ट्रंप का ऐलान: खाड़ी देशों को सौंपी जाएंगी ईरान की जब्त संपत्तियां

वॉशिंगटन। ट्रंप प्रशासन ईरान की जब्त संपत्तियों को खाड़ी सहयोगी देशों को सौंपने पर विचार कर रहा है। वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रस्ताव पर गंभीर विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। इस प्रस्ताव के तहत ईरान की जब्त की गई संपत्तियों को खाड़ी क्षेत्र के अमेरिकी सहयोगी देशों को हस्तांतरित किया जा सकता है। इन देशों को ईरान के हालिया हमलों से हुए नुकसान की भरपाई के लिए इस धन का उपयोग करने की अनुमति दी जाएगी। यह कदम क्षेत्रीय सुरक्षा, कूटनीति और आर्थिक मुआवजे के बीच जटिल संतुलन को दर्शाता है।

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खाड़ी देशों के नुकसान की होगी भरपाई

ईरान ने हाल ही में अमेरिका-इजरायल गठबंधन के हमलों के जवाब में खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए थे। इन हमलों में संपत्ति का भारी नुकसान हुआ है तथा सैन्य बुनियादी ढांचे को क्षति पहुंची है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग इस पूरे मामले को सक्रिय रूप से देख रहा है। विभाग का मानना है कि, ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों का उपयोग न केवल भविष्य में संभावित हमलों के बाद पुनर्निर्माण और मरम्मत के लिए किया जा सकता है, बल्कि पहले से हुए नुकसान की भरपाई के लिए भी इसका फायदा उठाया जा सकता है।

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ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने अपने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि, वे खाड़ी देशों में ईरानी हमलों से जुड़े नुकसान का विस्तृत आकलन करें। साथ ही यह भी जांचा जाए कि, इन खर्चों को पूरा करने के लिए ईरान की जब्त संपत्तियों का इस्तेमाल कानूनी और व्यावहारिक रूप से संभव है या नहीं।

तेहरान ने स्पष्ट किया रुख

एक रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि, ईरान की किन-किन संपत्तियों पर विशेष रूप से विचार किया जा रहा है। हालांकि, संकेत दिए गए हैं कि, प्रस्ताव केवल पहले से फ्रीज किए गए एसेट्स तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें अन्य ईरानी संपत्तियों को भी शामिल किया जा सकता है।

यह प्रस्ताव अमेरिका-ईरान संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर सकता है। ईरान ने अपनी जब्त संपत्तियों को किसी भी समझौते में अहम मुद्दा बताया है। तेहरान का रुख साफ है कि, यदि उसकी संपत्तियां वापस नहीं की जातीं, तो कोई स्थायी समझौता संभव नहीं होगा। ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के करीबी सलाहकार मोहसिन रेजाई ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि, अमेरिका द्वारा ईरानी संपत्तियों को रिलीज न किए जाने पर कोई डील नहीं होगी।

ईरान दे रहा चेतावनी

कुवैत और बहरीन पर ईरान के हालिया हमलों के ठीक बाद यह प्रस्ताव सामने आया है। इससे पहले से ही नाजुक राजनयिक प्रयासों में नया तनाव पैदा हो गया है। ईरान बार-बार चेतावनी दे चुका है कि, यदि उसके खिलाफ किसी भी हमले के लिए खाड़ी देशों की जमीन का इस्तेमाल किया गया, तो वह इन देशों पर भी जवाबी कार्रवाई करेगा। इस पृष्ठभूमि में अमेरिका का यह कदम खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों के लिए सुरक्षा गारंटी की तरह देखा जा रहा है, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नई चुनौतियां भी खड़ी कर रहा है।

ईरान और अमेरिका के बीच चल रही किसी भी संभावित समझौते की बातचीत में तेहरान की लगभग 24 अरब डॉलर की जब्त संपत्ति हमेशा प्रमुख मुद्दा रही है। ये संपत्तियां मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली और अमेरिकी वित्तीय संस्थानों में फ्रीज की गई हैं। ईरान इन्हें अपने आर्थिक पुनरुत्थान और तेल निर्यात से जुड़े लेन-देन के लिए आवश्यक मानता है।

 मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा पाकिस्तान

वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशों में पाकिस्तान सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी शनिवार को तेहरान पहुंचे। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे पाकिस्तानी नेतृत्व की ओर से ईरान के सर्वोच्च नेता के लिए महत्वपूर्ण संदेश लेकर आए हैं। पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाली और मतभेदों को कम करने का प्रयास कर रहा है।

पाकिस्तान की यह मध्यस्थता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह भौगोलिक रूप से दोनों देशों से जुड़ा हुआ है और क्षेत्रीय सुरक्षा में उसकी अपनी रुचि है। हालांकि, युद्धविराम के बावजूद होर्मुज की खाड़ी में तनाव कम नहीं हुआ है। दोनों पक्षों के बीच सैन्य टकराव जारी है। हाल के दिनों में होर्मुज क्षेत्र के आसपास लगातार हमले और जवाबी हमले देखने को मिले हैं, जिससे युद्धविराम को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

 दशकों से खराब हैं अमेरिका ईरान के संबंध

अमेरिका और ईरान के बीच संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं।  1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध लगभग समाप्त हो गए। ट्रंप प्रशासन के पहले कार्यकाल में भी मैक्सिमम प्रेशर नीति के तहत ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे, जिससे ईरानी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। अब दूसरे कार्यकाल में भी इसी नीति की निरंतरता दिखाई दे रही है, लेकिन इस बार फोकस जब्त संपत्तियों के उपयोग पर है।

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यह प्रस्ताव कई आयामों में जटिल है। कानूनी रूप से, जब्त संपत्तियों का उपयोग मुआवजे के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून और अमेरिकी घरेलू कानून के अंतर्गत कैसे किया जाएगा, यह एक बड़ा सवाल है। राजनयिक रूप से, यह ईरान को और अधिक आक्रामक बना सकता है। आर्थिक रूप से, खाड़ी देशों को मुआवजा मिलने से उनका विश्वास अमेरिका पर बढ़ेगा, लेकिन ईरान की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

विश्लेषकों का मानना है कि, यदि यह प्लान लागू होता है, तो क्षेत्र में तनाव का नया चक्र शुरू हो सकता है। ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि वह अपनी संपत्तियों की वापसी के बिना किसी समझौते पर सहमत नहीं होगा। दूसरी ओर, अमेरिका अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा और नुकसान भरपाई को प्राथमिकता दे रहा है।

अब द्विपक्षीय नहीं रह गया है ईरान अमेरिका विवाद

ट्रेजरी विभाग का आकलन पूरा होने के बाद ही प्रस्ताव की अंतिम रूपरेखा स्पष्ट होगी। यदि ईरान की अतिरिक्त संपत्तियों को भी शामिल किया जाता है, तो यह कदम और अधिक विवादास्पद साबित हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर बारीकी से नजर रखे हुए है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य मध्यस्थ देश भी शांति प्रयासों को तेज करने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान की मध्यस्थता के अलावा अन्य देश भी पर्दे के पीछे भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन होर्मुज की खाड़ी में जारी लड़ाई और सैन्य गतिविधियां दिखाती हैं कि स्थिति अत्यंत नाजुक है।

युद्धविराम को सही मायने में लागू करना और दीर्घकालिक समझौता हासिल करना दोनों पक्षों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस पूरे मामले से स्पष्ट है कि अमेरिका-ईरान विवाद अब केवल द्विपक्षीय नहीं रह गया है। इसमें खाड़ी देशों की सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा (क्योंकि होर्मुज से दुनिया का बड़ा तेल निर्यात होता है), और क्षेत्रीय स्थिरता के व्यापक आयाम जुड़ गए हैं। ट्रंप प्रशासन का यह प्रस्ताव आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का केंद्र बिंदु बन सकता है।

 

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