
भारत में ओरल कैंसर उन बीमारियों में शामिल है जो सबसे तेजी से फैलती है। इसकी सबसे बड़ी वजह तंबाकू और सुपारी है। अब तक इस बीमारी का इलाज सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसी पारंपरिक विधियों से किया जाता है, लेकिन इन तरीकों की एक बड़ी सीमा यह रही है कि इनसे कैंसर सेल्स के साथ-साथ आसपास की स्वस्थ कोशिकाएं भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिसके चलते मरीजों को कई तरह के दुष्प्रभावों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में अब एक नई वैज्ञानिक खोज ने इलाज की दिशा में उम्मीद की नई किरण जगाई है।
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कोशिकाओं को बनाया जाता है निशाना
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के शोधकर्ताओं ने अपनी ताजा स्टडी में एक ऐसा हाल निकाला है जो सुकून देने वाला है। शोध में बताया गया है कि, कम आवृत्ति (लो-फ्रीक्वेंसी) वाले अल्ट्रासाउंड की मदद से ओरल कैंसर की कोशिकाओं को सटीक तरीके से निशाना बनाया जा सकता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि, इसका असर आसपास मौजूद स्वस्थ कोशिकाओं पर बेहद सीमित रहता है, जो मौजूदा इलाज के तरीकों से बिल्कुल अलग है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि, अगर आगे के शोध में भी इसी तरह के सकारात्मक नतीजे मिलते रहे, तो भविष्य में यह तकनीक ओरल कैंसर के इलाज का एक सुरक्षित और कम नुकसानदायक विकल्प बनकर उभर सकती है।
वैज्ञानिकों ने बनाई अहम रणनीति
इस शोध को और विश्वसनीय बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अहम रणनीति अपनाई। उन्होंने इस अध्ययन के दौरान एमएस रामैया मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के डॉक्टरों के साथ मिलकर काम किया और प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार की गई कैंसर कोशिकाओं के बजाय सीधे मरीजों से लिए गए ओरल ट्यूमर के नमूनों पर परीक्षण किया।
यह तरीका इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि असली मरीजों के सैंपल का इस्तेमाल करने से शोधकर्ताओं को वास्तविक जैविक परिस्थितियों के ज्यादा सटीक और भरोसेमंद परिणाम हासिल हुए, जो प्रयोगशाला में विकसित सेल लाइनों से मिलने वाले नतीजों की तुलना में अधिक प्रासंगिक हैं।
अध्ययन में पता चला है कि, ओरल कैंसर की कोशिकाएं अल्ट्रासाउंड से उत्पन्न होने वाले हल्के मैकेनिकल दबाव को झेलने में सक्षम नहीं होतीं। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसकी एक अहम वजह ट्रोपोमायोसिन 2.1 नामक प्रोटीन की कमी हो सकती है। सामान्य स्वस्थ कोशिकाओं में यह प्रोटीन उन्हें बाहरी दबाव को महसूस करने और उससे खुद को बचाने में मदद करता है, लेकिन कैंसर कोशिकाओं में इस प्रोटीन का स्तर काफी कम पाया गया। यही कारण है कि, जब इन कोशिकाओं पर अल्ट्रासाउंड का प्रभाव डाला गया, तो वे तेजी से नष्ट होने लगीं, जबकि स्वस्थ कोशिकाओं पर इसका असर नाममात्र का ही रहा।
मजबूत हुआ वैज्ञानिकों का भरोसा
शोध में यह भी सामने आया कि, अल्ट्रासाउंड की यह तकनीक सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके शरीर में फैलने की क्षमता को भी काफी हद तक कमजोर कर देती है।
इसके अलावा, यह तकनीक ट्यूमर के चारों तरफ बनी उस सुरक्षात्मक परत को भी ढीला करने में सक्षम पाई गई, जो अक्सर दवाओं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं को कैंसर तक पहुंचने से रोकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर यह परत कमजोर हो जाए, तो इससे मौजूदा दवाओं की असरदार क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है, जिससे इलाज का समग्र नतीजा बेहतर हो सकता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि, अल्ट्रासाउंड तकनीक पहले से ही चिकित्सा क्षेत्र में एक सुरक्षित और नॉन-इनवेसिव (गैर-आक्रामक) तरीके के रूप में इस्तेमाल होती रही है, जिससे इसे लेकर वैज्ञानिकों का भरोसा पहले से मजबूत है। ऐसे में अगर आने वाले समय में इस तकनीक के प्रीक्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षणों में भी सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं, तो इसका दायरा सिर्फ ओरल कैंसर तक सीमित नहीं रहेगा। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह तकनीक भविष्य में ब्रेस्ट कैंसर और स्किन कैंसर जैसी अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज में भी नई संभावनाएं खोल सकती है।
सुपारी-तंबाकू के सेवन से बढ़ रहे मामले
हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि, फिलहाल यह शोध अपने शुरुआती चरण में ही है। इसे नियमित इलाज पद्धति के रूप में अपनाए जाने से पहले कई और गहन परीक्षणों की आवश्यकता होगी, जिनमें बड़े स्तर पर प्रीक्लिनिकल अध्ययन और उसके बाद मानव परीक्षण शामिल हैं।
इसके बावजूद, इस स्टडी को ओरल कैंसर के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां तंबाकू और सुपारी के सेवन के चलते इस बीमारी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अगर आने वाले वर्षों में यह तकनीक क्लिनिकल स्तर पर सफल साबित होती है, तो यह लाखों मरीजों के लिए कम दुष्प्रभाव वाला और अधिक सुरक्षित इलाज विकल्प साबित हो सकती है।
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