पीएम मोदी की तेल-सोना न खरीदने की अपील पर उद्योगपतियों ने दी हालात खराब होने की चेतावनी

 नई दिल्ली। भारत की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  द्वारा हाल ही में देशवासियों से पेट्रोल-डीजल के संयमित उपयोग और एक साल तक सोना न खरीदने की अपील के बाद देश के नीति-निर्धारकों से लेकर कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों तक हलचल मची हुई है। जहां एक ओर सरकार यह भरोसा दिला रही है कि हमारे पास पर्याप्त तेल और गैस का स्टॉक मौजूद है, वहीं दूसरी ओर देश के सबसे प्रतिष्ठित बैंकरों और उद्योगपतियों ने आगाह किया है कि आने वाला समय बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इसे भी पढ़ें- पीएम मोदी की अपील, एक साल तक न खरीदें सोना, कम इस्तेमाल करें तेल, विपक्ष तमतमाया

विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रखने की कवायद

यह पूरा मामला केवल खपत कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहराते वैश्विक संकट और भारत की विदेशी मुद्रा को सुरक्षित रखने की एक बड़ी कवायद छिपी हुई है। इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने विदेशी मुद्रा की बचत के लिए नागरिकों से देशभक्ति दिखाने और सोने की खरीदारी पर लगाम लगाने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री के इस आह्वान के बाद मंगलवार को केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मोर्चा संभाला और उद्योग जगत को आश्वस्त करने का प्रयास किया।

gold_dollar

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के वार्षिक सम्मेलन में पुरी ने स्पष्ट किया कि सरकार ने अब तक के संकट को बहुत ही जिम्मेदारी के साथ प्रबंधित किया है। उन्होंने बताया कि, वर्तमान में भारत के पास कच्चे तेल और एलएनजी का 60 दिनों का और एलपीजी का 45 दिनों का रणनीतिक स्टॉक उपलब्ध है। पुरी का तर्क था कि, जब दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई, तब भी भारत ने घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दामों को स्थिर रखा, जो अपने आप में एक उपलब्धि है। उनके अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बावजूद एलपीजी का उत्पादन बढ़ा है और आपूर्ति श्रृंखला में कोई बाधा नहीं आने दी गई है।

आर्थिक गलियारें में चिंता

हालांकि, सरकारी आश्वासनों के बीच कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक उदय कोटक के बयान ने आर्थिक गलियारों में चिंता की लकीरें खींच दी हैं। कोटक ने सीआईआई के मंच से बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि भारत को बेहद खराब हालात के लिए मानसिक और रणनीतिक रूप से तैयार रहना चाहिए। उन्होंने साफ किया कि किसी भी बड़े झटके का इंतजार करने से बेहतर है कि हम बुरे वक्त की तैयारी पहले ही कर लें।

PM MODI

कोटक का मानना है कि, मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में जारी युद्ध का वास्तविक प्रभाव अब तक पूरी तरह से सामने नहीं आया है, विशेषकर तेल की कीमतों के मामले में। उनका तर्क है कि, जब कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आएगा, तो इसका प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव उन उपभोक्ताओं पर पड़ेगा जिनकी आय सीमित है। कोटक के अनुसार, ईंधन महंगा होने से उत्पादों की लागत बढ़ेगी और यह दबाव अंततः आम आदमी की जेब पर भारी पड़ेगा। उन्होंने साफ कहा कि जब तक ईरान और क्षेत्रीय संघर्षों का समाधान नहीं होता, तब तक हमें एक बड़े आर्थिक झटके के लिए तैयार रहना होगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं का भारत पर पड़ेगा असर

भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल ने भी स्वीकार किया कि, परिस्थितियां इस समय किसी के नियंत्रण में नहीं हैं। मित्तल ने कहा कि भारत भले ही 6-7 प्रतिशत की दर से शानदार विकास कर रहा है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा जबरदस्त दबाव भारत को अछूता नहीं छोड़ सकता। उन्होंने प्रधानमंत्री के संदेश को बेहद गहरा और सार्थक बताते हुए उद्योग जगत से अपील की कि वे रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ तेजी से बढ़ें और देश के भीतर ही पूंजीगत व्यय को बढ़ाएं। मित्तल के मुताबिक, यह पीछे हटने का नहीं बल्कि भारत में निवेश को दोगुना करने का समय है ताकि हम अपनी जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर न रहें।

सोने की खरीद पर बंटी राय

प्रधानमंत्री की सोने के प्रति अपील पर बाजार और विशेषज्ञों की राय थोड़ी बंटी हुई नजर आ रही है। पीएम मोदी ने सिकंदराबाद की जनसभा में ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा था कि, पहले संकट के समय लोग सोना दान करते थे, लेकिन आज केवल एक साल तक खरीदारी न करने का संकल्प ही काफी होगा। इस अपील का उद्देश्य भारत के बढ़ते व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे बोझ को कम करना है।

PM MODI

ऑल इंडिया जेम एंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल के चेयरमैन राजेश रोकड़े ने प्रधानमंत्री की राष्ट्रहित वाली सोच का समर्थन तो किया, लेकिन इसके व्यवहारिक पहलुओं पर चिंता भी जताई। रोकड़े का कहना है कि सोने का उद्योग देश की जीडीपी में सात प्रतिशत का योगदान देता है और एक करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। उन्होंने सुझाव दिया कि, यदि केवल निवेश के उद्देश्य से खरीदे जाने वाले सोने (जैसे सिक्के और ईंट) पर रोक लगे तो ठीक है, लेकिन आभूषणों की खरीद पूरी तरह बंद होने से बेरोजगारी का संकट खड़ा हो सकता है।

इसी क्रम में सेनको गोल्ड के एमडी सुवांकर सेन ने एक महत्वपूर्ण डेटा साझा करते हुए बताया कि, सोने के आयात बिल में वृद्धि का मुख्य कारण आभूषण नहीं, बल्कि निवेश के लिए बढ़ती मांग है। उन्होंने वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार को आयात पर प्रतिबंध लगाने के बजाय देश के भीतर मौजूद लगभग 20 हजार टन सोने को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने के तरीके खोजने चाहिए। यह सोना मंदिरों और घरों में निष्क्रिय पड़ा है। यदि इस डेड कैपिटल का उपयोग किया जा सके, तो भारत को विदेशों से सोना मंगाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

तैयार रहें बुरे समय के लिए 

कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री का बयान और उद्योगपतियों की प्रतिक्रियाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ विकास की तेज रफ्तार है, तो दूसरी तरफ वैश्विक युद्ध और अस्थिर कीमतों का खतरा। सरकार का प्रयास है कि जनता अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव कर विदेशी मुद्रा की बचत करे, ताकि भविष्य में आने वाले किसी भी बड़े आर्थिक तूफान का सामना मजबूती से किया जा सके। उदय कोटक और सुनील मित्तल जैसे दिग्गजों की चेतावनी इसी रणनीति का हिस्सा है कि हम सुखद भविष्य की कामना करें, लेकिन सबसे बुरे के लिए तैयार रहें।

 

इसे भी पढ़ें- बंगाल की कमान अब शुभेंदु के हाथ, कल पीएम मोदी की मौजूदगी में लेंगे शपथ

Related Articles

Back to top button