलिया का अपना निर्यात बढ़ाने का हित। आज यह आपूर्ति सख्त IAEA निगरानी के तहत होती है, और इसके सैन्य इस्तेमाल की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है।

संबंधों को देगा नई ऊंचाई

यह समझौता केवल ईंधन आपूर्ति भर का मामला नहीं, बल्कि भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को नई ऊंचाई देने वाला कदम है। दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता को लेकर साझा हित रखते हैं। अनुमान है कि, ऑस्ट्रेलिया के पास 2040 से 2047 तक भारत की बढ़ती परमाणु ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की पर्याप्त क्षमता मौजूद है। इससे न सिर्फ भारत में बिजली सस्ती और स्वच्छ बनेगी, बल्कि दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग भी आगे बढ़ेगा।

 

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