
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण और राहत भरा फैसला लिया है। सरकार ने कुछ महीने पहले प्राकृतिक गैस की सप्लाई पर लगाए गए आपातकालीन नियंत्रण प्रावधानों को अब पूरी तरह वापस ले लिया है। इस फैसले से गैस क्षेत्र से जुड़े उद्योगों, वितरकों और आम उपभोक्ताओं को यह संकेत मिलता है कि, देश में ईंधन आपूर्ति की स्थिति अब पहले से कहीं अधिक स्थिर और सामान्य हो चुकी है।
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मार्च में लागू हुए थे सख्त नियम
गौरतलब है कि, इसी वर्ष मार्च महीने में सरकार ने प्राकृतिक गैस की सप्लाई और आवंटन को लेकर कुछ विशेष और सख्त प्रावधान लागू किए थे। इन नियमों के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार मिला हुआ था कि वह जरूरत पड़ने पर सीधे तौर पर यह तय कर सके कि देश के किस औद्योगिक या सामाजिक क्षेत्र को कितनी मात्रा में प्राकृतिक गैस उपलब्ध कराई जाएगी। यानी सामान्य बाजार व्यवस्था की बजाय सरकार खुद गैस के बंटवारे और वितरण की निगरानी कर रही थी।

इन नियंत्रणों को लागू करने के पीछे सरकार की मुख्य चिंता यह थी कि, अगर वैश्विक स्तर पर किसी वजह से गैस की उपलब्धता में कमी आती है, तो इसका सबसे कम असर देश के महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों पर पड़े। इसी सोच के तहत उर्वरक उद्योग, घरों और वाहनों में इस्तेमाल होने वाली सीएनजी-पीएनजी सेवाएं, बिजली उत्पादन संयंत्र और अन्य जरूरी सेवाओं को प्राथमिकता सूची में रखा गया था। सरकार का मकसद साफ था कि ,गैस संकट की स्थिति में भी आम जनता की रोजमर्रा की जरूरतें और देश की आवश्यक सेवाएं प्रभावित न हों।
बड़े संकट की आशंका अभी टली नहीं है
सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि, वर्तमान समय में प्राकृतिक गैस की उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था पिछले कुछ महीनों की तुलना में काफी बेहतर हो चुकी है। घरेलू स्तर पर गैस का उत्पादन सुचारू रूप से चल रहा है, विदेशों से होने वाला आयात भी सामान्य गति से जारी है और वितरण प्रणाली में किसी तरह की बड़ी बाधा या रुकावट देखने को नहीं मिल रही है।
सरकार का मानना है कि, निकट भविष्य में किसी बड़े संकट की आशंका फिलहाल नहीं दिख रही है। जब हालात इतने स्थिर हो चुके हैं, तो अतिरिक्त और सख्त नियंत्रण बनाए रखने का कोई खास औचित्य नहीं रह जाता। यही वजह है कि, सरकार ने मार्च में लागू किए गए विशेष आपातकालीन प्रावधानों को अब समाप्त करने का निर्णय लिया है।
उत्पन्न हुई थी गंभीर स्थिति
इसका सीधा मतलब यह है कि, अब प्राकृतिक गैस के आवंटन और वितरण का काम पहले की तरह सामान्य और नियमित प्रक्रिया के अनुसार होगा। सरकार अब सीधे तौर पर यह तय नहीं करेगी कि, किस क्षेत्र को कितनी गैस मिलनी चाहिए, बल्कि यह काम मौजूदा बाजार तंत्र और मानक नियमों के जरिए संचालित होगा। इससे गैस उद्योग से जुड़ी कंपनियों और वितरकों को कामकाज में अधिक स्वतंत्रता और लचीलापन मिलेगा।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें कुछ महीने पीछे जाना होगा। दरअसल अमेरिका और ईरान के बीच हुए सैन्य टकराव के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर स्थिति पैदा हो गई थी। इस टकराव का असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ा, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी जलमार्ग के जरिए वैश्विक बाजारों तक पहुंचाई जाती है।
ईरान-यूएस में हुआ अस्थायी समझौता
जब यह जलमार्ग प्रभावित हुआ, तो इसका सीधा असर दुनियाभर में पेट्रोलियम पदार्थों और गैस की आपूर्ति पर पड़ा। कई देशों में ईंधन की कमी की आशंका बढ़ गई और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह स्थिति चिंताजनक थी, क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी रसोई गैस, सीएनजी और बिजली उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस पर निर्भर है।
इसी वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए भारत सरकार ने एहतियात के तौर पर घरेलू स्तर पर गैस आपूर्ति पर सख्त निगरानी और नियंत्रण लागू करने का फैसला किया था, ताकि अगर स्थिति और बिगड़ती है तो देश के भीतर आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर गैस की सप्लाई सुनिश्चित की जा सके।

राहत की बात यह है कि, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब पहले जैसा नहीं रहा। दोनों देशों के बीच 60 दिनों के लिए एक अस्थायी समझौता हुआ है, जिसके तहत फिलहाल सैन्य गतिविधियों में कमी आई है। इस अस्थायी समझौते के बाद अब दोनों पक्षों के बीच स्थायी और अंतिम समाधान को लेकर बातचीत चल रही है।
फ़िलहाल कम हुआ है तनाव
हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि दोनों देश किस दिशा में और कितने समय में किसी अंतिम सहमति पर पहुंच पाएंगे, लेकिन फिलहाल तनाव में आई कमी का सकारात्मक असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर देखने को मिल रहा है, जिसकी वजह से गैस और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति सामान्य होती जा रही है। यही स्थिरता भारत सरकार को अपने आपातकालीन गैस नियंत्रण प्रावधान वापस लेने का भरोसा दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि, इस फैसले से गैस क्षेत्र में कारोबारी माहौल बेहतर होगा और वितरण व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप कम होने से बाजार अधिक स्वाभाविक ढंग से काम कर सकेगा। हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि, अगर भविष्य में हालात दोबारा बिगड़ते हैं और गैस आपूर्ति पर वैश्विक स्तर पर असर पड़ता है, तो जरूरत पड़ने पर सरकार दोबारा उचित कदम उठाने पर विचार कर सकती है।
फिलहाल के लिए यह फैसला आम उपभोक्ताओं और उद्योगों दोनों के लिए राहत भरी खबर है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि देश में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर स्थिति नियंत्रण में है और निकट भविष्य में किसी बड़े संकट की आशंका फिलहाल नहीं है।
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