रूस में लैंड करते ही डोभाल ने कर दिया खेल, मास्को-तालिबान में हुई बड़ी डील, बुरा फंसा पाकिस्तान

मॉस्को। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी एक ही दिन की घटनाएं आने वाले कई सालों की भू-राजनीतिक समीकरण बदल देती हैं। ठीक वैसा ही गुरुवार 28 मई 2026 को हुआ, जब भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल रूस के मॉस्को में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा फोरम में आतंकवाद पर दोहरे मापदंड की कड़ी निंदा कर रहे थे, उसी समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस्लामाबाद में बैठकर तालिबान और भारत के खिलाफ तीखे आरोप लगा रहे थे, लेकिन असली खेल रूस और तालिबान के बीच हो रही सैन्य सहयोग की नई डील में छिपा था, जो पाकिस्तान के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर उभरी है। यह घटनाक्रम महज संयोग नहीं था।

इसे भी पढ़ें- एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए चीन जाएंगे प्रधानमंत्री मोदी : एनएसए डोभाल

आतंकवाद पर प्रहा

भारत की कूटनीति ने एक बार फिर दिखाया कि, चुपचाप काम करने वाले अजीत डोभाल जैसे अनुभवी खिलाड़ी किस तरह मल्टी-डाइमेंशनल चेस खेलते हैं। 120 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधियों वाले इस फोरम में डोभाल ने स्पष्ट संदेश दिया कि, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कोई दोहरा मापदंड बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

Shahbaz Sharif

उन्होंने कहा कि, जिम्मेदार देशों को फैसला करना होगा कि, वे आतंकवाद के प्रायोजकों का साथ देंगे या फिर उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करेंगे। डोभाल ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन पूरा संदेश पाकिस्तान को ही लक्षित था।

शहबाज शरीफ का तीखा हमला

उसी दिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की वर्षगांठ पर दिए गए संदेश में तालिबान पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि, तालिबान सरकार भारत के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है। शरीफ ने तालिबान को भारत के प्रॉक्सी की तरह पेश करने की कोशिश की और पाकिस्तान की सुरक्षा को चुनौती बताते हुए सख्त रुख अपनाया। यह बयान ऐसे समय में आया जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन पर तनाव चरम पर है।

पिछले कई महीनों से दोनों देशों के बीच झड़पें बढ़ी हैं और पाकिस्तानी एयर फोर्स ने अफगानिस्तान के अंदर कई बार हवाई हमले किए हैं। पाकिस्तान के लिए यह स्थिति बेहद असहज है। एक समय था जब पाकिस्तान तालिबान को अपना स्ट्रेटेजिक डेप्थ मानता था, लेकिन अब वही तालिबान पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन गया है। टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के हमले बढ़ गए हैं और सीमा पार से घुसपैठ की घटनाएं आम हो गई हैं। शहबाज शरीफ का बयान इन घरेलू और सीमा सुरक्षा चुनौतियों का प्रतिबिंब था, लेकिन यह ठीक उसी समय आया जब रूस में तालिबान के साथ सैन्य सहयोग की नई डील हो रही थी।

रूस-तालिबान सैन्य समझौता 

फोरम के दौरान रूस और तालिबान के बीच सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर मुहर लग गई। रूसी सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोईगु और तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब के बीच यह डील हुई। रूस जुलाई 2025 में तालिबान को मान्यता देने वाला पहला प्रमुख देश बन चुका है। अब रक्षा सहयोग को औपचारिक रूप देकर मॉस्को ने काबुल के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक तालिबान ने रूस से आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की मांग की है। अफगानिस्तान की सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान की सीमा पार हवाई कार्रवाइयां हैं। पाकिस्तानी एयरफोर्स के हमलों से तालिबान बौखलाया हुआ है। अगर रूस S-400, पैंटसिर जैसे एयर डिफेंस सिस्टम, रडार, प्रशिक्षण या पुराने लेकिन प्रभावी उपकरण उपलब्ध कराता है, तो अफगानिस्तान की रक्षा क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा। यह पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि अब तक अफगानिस्तान के पास आधुनिक एयर डिफेंस नहीं था, जिसका फायदा पाकिस्तान उठा रहा था।

विश्लेषकों का मानना है कि, यह डील प्रतीकात्मक से कहीं ज्यादा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रहा है और नए सहयोगी तलाश रहा है। तालिबान के साथ संबंध मजबूत करके मॉस्को मध्य एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। साथ ही, भारत जैसे देशों के साथ भी बैलेंस बनाए रखना चाहता है। अजीत डोभाल की मौजूदगी और उनके आतंकवाद विरोधी बयान ने इस पूरे घटनाक्रम को और गहराई दी।

तालिबान का हिंदू-सिख समुदाय को निमंत्रण

फोरम में तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने एक और महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने अफगानिस्तान के हिंदू और सिख समुदायों को देश लौटने का खुला निमंत्रण दिया। याकूब ने कहा कि, अफगानिस्तान उनका भी देश है और तालिबान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। यह बयान तालिबान की छवि सुधारने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। तालिबान खुद को अब केवल उग्रवादी संगठन नहीं बल्कि एक जिम्मेदार सरकार के रूप में पेश करना चाहता है, खासकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने।

हालांकि, अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर पिछले वर्षों में गंभीर सवाल उठे हैं। कई हिंदू और सिख परिवारों ने तालिबान शासन में उत्पीड़न के कारण देश छोड़ दिया था। अब यह निमंत्रण कितना व्यावहारिक है, यह समय बताएगा, लेकिन इसका प्रतीात्मक महत्व कम नहीं है।

पाकिस्तान फंस गया?

पाकिस्तान के लिए यह पूरा घटनाक्रम बहुआयामी चुनौती है। पहला, रूस जैसे देश का तालिबान के साथ सैन्य गठबंधन उसकी स्ट्रेटेजिक डेप्थ नीति को सीधा झटका दे रहा है। दूसरा, भारत के एनएसए का मंच से आतंकवाद पर सख्त रुख पाकिस्तान की छवि को और खराब कर रहा है। तीसरा, अगर अफगानिस्तान को एयर डिफेंस मिल गया तो पाकिस्तान की सीमा कार्रवाइयों पर अंकुश लग सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि, पाकिस्तान अब दो मोर्चों पर फंस गया है एक तरफ घरेलू आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता, दूसरी तरफ अफगानिस्तान के साथ बढ़ता तनाव। चीन भी इस स्थिति से चिंतित है क्योंकि सीपीईसी प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकते हैं। अमेरिका भी रूस-तालिबान मित्रता को लेकर सतर्क है।

भारत की कूटनीति का कमाल

अजीत डोभाल की इस यात्रा को भारत की सक्रिय और बहुआयामी कूटनीति का उदाहरण माना जा रहा है। भारत न तो तालिबान को पूरी तरह अलग-थलग कर रहा है और न ही उसकी बिना शर्त तारीफ कर रहा है। बल्कि आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी लाइन साफ रखते हुए रूस जैसे रणनीतिक साझेदार के साथ समन्वय बनाए रख रहा है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है। पुराने गठबंधन टूट रहे हैं और नए समीकरण बन रहे हैं।

mullah-yaqoob

पाकिस्तान के लिए यह चेतावनी है कि दोहरे खेल की नीति अब ज्यादा दिन नहीं चल सकती, जबकि भारत के लिए यह अवसर है कि क्षेत्रीय सुरक्षा में अपनी भूमिका और मजबूत करे। अगले कुछ महीनों में इस डील के व्यावहारिक परिणाम सामने आएंगे।

क्या रूस तालिबान को हथियार देगा?

क्या अफगानिस्तान की वायु रक्षा क्षमता बढ़ेगी? और पाकिस्तान इस नई चुनौती का सामना कैसे करेगा? ये सवाल आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेंगे। अभी के लिए एक बात साफ है अजीत डोभाल की मॉस्को यात्रा महज एक फोरम में भाग लेने तक सीमित नहीं थी। यह पाकिस्तान के लिए एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावी संदेश था, जिसे रूस और तालिबान की डील ने और तेज कर दिया।

 

इसे भी पढ़ें- अजीत डोभाल लगातार तीसरी बार बने राष्ट्रीय सलाहकार

Related Articles

Back to top button