बंगाल में ‘दीदी’ का राज खत्म, ‘दादा’ का शुरू, शुभेंदु अधिकारी ने ली सीएम पद की शपथ

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत में आज एक नए युग की शुरुआत हो गई है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक शायद ही किसी ने की रही होगी। यहां अब दीदी यानी ममता बनर्जी का राज खत्म हो गया है और बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी यानी दादा ने सीएम पद की शपथ ले ली है। कोलकाता का ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड, जो दशकों तक वामपंथी आंदोलनों और फिर तृणमूल कांग्रेस की गर्जना का गवाह रहा, आज वह पूरी तरह से भगवा रंग में रंगा नजर आया।

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खत्म हुआ ममता राज

शनिवार की दोपहर जब शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली, तो मैदान में मौजूद लाखों समर्थकों के जयघोष ने राज्य की सत्ता के केंद्र नबन्ना तक यह संदेश पहुंचा दिया कि, बंगाल की राजनीति में अब एक नए युग का शुभारंभ हो चुका है। राज्यपाल आरएन रवि ने उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई, जिसके साथ ही राज्य में करीब डेढ़ दशक पुराने ममता बनर्जी के शासन का आधिकारिक रूप से अंत हो गया।

Shubhendu Adhikari

यह शपथ ग्रहण समारोह किसी सामान्य राजनीतिक आयोजन से कहीं बढ़कर था। इसे भाजपा के उस लंबे संघर्ष की परिणति के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी शुरुआत राज्य में शून्य से हुई थी। विधानसभा की 294 सीटों में से 207 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल कर भाजपा ने न केवल बहुमत का आंकड़ा पार किया, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के उस अभेद्य दुर्ग को भी ढहा दिया है, जिसे ममता बनर्जी का सबसे मजबूत किला माना जाता था।

ममता बनर्जी की पार्टी महज 80 सीटों पर सिमट गई, जो उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी हार मानी जा रही है। ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आयोजित इस समारोह ने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक की राजनीतिक हलचल को एक नया मोड़ दे दिया है।

मंच पर दिखी दिग्गजों की भीड़

मंच की भव्यता और वहां मौजूद दिग्गजों की फेहरिस्त इस आयोजन के महत्व को रेखांकित कर रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि, केंद्रीय नेतृत्व के लिए बंगाल की यह जीत कितनी मायने रखती है।

प्रधानमंत्री मोदी जब मंच पर पहुंचे, तो पूरा मैदान मोदी-मोदी के नारों से गूंज उठा। प्रधानमंत्री ने शुभेंदु अधिकारी की पीठ थपथपाकर उन्हें बधाई दी, जो इस बात का संकेत है कि, आने वाले समय में केंद्र और राज्य के बीच एक नए समन्वय की उम्मीद की जा रही है। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा सहित एनडीए शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी विशेष अतिथि के रूप में मौजूद रहे।

शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं है। उनकी राजनीतिक जड़ें ग्रामीण बंगाल की मिट्टी में धंसी हुई हैं। पूर्व मेदिनीपुर के एक राजनीतिक परिवार से आने वाले शुभेंदु ने अपने करियर की शुरुआत कांग्रेस के एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में की थी। बाद में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, तो शुभेंदु उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में से एक बनकर उभरे।

शुभेंदु 2020 में शामिल हुए थे बीजेपी में

नंदीग्राम आंदोलन, जिसने वामपंथियों को सत्ता से उखाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई थी, उसके असली शिल्पकार शुभेंदु अधिकारी ही थे। हालांकि, समय के साथ ममता बनर्जी के साथ उनके मतभेदों ने गहरी खाई का रूप ले लिया। साल 2020 में जब उन्होंने तृणमूल छोड़कर भाजपा का दामन थामा, तो इसे एक बड़ा जुआ माना जा रहा था, लेकिन 2021 में नंदीग्राम की सीट पर खुद ममता बनर्जी को पराजित कर उन्होंने साबित कर दिया कि, बंगाल की नब्ज पर उनकी पकड़ ममता से कम नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना बंगाल की सत्ता के कोलकाता केंद्रीकृत ढांचे को तोड़ने जैसा है। पिछले पांच दशकों के इतिहास पर नजर डालें तो बंगाल के ज्यादातर मुख्यमंत्री कोलकाता या उसके आसपास के क्षेत्रों से रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी 1970 में अजय मुखर्जी के बाद पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो शुद्ध रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और जिले की राजनीति से निकलकर राज्य के शीर्ष पद तक पहुंचे हैं। उनके इस उदय को मिट्टी के लाल की जीत के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण मतदाताओं के बीच भाजपा की स्वीकार्यता और बढ़ने की उम्मीद है।

सोनार बांगला का लिया संकल्प

शपथ ग्रहण के बाद अपने संबोधन में शुभेंदु अधिकारी भावुक भी दिखे और आक्रामक भी। उन्होंने साफ किया कि, उनकी सरकार का लक्ष्य सोनार बांग्ला के संकल्प को सिद्ध करना है। उन्होंने राज्य की कानून-व्यवस्था को अपनी पहली प्राथमिकता बताया और प्रशासनिक अधिकारियों को निष्पक्ष होकर काम करने का कड़ा संदेश दिया। भाजपा नेताओं का दावा है कि, यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह बंगाल की संस्कृति, पहचान और विकास की राजनीति को पुनः स्थापित करने का प्रयास है। पार्टी का मानना है कि, पिछले 15 वर्षों में राज्य जिस ठहराव का शिकार हुआ था, अब उससे बाहर निकलने का समय आ गया है।

Shubhendu Adhikari

समारोह के दौरान सुरक्षा के इंतजाम इतने कड़े थे कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। कोलकाता पुलिस के साथ-साथ केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई थी। शहर की हर मुख्य सड़क पर भाजपा के झंडे और बैनर लगे हुए थ और हावड़ा स्टेशन से लेकर सियालदह तक केवल कार्यकर्ताओं का हुजूम नजर आ रहा था। राज्य के कोने- कोने से आए लोग इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए व्याकुल दिखे। कई समर्थकों का कहना था कि, उन्होंने दशकों बाद बंगाल में ऐसा बदलाव देखा है, जहां बिना किसी डर के लोग अपनी राजनीतिक पसंद का जश्न मना पा रहे हैं।

अब विपक्ष में बैठेंगी ममता

तृणमूल कांग्रेस के लिए यह हार आत्ममंथन का विषय है। पार्टी जो कभी अजेय मानी जाती थी, वह आज विपक्ष की भूमिका में खड़ी है। 80 सीटों के साथ ममता बनर्जी अब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में शुभेंदु अधिकारी का सामना करेंगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि, कल तक जो नेता एक-दूसरे के सहयोगी थे, अब सदन के भीतर किस तरह की तकरार और बहस का हिस्सा बनते हैं। बंगाल की जनता ने एक स्पष्ट जनादेश देकर यह बता दिया है कि, वे अब विकास और रोजगार के मुद्दे पर ठोस परिणाम चाहते हैं।

हालांकि, शुभेंदु अधिकारी राज्य के मुख्यमंत्री तो बन गये हैं, लेकिन उनके सामने चुनौतियों के पहाड़ खड़े हैं, जैसे कि, चरमराई अर्थव्यवस्था हो, औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार और राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास ,  लेकिन जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने आज शपथ ली है, उसने उनके समर्थकों में एक नई ऊर्जा भर दी है। बंगाल की राजनीति का यह नया अध्याय आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

 

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