
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस जांच को लेकर लंबे समय से चली आ रही दिक्कतों और कड़े नियमों के जाल को अब योगी सरकार पूरी तरह खत्म करने जा रही है। प्रदेश के परिवहन विभाग ने आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस) की स्थापना के लिए बनाई गई अपनी पुरानी और जटिल मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में बड़े बदलाव का निर्णय लिया है। अब तक यूपी में एक जिले में अधिकतम तीन एटीएस खोलने का जो प्रतिबंध था, उसे केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के निर्देशों के अनुरूप हटाया जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब निजी निवेशक प्रदेश के किसी भी जिले में मांग और जरूरत के अनुसार कितने भी एटीएस केंद्र खोल सकेंगे।
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शासन को भेजा गया प्रस्ताव
परिवहन विभाग ने इस संबंध में विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया है, जिसे जल्द ही हरी झंडी मिलने की उम्मीद है। इस बदलाव से न केवल निजी निवेश बढ़ेगा, बल्कि वाहन स्वामियों को फिटनेस के लिए दूसरे जिलों की लंबी दौड़ से भी बड़ी राहत मिलेगी। उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग द्वारा पूर्व में तैयार की गई एसओपी वास्तव में केंद्रीय नियमों की अनदेखी कर बनाई गई थी, जिसकी वजह से पिछले तीन सालों से प्रदेश में फिटनेस केंद्रों का जाल नहीं बिछ सका था।

पुराने नियमों के तहत एक आवेदक पूरे राज्य में अधिकतम तीन एटीएस ही संचालित कर सकता था और एक जिले की सीमा के भीतर भी तीन से ज्यादा केंद्रों की अनुमति नहीं थी। विभाग की यह नियमावली केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम 1989 के नियम 175 की भावना के विपरीत थी, जहां केंद्रों की संख्या पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है।
इस विरोधाभास के कारण उत्तर प्रदेश के 25 जिलों में एटीएस निर्माण के लिए एक भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि निवेशकों के लिए शर्तें अव्यावहारिक थीं। अब जब केंद्र सरकार ने मैनुअल फिटनेस जांच को पूरी तरह बंद करने का दबाव बढ़ाया है, तब जाकर विभाग ने अपनी गलतियों को सुधारते हुए केंद्रीय नियमावली को अपनाने का फैसला किया है।
मैनुअल फिटनेस की मिली मोहलत
नियमों में इस आमूलचूल बदलाव की सबसे बड़ी वजह वह संकट रहा, जो इसी साल पांच जनवरी को केंद्रीय मंत्रालय के एक आदेश के बाद पैदा हुआ था। केंद्र ने निर्देश दिया था कि प्रदेश में वाहनों की मैनुअल फिटनेस जांच पूरी तरह बंद की जाए। उस समय पूरे प्रदेश में केवल 13 निजी एटीएस ही संचालित थे। परिणाम यह हुआ कि परिवहन विभाग को एक एटीएस केंद्र से लगभग 100 किलोमीटर तक के दायरे को जोड़ना पड़ा।
उदाहरण के तौर पर, लखनऊ के बख्शी का तालाब स्थित एकेआरएस एटीएस केंद्र पर न केवल लखनऊ के वाहनों का बोझ बढ़ा, बल्कि उन्नाव, रायबरेली, बाराबंकी, हरदोई और सीतापुर जैसे दूरदराज के जिलों के व्यावसायिक वाहनों को भी यहीं फिटनेस कराने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे वाहन स्वामियों का खर्च और समय दोनों बढ़ गए, जिसके बाद चौतरफा विरोध शुरू हुआ और सरकार को अपनी नीतियों पर दोबारा विचार करना पड़ा।
इस संकट को देखते हुए केंद्रीय मंत्रालय के सचिव यतेंद्र कुमार ने बीते 27 अप्रैल को राज्यों को कुछ शर्तों के साथ मैनुअल फिटनेस जांच जारी रखने की मोहलत दी। निर्देश दिए गए कि, जिन जिलों में एटीएस निर्माणाधीन हैं, वहां कार्य पूरा होने तक मैनुअल जांच की जा सकती है, जिसके लिए अंतिम समय सीमा 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ाई गई है। इसी राहत की अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग ने अपनी एसओपी का नए सिरे से तकनीकी परीक्षण कराया।
भ्रष्टाचार पर लगेगा अंकुश
इस परीक्षण में यह स्पष्ट हुआ कि यूपी ने 23 अगस्त 2023 को जो नियम लागू किए थे, वे केंद्र सरकार के मानकों से कहीं अधिक कठिन थे। केंद्र की नियमावली में न तो जिलों में केंद्रों की संख्या सीमित है और न ही भूमि की अनिवार्यता इतनी कड़ी है। यूपी में एटीएस के लिए न्यूनतम दो एकड़ भूमि की शर्त रखी गई थी, जबकि केंद्र सरकार इससे काफी कम क्षेत्रफल में भी एटीएस निर्माण की अनुमति दे रही है।

परिवहन विभाग के अपर परिवहन आयुक्त (प्रवर्तन) संजय सिंह के अनुसार, विभाग अब पूरी तरह से केंद्र सरकार की उदार नियमावली का अनुसरण करेगा। संशोधित प्रस्ताव में भूमि की अनिवार्यता को कम करने और केंद्रों की संख्या पर लगे बैरियर को हटाने की बात कही गई है।
इससे उन 25 जिलों में भी निवेश के रास्ते खुलेंगे जहां अब तक एक भी आवेदन नहीं आया था। इस नीतिगत बदलाव का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भविष्य में हर जिले में पर्याप्त संख्या में एटीएस केंद्र उपलब्ध होंगे, जिससे वाहन स्वामियों को अपने ही जिले में आधुनिक मशीनों से फिटनेस कराने की सुविधा मिलेगी। इससे न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, बल्कि मशीनी जांच से वाहनों की फिटनेस गुणवत्ता में सुधार होगा, जो अंततः सड़क सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
बदलने वाली है ट्रांसपोर्ट सेक्टर की तस्वीर
शासन को भेजे गए इस प्रस्ताव के मंजूर होते ही यूपी में ट्रांसपोर्ट सेक्टर की तस्वीर बदलने वाली है। अब तक परिवहन विभाग के अधिकारी मैनुअल जांच के नाम पर होने वाले खेल को खत्म नहीं कर पा रहे थे, लेकिन एटीएस की संख्या बढ़ने से यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल हो जाएगी।

निवेशकों के लिए अब राज्यभर में तीन से ज्यादा केंद्र चलाने का रास्ता भी साफ हो जाएगा, जिससे बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र में कदम रख सकेंगी। सरकार का लक्ष्य है कि 31 दिसंबर की समय सीमा समाप्त होने से पहले प्रदेश के हर प्रमुख जिले में कम से कम दो से तीन सक्रिय आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन काम करना शुरू कर दें, ताकि फिर कभी मैनुअल जांच की जरूरत ही न पड़े और यूपी का परिवहन तंत्र आधुनिक और सुरक्षित मानकों पर खड़ा हो सके।
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