समाज की बंदिशें तोड़कर कैसे ‘ठुमरी की रानी’ बनीं गिरिजा देवी? जानें 90 रुपये से पद्म विभूषण तक का सफर

भारत के शास्त्रीय संगीत की ठुमरी एक ऐसे नाम के बिना अधूरी है, जिसने उसे कोठों और बंद कमरों से बाहर निकालने में सबसे अहम भूमिका निभाई। इतना ही नहीं नेशनल और इंटेरनेशनल स्तर पर पहचान भी दिलाई है। वह नाम है गिरजा देवी, जिन्हें सम्मान से ठुमरी की रानी भी कहा जाता है। आज हम आपको गिरजा देवी के जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं के बारे में बताएंगे, जो किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं हैं।

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8 मई 1929 मे हुआ था जन्म

गिरजादेवी यानी ठुमरी की रानी की कहानी ऐसे ऐसी कलाकार की तरह है, जिसने उस दौर में अपनी आवाज बुलंद की, जब संभ्रांत परिवारों की महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर गाना सामाजिक वर्जनाओं के खिलाफ माना जाता था। आज उनका जन्मदिन है और इस विशेष अवसर पर हम उस ऐतिहासिक सफर को याद करने जा रहे हैं, जो मात्र 90 रुपये के एक चेक से शुरू हुआ था पद्म विभूषण तक पहुंचा।

GIRIJA DEVI

गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को उत्तर प्रदेश के बनारस के पास एक छोटे से गांव में हुआ था। उनके पिता रामदेव राय एक जमींदार थे, लेकिन उनका दिल संगीत में बसता था। वह स्वयं हारमोनियम बजाते थे और बनारस की उस गंगा-जमुनी तहजीब के मुरीद थे, जहां सुबह की शुरुआत राग-भैरवी से होती थी। गिरिजा देवी ने बहुत कम उम्र में ही अपने पिता के भीतर संगीत के प्रति वह जुनून देख लिया था। जब वह केवल पांच वर्ष की थीं, तभी उनके पिता ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया और पंडित सरजू प्रसाद मिश्रा के पास उन्हें तालीम के लिए भेज दिया।

उस दौर में संगीत सीखना लड़कियों के लिए आसान नहीं था। उनकी मां और दादी चाहती थीं कि, गिरिजा घर के कामों में दक्ष हों, लेकिन उनके पिता अडिग थे। उन्होंने समाज की परवाह किए बिना अपनी बेटी को गायकी की दुनिया में उतार दिया। गिरिजा देवी अक्सर याद करती थीं कि, जब वह रियाज करते हुए थक जाती थीं, तो उनके पिता उन्हें इनाम के तौर पर नई गुड़िया लाकर देते थे। यही वह शुरुआती प्रोत्साहन था जिसने उनके भीतर उस आत्मविश्वास को जन्म दिया, जो आगे चलकर दुनिया के बड़े-बड़े मंचों पर उनकी ताकत बना।

पति से मिला भरपूर सहयोग 

साल 1944 में महज 15 वर्ष की आयु में गिरिजा देवी का विवाह वाराणसी के एक प्रतिष्ठित व्यापारी मधुसूदन जैन से हो गया। उस समय के सामाजिक ढांचे को देखते हुए यह माना जा रहा था कि, अब शायद उनकी गायकी पर पूर्णविराम लग जाएगा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उनके पति मधुसूदन जैन स्वयं कला और साहित्य के प्रेमी थे। उन्होंने न केवल गिरिजा देवी को संगीत जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया, बल्कि उनके अभ्यास के लिए सभी सुविधाएं भी जुटाईं। शादी के बाद उन्होंने पंडित श्रीचंद मिश्रा से तालीम लेना शुरू किया और अपनी गायकी में ‘बनारस अंग’ की बारीकियों को शामिल किया।

शादी के शुरुआती वर्षों में उन्होंने अपनी कला को घर की दीवारों तक ही सीमित रखा। हालांकि, उनकी प्रतिभा की गूंज धीरे-धीरे संगीत के गलियारों में सुनाई देने लगी थी। वह समय उनके लिए एक तपस्या की तरह था, जहां वह सुबह उठकर घंटों रियाज करती थीं और शाम को अपने गुरु के सानिध्य में जटिल रागों को साधती थीं।

गिरिजा देवी के करियर का सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ साल 1949 में आया। उन्हें इलाहाबाद रेडियो स्टेशन से ऑडिशन के लिए बुलावा मिला। यह वह दौर था, जब रेडियो पर गाना किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। गिरिजा देवी वहां पहुंचीं और करीब डेढ़ घंटे तक उनकी जादुई आवाज ने वहां मौजूद संगीत जानकारों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राग देसी में ख्याल पेश किया और उसके बाद ठुमरी व टप्पा की ऐसी प्रस्तुति दी कि चयनकर्ता दंग रह गए।

बिहार में दी सार्वजनिक प्रस्तुति

कुछ दिनों बाद उनके पास रेडियो स्टेशन से एक पत्र आया। उस पत्र में उनके मेहनताने के रूप में 90 रुपये लिखे थे। आज के दौर में यह रकम छोटी लग सकती है, लेकिन 1949 में 90 रुपये का मेहनताना केवल उन कलाकारों को दिया जाता था जो टॉप ग्रेड की श्रेणी में आते थे। इस एक पत्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि, गिरिजा देवी अब केवल एक उभरती हुई कलाकार नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक बड़ा नाम बन चुकी हैं। इसके बाद 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सभा में उन्होंने अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी, जहां से उनकी ख्याति पूरे भारत में फैल गई।

गिरिजा देवी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि, उन्होंने ठुमरी को एक नया आयाम दिया। उनसे पहले ठुमरी को अक्सर शृंगार रस और विलासिता से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन गिरिजा देवी ने इसमें भक्ति और संवेदना का ऐसा मेल किया कि यह सीधे सुनने वाले के दिल में उतरने लगी। उन्होंने कजरी, चैती, होरी और दादरा जैसी लोक शैलियों को भी शास्त्रीय अनुशासन में पिरोया। उनकी गायकी में बनारस की मिट्टी की महक और गंगा की लहरों की रवानगी महसूस होती थी।

सैकड़ों छात्र तैयार किए

उनके पास शब्दों के उच्चारण की एक अद्भुत कला थी। वह कहती थीं कि जब तक आप शब्द के अर्थ को महसूस नहीं करेंगे, तब तक वह श्रोताओं तक नहीं पहुंचेगा। उन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल गाया ही नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को संगीत की शिक्षा दी। कोलकाता की संगीत रिसर्च एकेडमी (SRA) और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने सैकड़ों छात्रों को तैयार किया, जो आज उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

भारत सरकार ने उनकी सेवाओं को देखते हुए उन्हें 1972 में पद्म श्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया। 24 अक्टूबर 2017 को 88 वर्ष की आयु में संगीत की यह अप्सरा पंचतत्व में विलीन हो गई, लेकिन उनकी ठुमरी “बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए” आज भी जब कानों में पड़ती है, तो आंखें नम हो जाती हैं।

आज हर सुर में है ठुमरी

गिरिजा देवी ने साबित किया कि अगर इरादे बुलंद हों और कला के प्रति समर्पण सच्चा हो, तो समाज की दीवारें आपको रोक नहीं सकतीं। 90 रुपये की वह पहली कमाई महज एक आंकड़ा नहीं था, बल्कि वह उस महान सफर का आगाज था जिसने भारतीय संगीत को ‘गिरिजा देवी’ जैसा अनमोल रत्न दिया। उनकी आवाज आज भी ठुमरी के हर सुर में जीवित है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

 

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