
‘Satluj’ Review: फिल्म एक्टर से डायरेक्टर बने राम गोपाल वर्मा एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार कोई विवाद या बयानबाजी नहीं है बल्कि एक ऐसी फिल्म की है जिसे लेकर उन्होंने खुलकर अपनी बात रखी है। दिलजीत दोसांझ स्टारर फिल्म ‘सतलुज’, जिसे पहले ‘पंजाब ’95’ के नाम से जाना जाता था, इन दिनों चर्चा में हैं और अब इस चर्चा में राम गोपाल वर्मा भी शामिल हो गए हैं। उन्होंने न सिर्फ फिल्म की जमकर तारीफ की है, बल्कि अधिकारियों से एक भावुक अपील भी की है।
उनका कहना है कि इस फिल्म को दबाया न जाए। दरअसल, हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी ‘सतलुज’ 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज हुई थी।
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जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर है फिल्म
यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने पंजाब में हुए कथित फर्जी एनकाउंटर्स के मामलों को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि, रिलीज के महज दो दिन के भीतर ही इस फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया, जिसके बाद से ही यह मामला विवादों में घिर गया। फिल्म को हटाए जाने के पीछे की वजह को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, लेकिन इंडस्ट्री और दर्शकों के बीच इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

इसी विवाद के बीच राम गोपाल वर्मा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबी-चौड़ी पोस्ट शेयर की, जिसमें उन्होंने फिल्म को देखने के अपने अनुभव को विस्तार से बयां किया। उन्होंने लिखा कि फिल्म देखने के बाद वे यह समझ पाए कि ‘सतलुज’ महज एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा गहरा घाव है जो शायद कभी नहीं भर पाएगा। उनके शब्दों में, यह फिल्म देश के इतिहास के सबसे स्याह अध्यायों में से एक की कड़वी सच्चाई को बेपर्दा करती है।
अर्जुन रामपाल की तारीफ़
राम गोपाल वर्मा ने खासतौर पर इस बात पर जोर दिया कि, किस तरह इस फिल्म में सिनेमा का इस्तेमाल एक टकराव के औजार के रूप में किया गया है। उन्होंने दिलजीत दोसांझ के अभिनय की भी सराहना की और कहा कि, उन्होंने इस किरदार को बिना किसी दिखावटी हीरोगिरी के, एक शांत मगर गहरे गुस्से के साथ निभाया है, जहां उनके पास लड़ने के लिए सिर्फ एक बही-खाता और अपनी अंतरात्मा ही असली हथियार हैं। इसके साथ ही उन्होंने अर्जुन रामपाल के किरदार की भी तारीफ की और कहा कि, उनके अभिनय ने संस्थागत मिलीभगत की उस नैतिक गिरावट को और गहराई दी है, जो देखने में बेहद डरावने स्तर तक वास्तविक महसूस होती है।
अपनी पोस्ट में आगे राम गोपाल वर्मा ने निर्देशक हनी त्रेहान के काम की विशेष रूप से सराहना करते हुए लिखा कि, उन्होंने इस भयावह कहानी को सनसनीखेज बनाने के आसान रास्ते को छोड़कर, इसे सरकारी दस्तावेजों, अंतिम संस्कार से जुड़े रिकॉर्ड और गुप्त बातचीत के जरिए एक धीमी गति वाली जांच-पड़ताल पर आधारित थ्रिलर की तरह पेश करने का साहसिक फैसला लिया। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि यही संयम इस कहानी की क्रूरता को और भी असरदार बना देता है, क्योंकि यह सच्चाई की ताकत के दम पर सामने आती है, न कि किसी सनसनी फैलाने की मंशा से।
ओटीटी से हटाई गई फिल्म
राम गोपाल वर्मा के मुताबिक, फिल्म का सबसे गहरा दार्शनिक पहलू यही है कि, यह दिखाती है कि, किस तरह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपने ही नागरिकों को निगल जाती है और फिर उसके सबूत मिटाने में जुट जाती है। उन्होंने कहा कि, यह सब कुछ बिना किसी उपदेशात्मक अंदाज के दिखाया गया है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने पर हुए विवाद पर बात करते हुए राम गोपाल वर्मा ने एक दिलचस्प नजरिया पेश किया। उनका मानना है कि ‘सतलुज’ की स्क्रीनिंग और रिलीज को लेकर उठे तमाम मुद्दों ने असल में इस फिल्म की अहमियत को और बढ़ा दिया है। उन्होंने लिखा कि कोई भी कला जो सत्ता में बैठे ताकतवर लोगों को असहज महसूस कराती है, वह असल में अपना उद्देश्य पूरी तरह से पूरा कर चुकी होती है, और यही सच्ची कला का असली मकसद भी है, जिसे ‘सतलुज’ बखूबी दर्शाती है।
उन्होंने इसे बेहद साहसी और जरूरी फिल्म बताते हुए कहा कि यह फिल्म दर्शकों को झकझोरती है, उन्हें कुछ सिखाती है और लंबे समय तक उनके जेहन में बनी रहती है।
सिनेमाई परिदृश्य पर कसा तंज
राम गोपाल वर्मा ने मौजूदा सिनेमाई परिदृश्य पर भी तंज कसा और कहा कि जिस दौर में मेनस्ट्रीम सिनेमा दिखावे और महज मनोरंजन देने वाले पॉपकॉर्न सिनेमा की दौड़ में शामिल है, ऐसे समय में ‘सतलुज’ यह सख्त लेकिन जरूरी सच्चाई सामने लाती है कि जब सिनेमा ईमानदारी और सच्चाई का रास्ता अपनाता है तो वह क्या हासिल कर सकता है।
उन्होंने अपनी पोस्ट में यह भी कहा कि ‘सतलुज’ एक ऐसी फिल्म है जिसे देखा जाना चाहिए, बड़े पैमाने पर दिखाया जाना चाहिए और इस पर खुलकर चर्चा और बहस होनी चाहिए, न कि फिल्म में दिखाए गए पीड़ितों की तरह इसका भी ‘एनकाउंटर’ कर दिया जाना चाहिए।
3 जुलाई को जी5 पर हुई थी स्ट्रीम
अपनी पोस्ट के अंत में राम गोपाल वर्मा ने सत्ता में बैठे लोगों से एक भावुक अपील की। उन्होंने लिखा कि, वे चाहते हैं कि सत्ता में बैठे लोग ‘सतलुज’ के साथ वैसा व्यवहार न करें जैसा वास्तविक जीवन में जसवंत सिंह खालरा के साथ किया गया था। उन्होंने आयन रैंड का हवाला देते हुए यह भी जोड़ा कि जब कोई सच्चाई को दबाने या छिपाने की कोशिश करता है, तो वह सच्चाई और भी ज्यादा गहराई से चोट पहुंचाती है।

गौरतलब है कि हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित यह फिल्म करीब चार साल की लंबी देरी के बाद 3 जुलाई को जी5 पर स्ट्रीम होने के लिए पहुंची थी। इससे पहले इस फिल्म को सेंसर बोर्ड से जुड़े सर्टिफिकेशन के मामलों में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, जिसकी वजह से यह सिनेमाघरों तक अपना रास्ता नहीं बना सकी। आखिरकार यह फिल्म ओटीटी के जरिए दर्शकों तक पहुंची जरूर, लेकिन रिलीज के महज दो दिन बाद ही इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया, जिसके बाद से यह मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है।
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