
लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2027 के मिशन को फतह करने की तैयारी में जुट गये है। इसके लिए उन्होंने अभी से ही बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। बीते दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिये अपने तरकश से जो नए तीर छोड़े वह अखिलेश के पीडीए को धराशायी करने वाले हैं। हालांकि सीएम के तीर किस हद तक निशाने पर लगेंगे, ये तो चुनाव के बाद ही पता चल पायेगा।
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जातीय समीकरण साधा
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए सीएम योगी ने इस बार के कैबिनेट विस्तार में जो जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधा है, वह उन समुदायों को वापस पार्टी जोड़ने का काम करेगा, जिसने कुछ वजहों से पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा से दूरी बना ली थी। इस विस्तार में 3 ओबीसी, 2 दलित और 1 ब्राह्मण चेहरे को शामिल कर भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि, उसकी नजर अब उन छोटी और हाशिये पर पड़ी जातियों पर है, जो चुनावी नतीजों को पलटने की क्षमता रखती है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति वर्तमान में जातीय ध्रुवीकरण के एक नए दौर से गुजर रही है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पिछले लोकसभा चुनाव में जिस पीडीए फॉर्मूले को आजमाया था, उसने भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाया था। भाजपा की 2019 की 62 सीटों की संख्या 2024 में घटकर 33 पर आ गई, जिसने पार्टी के भीतर खतरे की घंटी बजा दी थी। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसी फॉर्मूले की धार को कमजोर करने के लिए ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा लिया है।
इस कैबिनेट विस्तार के माध्यम से भाजपा ने संदेश दिया है कि, वह केवल बड़े जातिगत समूहों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन उप-जातियों को भी सत्ता में हिस्सेदारी दे रही है जिन्हें अब तक राजनीतिक रूप से कम प्रभावशाली माना जाता रहा है।
छह नए चेहरों को मिली जगह
योगी कैबिनेट के इस दूसरे और संभवतः आखिरी विस्तार में जिन छह नए चेहरों को जगह दी गई है, उनमें क्षेत्रीय और जातीय प्रतिनिधित्व का अद्भुत संतुलन देखने को मिल रहा है। भाजपा की यह रणनीति स्पष्ट करती है कि, वह 2027 के चुनाव में किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहती। पार्टी ने उन समुदायों के बीच अपनी पैठ फिर से मजबूत करने की कोशिश की है, जिनके पास भले ही व्यक्तिगत रूप से विशाल वोट बैंक न हो, लेकिन करीबी मुकाबले वाली सीटों पर वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे प्रमुख नाम वाराणसी के एमएलसी हंसराज विश्वकर्मा का है। ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले विश्वकर्मा को मंत्रिमंडल में शामिल कर योगी सरकार ने पूर्वांचल के एक बड़े हिस्से को साधने की कोशिश की है। हंसराज जमीन से जुड़े नेता माने जाते हैं और विश्वकर्मा समाज का प्रतिनिधित्व करते है।
संगठन में इनकी गहरी पकड़ है। उन्हें प्रमोट कर पार्टी ने अपने वफादार कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया है कि मेहनत और निष्ठा का फल जरूर मिलता है। माना जा रहा है कि, उन्हें कोई अहम मंत्रालय भी सौंपा जायेगा, ताकि पूर्वांचल के ओबीसी वोटर्स को साधा जा सके।
दलित समुदाय में पैठ बनाने की कोशिश
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय के बीच पैठ बनाने के लिए बुलंदशहर की खुर्जा सीट से विधायक सुरेंद्र दिलेर को कैबिनेट में शामिल किया गया है। दिलेर वाल्मीकि समाज से हैं और इस वर्ग का प्रतिनिधत्व करते हैं। इन्हें सरकार में प्रतिनिधित्व देकर भाजपा ने पश्चिमी यूपी के दलित समीकरणों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। इसी तरह, बुंदेलखंड क्षेत्र के खागा से विधायक कृष्णा पासवान को मंत्रिमंडल में शामिल करना एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
पासी समुदाय, जो दलित वर्ग में एक प्रभावशाली समूह है, अक्सर बड़ी राजनीति के बीच हाशिये पर रहा है। कृष्णा पासवान को कैबिनेट में लाकर भाजपा ने बुंदेलखंड में अपनी पकड़ और मजबूत करने का दांव खेला है। योगी सरकार ने इस फेरबदल में लोध और गुर्जर समुदायों को भी विशेष अधिमान दिया है। कैलाश राजपूत को शामिल कर मध्य और पश्चिमी यूपी के लोध वोट बैंक को सुरक्षित करने की कोशिश की गई है।
वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कद्दावर गुर्जर नेता सोमेंद्र तोमर को प्रमोट कर भाजपा ने उस नाराजगी को दूर करने का प्रयास किया है, जो पिछले चुनावों के दौरान गुर्जर समुदाय में देखी गई थी। पाल समुदाय से आने वाले अजीत पाल का कद बढ़ाकर भाजपा ने पशुपालक ओबीसी समुदायों को अपने पाले में बनाए रखने की जुगत लगाई है। इनका प्रभाव मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में निर्णायक माना जाता है।
मनोज पांडे को मिली जगह
इसके अतिरिक्त, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी को कैबिनेट में शामिल करना, पश्चिमी यूपी के जाट समीकरणों को साधने की दिशा में बड़ा कदम है। भूपेंद्र चौधरी न केवल एक अनुभवी संगठनकर्ता हैं, बल्कि जाट समाज में उनका बड़ा प्रभाव है। उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाकर भाजपा ने क्षेत्रीय संतुलन के साथ-साथ संगठन की शक्ति को भी सरकार के साथ जोड़ने का प्रयास किया है।

इस मंत्रिमंडल विस्तार में उच्च जातियों का प्रतिनिधित्व बेहद सीमित रखा गया है, लेकिन जो एक नाम सामने आया है, वह राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा चर्चा में है। अवध क्षेत्र के कद्दावर ब्राह्मण नेता मनोज पांडे को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। मनोज पांडे हाल ही में राज्यसभा उपचुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका देते हुए भाजपा में शामिल हुए थे। उन्हें कैबिनेट में लेना केवल प्रतिनिधित्व का मामला नहीं है, बल्कि सपा के खिलाफ एक रणनीतिक जीत का प्रदर्शन भी है।
पिछड़े और दलित वर्ग को साधा
दिलचस्प बात यह है कि इस विस्तार में ठाकुर समुदाय से किसी भी नए चेहरे को जगह नहीं दी गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री का पूरा ध्यान अब पिछड़े और दलित वर्गों के उन लूज एंड्स को ठीक करने पर है, जो 2024 में भाजपा के हाथ से फिसल गए थे। इस विस्तार के बाद अब योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में सदस्यों की कुल संख्या 60 हो गई है, जो कि अधिकतम सीमा है। इसमें अब 23 कैबिनेट मंत्री, 16 राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 21 राज्य मंत्री शामिल हैं।
भाजपा ने इस फेरबदल के जरिए यह साफ कर दिया है कि उसकी 2027 की रणनीति अति पिछड़ों और अति दलितों के इर्द-गिर्द घूमेगी। पार्टी का मानना है कि अखिलेश यादव के पीडीए के जवाब में उनका सर्व समावेशी और सूक्ष्म जातीय प्रबंधन ज्यादा प्रभावी साबित होगा।
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